• India

    Every particle, even sand says I AM AN INDIAN

  • Indian Tea

    India is a leading producer of TEA, do you wanna have Indian Tea

  • India Heart Of the World

    Take the Aroma of Indian Soil and it's promise that you would not forget it

  • Soil to Sea, it's India

    You may be tired but Scenories will not end, those will come with some new surprises

  • Forts still holds

    An eye catching but surprise everyone, how big and beutiful they are

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9 Sept 2013

Mullayam Red Cap: Colored in Hindu Blood



कुर्ता इनका है हरा, चादर भी इनकी है हरी-हरी,
हरा है रंग बिछावन का, दीवाल भी इनकी है हरी,
लेकिन बंधु तुम ये जान लो, बात मेरी खरी-खरी,
नेता जी उठा चुके हैं, अपनी धोती और चादर हरी।

सोचते सब नेता जी को, शोभे रंग हरा शूरमेदानी है,
सोचे जो ऐसा, क्या कहें उसको, ये उसकी नादानी है,
नेता जी तो जीते हैं, बस खातिर अपने ही लाल के,
चहुओर पाले हैं गुंडे, जो मचाते खातिर इनके बवाल हैं।

बादामी है रंग इनके खद्दर का, टोपी पहनते हैं ये लाल,
टोपी लाल रंगने खातिर, मत पुछो किए कितने बवाल,
सेक्युलर के हरे खून से, रंगते हैं नेता जी अपना रुमाल,
हिन्दू के खून से, रंगवाते हैं अपनी खानदानी टोपी लाल।

टोपी-टोपी करते हैं ये, टोपी अपनी ये लाल रंगवाते हैं,
इस लाल रंग की खातिर, हमेसा हिन्दू का खून बहाते हैं,
कटवा कर हिन्दू को, ये उसका खून अपने पास मँगवाते हैं,
हिन्दू के खून से ये अपनी खानदानी टोपी लाल रंगवाते हैं।

टेढ़ी नाक, तोतली जुबान, दिल है इनका तो बेईमान,
ना है इनका कोई धर्म, ना कभी रखते हैं ये कोई ईमान,
हाड़-मांस का देखो, कलयुग मे आया है ये ऐसा शैतान,
मुल्लों से करता गलबहियाँ, हिन्दू की काटे ये जबान।

ना देखा इस जैसा, मैंने अब तक कोई ठरकी इन्सान,
बातें करता समाजवाद की, पर चलाता ये परिवारवाद,
लेकर लोहिया की कमान, बन बैठा ये तोतला पहलवान,
नाम से हिन्दू, लेकिन फैलाता है केवल ये मुल्लावाद।


8 Sept 2013

Why media keep silence on anti-national Christian and Muslims


Opus dei इसाई समुदाय द्वारा पोषित मीडिया वाले जैसे दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही लगातार टीवी चैनल पर "सर्व धर्म समभाव" का पाठ पढ़ाते दिख रहे हैं! क्या यह जनता को दिग्भ्रमित करने वाला नहीं है? क्यों मीडिया वाले सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं रखते? या तो इनको इस देश की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान ही नहीं है या यह जानबूझ कर पैसा खा कर देशद्रोह और मक्कारी कर रहे हैं! 

क्यों मीडिया के मस्जिदों में पनपते 'इस्लामिक आतंवाद' की बात नहीं करते? क्यों वह नहीं बताते की आजकल मदरसों में केवल आतंकवादियों का निर्माण हो रहा है! क्यों नहीं बताते कि मस्जिदों में प्रतिबंधित अत्याधुनिक बिना लाइसेंस के हथियार संगृहीत कर के रखे जाते हैं जिसका कि दंगा फसाद में अनुचित और बर्बर प्रयोग होता है! अगर सच से आगाह करा दिया जाता तो पता नहीं कितने मासूम लोगो की जान बच जाती! क्यों मीडिया ऐसे "सर्व धर्म समभाव" की बात कर रही है जिससे की आतंकवादियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं? आतंकवादियों को पता है कि सारे कुकर्म करने के बाद भी उनको मासूम घोषित कर दिया जायेगा और भले ही दंगा उन्होंने शुरू किया हो इसका आधा श्रेय मासूम जनता के सर मढ़ दिया जायेगा! फिर क्या वह बरी और आज़ादी से फिर दंगा फसाद करने को स्वतंत्र! क्यों मीडिया 'विषधर नाग' को 'रस्सी' जैसा हानिरहित बता कर मासूम लोगो तो खतरे की तरफ लगातार धकेल रही है? क्या इसके लिए इनके खिलाफ PIL दाखिल नहीं होनी चाहिए?

कैथोलिक चर्च में हो रहे कुकर्मो की बात क्यों नहीं करती है मीडिया? दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही जैसे मूर्खो को तो शायद यह भी नहीं पता होगा की जीसस स्वयं क्रिस्चियन नहीं थे! रोमन लोगो ने उनको सूली पर चढ़ाया था और सौ साल स्वयं के फायदे के लिए रोमन ने ही जीसस के नाम को राजनैतिक हथियार की तरह  इस्तेमाल किया! इसाई धर्म की स्थापना जीसस की मृत्यु के सौ साल बाद उनके जीवन पर लिखे गए विभिन्न gospels/ वृतान्तो को संग्रहीत कर के की गयी थी! सैकड़ो में लिखे गए वृतान्तो में केवल 18 वृतांत चुन कर "ओल्ड टेस्टामेंट"/बाइबिल बनाया गया था! जिन रोमन्स ने जीसस का बेदर्दी से क़त्ल किया आज वह कैथोलिक चर्च खोल के धर्म के ठेकेदार बन बैठे हैं! आखिर क्यों ना हो जिसके पास स्वर्ग की चाभी होगी वही तो दुनिया पर राज करता आया है! 

"सर्व धर्म समभाव" की बात बुद्ध के समय की है जब की इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का नामो निशान नहीं था! वैसे भी हिन्दू धर्म में 'धर्म' का मतलब 'मज़हब' या 'religion' नहीं होता है! धर्म का अर्थ सही या  righteous मार्ग होता है जिसमे मानव जाती, पर्यावरण, जीव जंतु, सृष्टि, अंतरिक्ष हर किसी के प्रति मानवीय उत्तरदायित्व की बात की गयी है! 

"सर्व धर्म समभाव" और "वसुधैव कुटुम्बकम" का अर्थ इस देश की संस्कृति के परिपेक्ष में मेरी समझ में ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद के सन्दर्भ में किया गया है और दोनों ही विचारधाराओ को मान्यता देते हैं! कोई भी विचारधारा हो और अगर उसका मूल तत्व मानव समाज का भला, उन्नति और उत्थान नहीं है तो वह इस देश के अनुकूल नहीं है! समय के हिसाब से अगर कुछ कुरीतियाँ आ भी गयी है तो हमे उसको अपने आप सुधारना है ना कि उसके गलत अर्थ से सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देना है! मुझे ब्राह्मणों से कोई द्वेष नहीं है परन्तु यदि ब्राह्मण अपनी विद्वता, कर्म और उद्देश्य को छोड़ देता है तो उसको हम कैसे सम्मान दे सकते हैं? बिना किसी विवाद में फंसे मैं सबसे प्रार्थना करूँगा की वह श्री सी गोपालाचार्य द्वारा लिखित 'महाभारत' को पढ़ कर देख लें! जहां पर साफ़ साफ़ लिखा है की ना कोई जन्म से ब्राह्मण है और ना जन्म से शुद्र!

हमारे देश की संस्कृति में अगर हिन्दू विचारधारा को तार तार कर के चर्चा की जा सकती है तो हम इस्लाम क्रिश्चियनिटी कम्युनिज्म साधू संत सोनिया गाँधी मनमोहन सिंह को तार तार करके क्यों नहीं चर्चा कर सकते! जब हम भगवन के अस्तित्व पर प्रश्न उठा सकते हैं तब फिर बाकि सब तो बहुत छोटी मोती चीज़ें हैं!

अंत में इस्लाम के जानने वाले ज्ञाता यह बतायेंगे की खुदा ने गिब्रैल के द्वारा मोहम्मद से क्यों बात करी क्या खुदा मोहम्मद से सीधे बात नहीं कर सकते थे? मुल्ला मौलवी अपने स्वार्थ के लिए इस्लाम को तोड़ने मरोड़ने को आज़ाद क्यों हैं?

Written By: गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव

26 Aug 2013

Soniya gandhi planning to ban VHP


विश्व हिन्दू परिषद संगठन को बैन करने की तैयारी शुरू की जा चुकी है। क्या ये बैन इस 84 कोसी यात्रा के चलते हो रहा है....मुझे ऐसा नहीं लगता है। क्यूंकी अगर ऐसा होता तो देश मे शुक्रवार को निकलने वाली भीड़ पर भी बैन लग चुका होता, तजिया को भारत से खत्म किया जा चुका होता है एवं भारत मे बसे हाफ़िज़ सईद जो हमेसा भड़काऊ भाषण देते रहते हैं ओवैसी बंधुओं को फांसी के फंदे पर लटका कर सुवरों को उनके मांस को खाने हेतु परोसा जा चुका होता।

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ फिर ऐसे मे विश्व हिन्दू परिषद को बैन करने की बात समझ से परे हैं। लेकिन अगर कुछ समय पहले की घटनाओं को देखने पर पता चलता है की ऐसा संभव है। क्यूंकी कुछ समय पहले सोनिया गांधी बजरंग दल झूठे आरोप लगा कर उसको बैन करने की तैयारी कर चुकी थी। आरोप भी ये की बजरंग दल क्रिश्चियनों को जान से मार रहा है जबकि उन सभी क्रिश्चियनों की मौत आशनाई (लड़की बाजी, ननों के साथ हमबिस्तरी) के चक्कर मे क्रिश्चियनों ने ही की थी, जो की पुलिस जांच मे पता चली थी।

चाहे बजरंग दल हो या विश्व हिन्दू परिषद या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी वेटिकन के पोप एवं उनकी मातहत सोनिया गांधी द्वारा भारत मे संचालित बलात धर्मपरिवर्तन के आड़ मे बहुत बड़े रोड़ा हैं। ये तीनों ही संस्थाएं मिल कर पहले तो लोगों को धर्मपरिवर्तन करने से रोकती हैं अगर कोई धर्मपरिवर्तित मिल जाता है तो उसे पुनः उसकी स्वेक्षा से, ना की सोनिया गांधी की तरह बलात, पुनः हिन्दू धर्म मे समावेश कराते हैं।

इन तीनों हिन्दूवादी संगठनों का कोई कार्य आज तक देशविरोधी नहीं मिल पाया है भारत की इस सरकार को अतः किसी भी छोटे मुद्दे को भी बड़ा दिखा कर ये चाहते हैं इन संगठनों को बैन कर दिया जाए एवं खुल्ले भारत मे बलात धर्मपरिवर्तन कराया जाए। इनको कोई फर्क नहीं पड़ता है की भारत बिखरने के कगार पड़ खड़ा है या इनके इस कदम से भारत मे गृह युद्ध जैसे आसार बनते जा रहे हैं। परंतु सोनिया गांधी जो की एक कैथोलिक क्रिश्चियन हैं उनका सबसे बड़ा लक्ष्य ही है भारत को एक क्रिश्चियन देश बनाना। वैसे कैथोलिक क्रिश्चियन मुसलमानों के बाद दुनिया की सबसे वहशी प्रजाति है जिसकी भारत मे पुरोधा सोनिया गांधी हैं।

सोनिया गांधी का भारत को क्रिश्चियन देश बनाना तब तक संभव नहीं है जब तक देश मे बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ है। अतः सोनिया गांधी साजिशन इन तीनों ही संगठनों को देशविरोधी कार्यों को दिखा कर बंद करने की तैयारी का शुरुवात कर चुकी हैं। और इस साजिश मे सोनिया का साथ सभी क्षेत्रीय पार्टियां चाहे वो पुरानी हों जैसे सपा इत्यादि या फिर फोर्ड के पैसे बनी केजरीवाल की पार्टी, सभी सोनिया गांधी की हाँ मे हाँ मिला कर देश को अंधकार के गर्त मे धकेलने मे महती भूमिका निभा रहे हैं। इन सभी क्षेत्रीय पार्टियों को देश से कोई मतलब नहीं है बल्कि इनको तो मतलब अपने स्विस बैंक मे बढ़ रहे नोटों के बण्डल से है।

क्षेत्रीय पार्टियों की नोटो की भूख को वेटिकन एवं सोनिया गांधी बहुत ही अच्छे से समझ रही हैं। अतः उन सभी पार्टियों को नोटो के बण्डल मे दबा कर सोनिया खुल्लेआम बलात धर्मपरिवर्तन कराना चाहती है और इसके लिए सोनिया गांधी अपने मार्ग मे रोड़ा बने इन सभी हिन्दूवादी एवं राष्ट्रवादी संगठनों पर बैन भी लगा सकती है।


16 Aug 2013

Why I hate Muslims


कई लोग पूछते हैं की मैं मुसलमानों से इतनी नफरत क्यूँ करता हूँ? मैं खुल कर जवाब नहीं देता था। लोग आ कर मुझे समझते थे की ये हमारे देश के ही हैं, इनसे इतनी नफरत नहीं करनी चाहिए। हमे मिलजुल कर रहना चाहिए इत्यादि। वैसे मैंने उनको हमेसा एक जवाब दिया कि मुझे मुसलमानों से नफरत नहीं है बल्कि मुझे मुल्लों से नफरत है। मुसलमान वो होता है जो ईमान का पक्का होता है। और मुल्ला जो अपने बाप का भी नहीं होता है।

मेरे मुल्लों के प्रति नफरत की शुरुवात उन दिनों से हुई जब मैं कुछ समझने लायक हुआ। शुरू से मैं अपने दादा-दादी के काफी करीब रहा, उनका लाड़ला हूँ। लेकिन दादा जी अपने लाड़-प्यार मे भी थोड़े व्यावहारिक थे। उन्होने बताई इन मुल्लों कारस्तानी।

बात उन दिनों कि है जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था। और मेरे दादा जी कि उम्र उस समय शायद 20+ थी। बँटवारे से पहले दादा जी कि बड़ी बहन कि शादी ढाका, बांग्लादेश मे उस समय के एक बड़े जमींदार से हुई थी। जिनका वहाँ अपना बिजनेस था एवं वो खुद स्वतन्त्रता सेनानी थे। अब बँटवारे के समय के समय सभी उनको भारत बुला रहे थे क्यूंकी बँटवारे से पहले ही मुल्ले खून-खराबे पर उतर आए थे। लेकिन दादा जी के बहनोई ने कहा कि ढाका उनकी कर्मस्थली ही नहीं वरन जन्मस्थाली भी है। अतः वो ढाका किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे और ना ही मुसलमान बनेंगे। 

दादा जी के बहनोई के यहाँ कई मुल्ले कार्य करते थे और दादा जी के बहनोई के वजह से ही उन मुल्लों के घर का चूल्हा जलता था। जब मुल्लों के अत्याचार से वहाँ कि हिन्दू जनता इनको जवाब देने पर आई तब ये सभी भाग कर दादा जी के बहनोई कि कोठी मे पहुंचे। दादा जी के बहनोई का उस समय रसूख बहुत ही अच्छा था। अतः उनके मिन्नत करने पर उन मुल्लों को छोड़ हिंदुओं कि गुस्साये भीड़ ने बख्स दिया और वहाँ से चले गए। लेकिन मुल्ले मारे डर के वहीं रहे करीब 3-4 दिन तक। बुआ और उनकी देवरानियाँ सभी के लिए खाना बनाती थीं उन 4 दिनों मे। लेकिन जब हिन्दू वहाँ से पलायित हो गए और भारत आ गए तब मुल्लों कि भीड़ आगे बढ़नी चालू हुई और बचे हुए अल्प हिंदुओं को काटना चालू किया।

इसी क्रम मे जब उन्मादी मुल्लों कि भीड़ दादा जी के बहनोई के घर के सामने आई तो उनके लठैतों एवं हिन्दू कामगारों ने हवेली का गेट बंद कर दिया। तभी जो मुल्ले दादा जी के बहनोई के यहाँ शरण लिए हुए थे उन्होने हवेली का गेट खोल दिया और उन्मादी भीड़ हवेली के अंदर घुस आई। इतने मे दादा जी के बहनोई ने अपने एक विस्वसपात्र सेवक से कह घर कि औरतों को घर से बाहर सुरक्षित भेज दिया ताकि आबरू बची रहे। घर के अंदर दादा जी के बहनोई कि माँ और मर्द बचे रहे। घर के लोगों और अपने अन्नदाता मेरे दादा जी के बहनोई पर घातक प्रहार करने वाला और कोई नहीं बल्कि शरण लिया हुआ मुल्ला ही था। घर के सभी व्यक्तियों को काट डाला गया। घर को घर मे घायल पड़े लोगों के साथ आग के हवाले कर दिया गया। पूरे घर मे या परिवार मे कोई भी व्यक्ति जिंदा नहीं बचा था।

इसी बीच दादा जी जो उस समय कलकत्ता मे रहते थे अपनी बहन को लाने ढाका के लिए निकल चुके थे वो भी पैदल। दादा जी नालों एवं सभी कठिनाइयों को पार करते हुए ढाका पहुंचे। मुल्लों से बचा कर अपनी बहन को लाने के लिए दादा जी ने अपनी दाढ़ी मुल्लों के मानिंद रख ली थी।

इसी बीच ढाका मे दादा जी कि बहन ही किसी तरह जिंदा बच पाईं जो एक हिन्दू घर मे आश्रय लिए हुए थी अपने पति के इंतजार और बाकी उनकी देवरानियाँ सेवक के साथ निकल गईं लेकिन ना तो सेवक का कुछ पता चला और ना ही देवरानियों का। दादा जी कैसे भी ढूंढते हुए उस घर मे पहुंचे जो दादा जी के बहनोई के घर से करीब 1 किलोमीटर कि दूरी पर हिन्दू बाहुल इलाके मे था।


दादा जी वहाँ से अपनी बहन को लेकर भारत कि तरफ चल पड़े बिना अपनी बहन को उनके पति एवं सभी घरवालों कि मौत के बारे मे बताए हुए। रास्ते मे हिन्दू की भीड़ देखते ही मुल्ले हमला कर देते थे। लड़कियों एवं औरतों को उठा ले जाते थे एवं मर्दों को काट डालते थे। दादा जी एवं उनकी बहन नालों के अंदर, पुलों के नीचे या लाशों के बीच लेट कर किसी तरह बचते-बचाते कलकत्ता पहुंचे। वहाँ से दादा जी के दोस्त या सही मायनों मे बड़े भाई समान श्री विजय सिंह नाहर जी ने दोनों लोगों को हमारे गाँव भेजने कि व्यवस्था कि। दादा जी की बहन जीवन पर्यंत हमारे साथ ही हमारे गाँव पर रहीं। 

दादा जी बताते हैं कि कपड़े पूरी तरह खून से सन गए थे। रात मे सोने पर आँख बंद नहीं होती थी एवं लाशों का मंजर आँखों के सामने नाचता था। कैसे वहशी मुल्ले लोगों को काट-काट कर फेंकते थे। बलात्कार करना एवं उसके घर सहित जला देना ये उन मुल्लों के लिए आम बात थी।

अब ऐसे मे आप बताएं क्या मेरी इन मुल्लों के प्रति नफरत गलत है। ये जो अपने बाप के नहीं होते हैं, ये जो अपने अन्नदाता के नहीं होते हैं....क्या कभी ये मुल्ले इस देश या हमारे-आपके होंगे। 


8 Feb 2013

Secularism a propaganda of injustice

धर्मनिरपेक्षता की एक बानगी 

धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले जरा इन तसवीरों को देख कुछ कहें। ये तस्वीरें कहीं और की नहीं वरन एक संग्रहालय की हैं जो अलग-अलग जगह से लाई गई हैं।

इन मूर्तियों को देख कर यही लगता है की इन मूर्तियों को बड़े ही इतमीनान और प्यार से भंग किया गया है। इन मूर्तियों मे किसी का पैर, किसी का हाथ तो किसी का सर लेकिन जो देवियों की मूर्तियाँ हैं उन मूर्तियों का सर और वक्ष स्थल तोड़ा या काटा गया है।

अब इन धर्मनिरपेक्ष बंधुओं के इतने प्यार को देख मेरे से तो कुछ बहुत ही अच्छी उपाधि निकल रही है लेकिन शायद मेरे सेक्युलर टैग वाले बंधु विशेष प्रकाश डाल सकें इन पर।

वैसे जिनका धर्म निराश और नीरस होता है, तत्वहीन और छिछला होता है, जिन्हे दूसरों का अच्छा स्वरूप नहीं भाता है, वो दुष्ट और नीच प्रकृति के क्रोधाग्नि से जलते हुए गंदे लोगों का ही कुकर्म है ये और शायद यही कुकर्म है की जिसका फल इनका पूरा कुनबा बड़े प्यार से भुगतता है। अगर नहीं पता तो किसी भी इनकी महिला से "हलाला" पूछ लो या फिर ये देख लो की आपा बोलते-बोलते कब ये धापा मार देते हैं पता ही नहीं चलता है और अपने भाँजे के ये अब्बा बन बैठते हैं।

जय हिन्दुत्व.......जय श्री राम

जय भारत........वन्देमातरम

















9 Nov 2012

सेकुलरिज्म का तड़का




बनारस का बम विस्फोट और रामपुर सीआरपिऍफ़ कैम्प हुए हमारे जवानों के नरसंहार याद है या भूल गए........उनके आरोपियों को सौहार्द्र दिखाने के नाम पर छोड़ा जा रहा है ताकि मुल्ला तुस्टीकरण को धर्मनिरपेक्षता की चादर से सजाया जा सके.....और आम जनता को अँधा और मुर्ख बनाया जा सके

वैसे धर्मनिरपेक्षता के ढकोसले के पीछे बैठे ढकोसले-चंद इन मुल्लों के वोटों की भीख के लिए देश से और कितना गद्दारी करेंगे....और देश की जनता का सब्र का बाँध आखिर कब टूटेगा....आखिर इतना सब्र क्यूँ दिखा रही है जनता....क्या कंठ से आवाज निकाल ली गई है.....कान हैं या कौवा ले कर गया...या की तुम्हारे हाथों में दही जम गया है.....

चलो कोई बात नहीं आप अभी दिवाली मनाओ....उसके बाद क्रिस्मश, फिर अंग्रेजों का नया साल......सब त्यौहार पड़े हैं....चिंता की बात नहीं.....अभी आपके घर पर बिजली नहीं गिरी है...हाँ भगवान से प्रार्थना करूँगा की वो उस बिजली से आपके परिवार को बचाए रखें...

4 Sept 2012

आरक्षण या लोलीपोप



मैं ये लेख न तो आरक्षण के प्रति दुर्भावना से किसी प्रकार ग्रषित हो कर लिख रहा हूँ और न ही इस आरक्षण के कारन मुझे कोई हानी है क्यूंकि शुरू से मुझे सरकारी नौकरी नहीं करनी थी| मुझे आरक्षण से कोई परेशानी नहीं है बल्कि मेरा मानना है की इस तुरुप के इक्के का अच्छे से इस्तेमाल हो|

भाई आरक्षण एक ऐसा लोलिओप बन रखा है जिसमे सीधा मकसद है की दलितों को बेवकूफ बनाओ और उनसे वोट लो| लेकिन एक और मकसद है जिसे दलित उत्थान के झूठे वादे में बड़े जतन से छिपा लिया गया है| ये मकसद और कुछ नहीं बल्कि हिन्दुओं में फुट डालने का|

अब आइये जांचते हैं की जो आरक्षण १० साल के लिए बनाया गया था उसको आज ६५ साल से लगातार चलाया जा रहा है लेकिन उसका फ़ायदा किसे पहुंचा आरक्षण का| आज तक कितनी झोपड़ियाँ पत्थर और कंक्रीट के घर बन पाए| कितने गाँव के दलित भाई विकसित हो पाए| क्या आरक्षण कुछ हाथों की कठपुतली बन कर नहीं रह गया है|

अब कोई भी आगे आये और अपने गाँव के दलित भाइयों का हश्र देख ले की कितना आगे बढ़ा है इस आरक्षण से आपके गाँव का दलित| क्या केवल आरक्षण के नाम पर चंद रुपये हथेली पर रख देने भर से किसी दलित का उत्थान हो सकता है क्या? घर में खाने को कुछ नहीं हो, अनाज पैदा करने के लिए जमीन न हो तो इस आरक्षण का क्या दलित अचार डालेंगें?

जो कल मिटटी के घरों और झोपड़ों में रहते थे वो आज भी उसी तरह रहने को मजबूर हैं लेकिन फ़ायदा मिला जिनके पास पहले से मजबूती थी| जो कल डॉक्टर या IAS या कुछ बड़े लाभ के पद पर थे वही आगे बढे जिनका प्रतिशत ९५% है लेकिन जो मलिन घरों से आगे आये वो केवल ५% हैं| सबसे बड़ी बात की जो आज नेता हैं वो भी इस आरक्षण का लाभ उठाते हैं जिसकी इनको जरुरत ही नहीं है| 

तो क्या मान लिया जाये की आरक्षण केवल समर्थ लोगों के फायदे के लिए बनाया जाता है आज और गरीबों के लिए लोलीपोप|

अब इस आरक्षण का दूसरा पहलु देखते हैं| आरक्षण कैसे हिन्दुओं में फुट डाल रहा है| एक नाकाबिल युवक आरक्षण के जरिये लाभ के पद पर पहुँच जाता है लेकिन काबिल इन्सान पीछे रह जाता है तो अमूमन है की उस काबिल इन्सान के अन्दर रोष आएगा जो कभी न कभी फूटेगा| आज कितनी ही बार खबर आती है की अमुक कॉलेज की अरक्षित सिट भर नहीं पाई लेकिन किसी काबिल अनारक्षित युवक को वो सिट नहीं दी जा सकती है क्यूंकि वो अरक्षित वर्ग की है| जो कोई अपने मेहनत से ऊपर के पोस्ट तक पहुंचा है उसको केवल इस लिए पीछे छोड़ दिया जाता है क्यूंकि प्रोनात्ति पाने वाला एक अरक्षित वर्ग का युवक है|

एक बात याद आती है मुझे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री जो की अब जीवित नहीं हैं स्वर्गीय राजीव गाँधी जी, जिन्होंने कहा था की जो भी राहत कोष केंद्र से चलता है अगर वो १०० रूपया है तो जरूरतमंद तक पहुंचते-पहुंचते वो सिर्फ एक रूपया रह जाता है| अब आप खुद सोचें की अगर वो पूरा १०० रूपया जरूरतमंद तक पहुंचे तो क्या कोई गरीब रहेगा या इस आरक्षण की जरुरत रहेगी| लेकिन आज की हालत में तो वो १ रूपया भी नहीं पहुँच रहा है बल्कि पूरा १०० रूपया लूट लिया जा रहा है| इतने घोटाले हो रहे हैं देश में अगर वो पैसा देश में लगे तो देश में क्या आरक्षण की जरुरत रहेगी? जो पैसा इन चोरों ने विदेशों में जमा कर रखा है वो भारत लाने में इनकी हालत ख़राब क्यूँ होती है क्यूंकि उसके बाद आरक्षण की जरुरत ही नहीं होगी देश में|

अब जरा इन मंत्रियों की माली हालत पर नजर डालते हैं जो इस आरक्षण की पैरवी करते हैं की उनकी माली हालत में इन दिनों में कितना बदलाव आया:-

मायावती जो की उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री रही हैं उनकी धन-दौलत १११ करोड़ है जो की १४ मार्च २०१२ के हिसाब से पिचले २ सालों में ही २७% बढ़ी| मायावती जी के पिता गौतम बुद्ध  नगर में एक पोस्ट ऑफिसर थे| इनका परिवार जाटव जाती का है जिस पर मायावती जी की सोच थी की ये अगर प्रधानमंत्री बनाने का मौका पाएंगी तब ये बुद्धिस्ट बन जाएँगी| यानि फिर जाती का खेल| मायावती जी १९९४ में राज्यसभा की सदाशय बनी| अब अगर १९९४ से आज तक यानि २०१४ तक हर महीने ५०,००० रुपये के हिसाब से भी हिसाब लगाया जाये जो की एक मुख्य मंत्री की सैलरी है तो देखते हैं की कितना होना चाहिए इन महोदय के पास| 

१८ साल * १२ महीने * ५०००० = १,०८,००,००० यानि १ करोड़ ८० लाख ही होना चाहिए पर दलितों की अधिष्ठाता मायावती जी के पास है कितना माल तो सीधा १०१ गुना ज्यादा| अब जरा इनसे कोई पूछे की क्या इनको आरक्षण चाहिए या ये पैसा कहाँ से आया| क्या ये वो पैसा नहीं है जो अरक्षित लोगों के उत्थान के लिए था और जो उन लोगों के उत्थान के बदले अरक्षित लोगों की अधिष्ठात्री मायावती जी की जेब को शुशोभित कर रही है और ये दिखावे के लिए इस आरक्षण के लिए झूठी लड़ाई लड़ने की नौटंकी में लगी हैं और इन जैसे तो पता नहीं कितने नेता हैं जो भोले भाले दलित भाइयों को बेवकूफ बनाने में लगे हैं और उन्हें एक ऐसी गहरी और अँधेरी खाई में धकेल देना चाहते हैं जिसका परिणाम एक ही है "गृह युद्ध"| 

दूसरा सवाल है की आखिर किसी भी आरक्षण का लोलीपोप केवल चुनावी माहौल में ही क्यूँ किया जाता है? क्या ये वोटर्स को ललचाने के पुराना और कारगर तरीका है जिसे वोटर्स देख ही नहीं पते हैं या देखने के बाद भी अपनी इन्द्रियों को बंद करके गाँधी जी बन्दर बन इन मदारी रूपी नेताओं के तान पर नाचते रहते हैं|

मैं आरक्षण के खिलाफ नहीं हूँ जैसा की मैंने पहले भी कहा है पर अगर आरक्षण देना ही है तो जाती आधारित दे कर हिन्दुओं को बांटने से अच्छा है की आप आमदनी के आधार पर आरक्षण दें|

१. आमदनी के आधार पर आप आरक्षण दें जिसके ऊपर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज नजर रखें| 

२. साथ ही आमदनी आधारित आरक्षण के लिए आप फॉर्म १६ लें जिसे लोग टैक्स जमा करने के लिए उपयोग करते हैं और जिसे सीधा सरकारी कम्पनी और मौजूदा सरकार की दुश्मन कैग चेक करती है|

३. जिसको एक बार आरक्षण मिल जाये उसे दुबारा आरक्षण का लाभ न मिले बल्कि उसके जगह दुसरे को आरक्षण का लाभ मिले|

इस आधार से हर उस व्यक्ति को लाभ मिल सकता है और हर जरूरतमंद को रोटी मिल सकती है| लेकिन हम सभी जानते हैं की अगर जरूरतमंद का पेट भर गया और वो सफल है तो वो इन पाखंडी और जाती के नाम पर आरक्षण का लोलीपोप दे कर दलित भाइयों का न तो मजाक बना पाएंगे और न ही हिन्दुओं के बिच कोई खाई पनप पायेगी|

भाइयों इन कुटिल नेताओं की मानसिकता को समझो जो केवल आपको बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं और कुछ नहीं| इन कुटिल नेताओं को उनके मकसद में कामयाब न होने दें और इन्हें सबक सिखाएं|

जय हिंद जय भारत

16 Jul 2012

आखिर ये मुल्ला तुस्टीकरण क्यूँ?


पूरा भारत और हिन्दू जगत आज दहाड़े मार कर रो रहा है की देश में केवल मुल्ला तुस्टीकरण हो रहा है| मुल्लों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा रहा है| सभी राजनैतिक दल केवल मुल्लों के वोट के पीछे भाग रहे हैं| 

पर क्या मेरे हिन्दू भाइयों ने चिल्लाने के बजाय सोचा कभी की ऐसा क्यूँ हो रहा है?

भारत हमेसा से हिन्दू देश रहा है और अगर हिन्दू जाग गए भविष्य में तो फिर से हिन्दू देश ही बन जायेगा पर कब जागेंगे मेरे ये हिन्दू भाई ये तो भविष्य की गर्त में छुपा हुआ है अभी| पर हम अभी का देखते हैं|

आज की सबसे बड़ी परेशानी है की ये मुल्ला तुस्टीकरण क्यों जबकि कुछ विशिष्ट कारणों से धर्मनिरपेक्षता को भारत अरे माफ़ करिए "इंडिया" के संविधान में १९७७ में जोड़ा गया| तो ये एक शब्द ही किसी भी धर्म विशेष के बारे में सोचने तक को मना करता है| पर फिर भी संविधान में लिखे या जोड़े गए के उलट मुल्ला तुस्टीकरण बना हुआ है जो की गैर संवैधानिक ही नहीं बल्कि गैर क़ानूनी भी है| पर फिर भी आज ये धड़ल्ले से ८५ करोड़ हिन्दुओं के सामने हो रहा है| तो कुछ तो विशेष कारण होगा इस धर्मनिरपेक्षता का|

जी हाँ एक बहुत ही विशिष्ट कारण है और ये कारण है हम हिन्दुओं की अकर्मण्यता|

अब आप प्रश्नचिन्ह लगायेंगे की ये अकर्मण्यता कैसे मुल्ला तुस्टीकरण को जन्म दे रही है| तो जनाब जरा अपने अन्दर और अपने घर के अन्दर झांक कर देखें की हिन्दू होने के बावजूद खुद आपके अन्दर एक अन्दर मुल्ला प्रेम हिलोरें मार रहा है और आपके घर के आंगन में एक मुल्ला बैठा हुआ है आपका झूठा हितैषी बन कर की जिस दिन मौका मिले एक और प्रतापगढ़ का काण्ड हो जाये या जम्मू और कश्मीर का काण्ड हो जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है| तो क्या नेताओं को ये नहीं दिख रहा है की मुल्ला तो आप हिन्दू भाइयों के घर में ही बैठा है और आपको ही बरगला रहा है तो इसमें नेता का क्या दोष है खुद की आस्तीन और आंगन तो गन्दगी से साफ़ कर लो|

मेरे हिन्दू भाइयों चुनाव वाले दिन तो आप घर में सोते हो और चाय-पकौड़ी का मजा लेते हो लेकिन जामा मस्जिद के एक फतवे पर उस विषेस धर्म के अन्धे लोग पूरा वोट एक ही दिशा में गिराने के लिए कब्र में पैर लटकाए मुल्ला तक भी किसी के कंधे पर टंग कर वोट देने जाता है पर आप महान हिन्दू हैं अतः आप क्यों वोट देने जायेंगे| तो भाई जो वोट देगा उसी को तो ये नेता पूछेंगे|

जामा मस्जिद के फतवे का क्यों जिक्र किया मैंने यहाँ?

भाई १९७४ में भी दिखा था ये और हाल ही में ख़तम हुए उत्तर प्रदेश चुनाव में दिखा की कैसे मुल्लो का रखवाला और उनको मुस्लमान ना बनने देने वाला बुखारी ने कैसे बेशर्मी से नव-निर्वाचित उत्तर प्रदेश सरकार से पैसे और अपने सगे रिश्तेदारों के लिए पद की मांग की थी|

पर कुल मिला कर मुल्ले करीब ९५% वोटिंग करते हैं| और इंडिया में करीब ५५% की वोटिंग होती है तो अगर १५ करोड़ मुस्लिम ही वोट दे रहे हैं इस ५५% में और बाकि के अल्पसंख्यक भी पूरी वोटिंग करते हैं तो कौन वोटिंग नहीं कर रहा है?

अब हिन्दू खुद हिसाब लगा लें की १२० करोड़ में से ५५% वोटिंग हो रही है मतलब साफ़ है की सिर्फ ६६ करोड़ की वोटिंग हो रही है और अगर उस ६६ करोड़ में से १५ करोड़ मुल्ले वोट दे रहे हैं और करीब करीब ८-१० करोड़ बाकि के अल्पसंख्यक वोट दे रहे हैं तो हमारे कितने हिन्दू बंधू वोट दे रहे हैं|

अब हिन्दू बन्धु खुद ही देखें की क्या है सच्चाई इस मुल्ला तुस्टीकरण के पीछे और कौन है जिम्मेदार!!!



22 Jun 2012

झूठी धर्मनिरपेक्ष मानसिकता को पहचानो !!!


इस देश मे मुगलों अंग्रेजो ने हिंदू से हिंदू को कटवाया आज भी ये काले अंग्रेज हिंदू से हिंदू का ही बिरोध करवा रहे है वो भी झूटे सेक्यूलरिज्म के नाम पर| आज तक दंगे मे कोनसा बड़ा सेक्युलर नेता मरा हर दंगे मे केवल गरीब ही मरता है चाहे बो आज का हिंदू हो या हमारा बिछड़ा हुआ हिंदू जो नपुंशक होने के साथ-साथ पथ्भ्रस्त भी हो चूका है पूरी तरह से| बिभाजन के समय इतने बड़े दंगे हुए पर क्या कोई मंत्री, ऍम.एल.ए. या एम्.पी शहीद हुआ? 

संसद पर हमला करने वाले अफजल को ये डरपोक र्इसलिए फासी नहीं दे रहे कि कही ऐसा ना हो कि कोई उनका साथी इनका काम ना लगा दे| कसाब को बिरयानी ये कायर इसलिए खिला रहे है कि ये मानसिक रूप से मुसलमानों की उस कौम के गुलाम है जिनके आँख दिखाने पे इनको पेशाब आ जाता है| अब कल की बात ही ले लो कागेस प्र्बक्ता जो बकता ही है और ऐसों को छाँट-छाँट के कागेस मे प्रबक्ता बनाया जाता है| जैसे सोनिया का देसी कुत्ता जो पागल भी हो गया था उसे तो पहचानते ही होंगे आप? अरे वही डोग्गी दिग्गी! उसका भोकना बंद कराया, कल इक और भौका "कि मुलायम यु.पी मे भाजपा का एजेंट है'' वात मे दम नहीं खीज थी हार की| 

एक को राष्ट्र+पति = राष्ट्रपति बनना है ताकि जब चाहे जब इस देश मे कोई भी अध्यादेश लागु किया जा सके| वैसे ये पश्चिमी शब्द का अनुवाद है, जिसका अन्धानुशरण हमारे काले अंग्रेज करते आ रहे हैं| हमारे राष्ट्र का केवल सेवक तो हो सकता है कोई ''प्रथम सेबक परन्तु ये पति यानि राष्ट्र कोई स्त्री है क्या जो इसका पति होगा वो भी एक बड़ा चोर जिसने ब्लैक मनी की लिस्ट ही खा ली क्युकी उसमे सबसे ऊपर P.W. GOLDEN ACCOUNT का नाम था जिसमे कई लाख करोड़ रुपये हैं| अब ये अगर ये हमारे भावी राष्ट्रपति महोदय जी ने उस अकाउंट के बारे में बता दिया तो पूरा कांग्रेस ही ख़तम अतः पार्टी बचाओ देश और देशवासी चाहे जाएँ भांड में| 

जरा देखो इन छद्म और झूठे धर्मनिरपेक्ष लोगो का दिमागी दिवालियापन इक राष्ट्र रास्ट्रपिता बन गए मेरे बिचार मे हमारी भारत माता का के पिता पर इस भारत माता जो की विश्व की सबसे पावन धरती मानी जाती है उसके पिता तो सिर्फ और सिर्फ भगवन ही हो सकते हैं जो पूरी इस श्रृष्टि को चलाते हैं और दूसरी तरफ हमारे ऊपर कहीं से भी किसी भी ऐरे गिरे नत्थू खैरे को ला कर थोप दिया जाता है भारत माता के पति बना कर न तो उसमे किसी भी भारतीय की सहमती ली जाती है और ना ही उनकी भावनाओं का ख्याल रखा जाता है| अगर ये भगवान को पिता मान लेगे तो इनका धर्मनिरपेक्षपना सही मे धर्मनिरपेक्ष हो जायेगा| पर एक परेशानी आ जाएगी की फिर ये मुसलमानों और ईसाइयों को बेबकुफ़ कैसे बना सकेगे| 

ये भारत देश एक सनातन देश है इसका पिता गाँधी कैसे हो सकता है जिसने खुद अपनी आधी जिंदगी विदेश में बिताई और जब खुद पर लात पड़ी और अहम् को चोट पहुंची तो भारत आ कर एक महात्मा बन गया| पर महात्मा बन कर भी क्या किया एक हिन्दू हो कर जो इसने विदेश में कमाया था यानि इसाईयत वो इसने भारत में दिखाया और सभी को मुर्ख बनाया| जो इन महान राष्ट्रपिता का नारा था की "अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर तमाचा मारे तो अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो" ऐसा केवल बाइबल में ही है की जो भी कष्ट को भुगतो और कुछ मत करो यानि की पाप को सह कर भी शांत बने रहो और हमारे एक महान ग्रन्थ "गीता" जो की पुरे विश्व में सभी के द्वारा ग्रहित ग्रन्थ है उसमे साफ़-साफ़ लिखा है की पाप को सहना और और सह कर उसे बढ़ावा देना भी एक पाप और पाप के भागिरदार बन रहे हैं| तो क्या हमारे देश में देश के राष्ट्रपिता ने हमारे महान ग्रंथो से सबको दूर करने का एक भ्रम जाल फैलाया? और अगर राष्ट्र के पिता की बात को देखें तो इस राष्ट्र के पिता तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और कलाओं को दिखने में माहिर भगवन कृष्ण भी नहीं हुए और ना ही उनकी कोई चाह रही क्यूंकि उन्होंने नाम के लिए कार्य नहीं किया| उन्होंने भी भारत को माता ही माना और माता की ही संज्ञा दी| किसी को रास्ट्रपिता कहने से बड़ा भारत माता का क्या कोई बड़ा अपमान नहीं हो सकता|


माननीय A P J ABDUL KALAMJI राष्ट्रपति पद के सबसे अच्छे उम्मीदवार थे तथा मुस्लिम भी तो सेक्युलर शब्द भी पारित हो रहा था इन पर इसके अलावा इनका पिछला कार्यकाल अभी तक के सभी के कार्यकालों में एक अग्रणी कार्यकाल था परन्तु उनमे एक कमी थी की वो सोनिया के पालतू तथा आज्ञानुसार चलने वाले नहीं थे और ना ही बन सकते थे| विदेशों  मे आदमी से ज्यादा कुत्तों को ही प्यार मिलता है इटली मे ऐसा कुछ ज्यादा ही है| चलो इक कुत्ता छाँट कर राष्ट्रपति बनाया जा रहा है| इसलिए कलाम जी भी खड़े नहीं हुए| बी. जे.पी. को इक आदमी अपनी पार्टी मे नही मिला| हारे तो हार जाता क्यूंकि हार और जीत तो हमेसा लगी ही रहती है| पर इतनी बड़ी पार्टी को शर्म आनी चाहिए| कोई भी बृद्ध कार्यकर्ता ना मिला तो करोडो कार्यकर्ताओ की पार्टी कैसी???

माननीय अडवाणी जी आपके साथ मे बहुत लोगो ने जीबन भर काम किया है पर इन संगमा महोदय ने क्या किया है बी जे पी के लिए| मै सैंकड़ों नाम गिना सकता हूँ जिन्होंने हिंदुत्ब के लिए पूरा जीवन लगा दिया उनमे से एक छाँट लेते| बी जे पी की हार का एक मात्र कारण ये है कि ये अपने कार्यकर्ताओ का समुचित ध्यान नहीं रखती और कांगेस से आये भगोडो को भी तुरंत टिकिट देती है| अभी भी समय है ढूंढ़ लो अपना सही उम्दमीवार| 

साथ ही संसद में सभी सेक्युलरों के साथ बैठ कर हिंदुत्व की विचारधारा पर बनी पार्टी सेक्युलर बनती जा रही है और इसका खामियाजा ये हमेसा भुगत रही है| बी जे पी ये जानती है की अल्पसंख्यक वर्ग उसे कभी वोट नहीं देगा पर राजग के नेता साथ ही कुछ बी जे पी के नेता अल्पसंख्यकों को लुभाने में लगे हैं जालीदार टोपी पहन कर| अरे झूठे मुर्ख सेक्युलरों टोपी किसी और को पहना रहे हो या खुद टोपी पहन रहे हो|

ये सेक्युलर शब्द जब सबसे ज्यादा हिन्दू मुस्लिम हुआ देश के बंटवारे के समय उसी समय क्यों नहीं संविधान में जोड़ा गया क्यूंकि संविधान तो बाबा भीम राव आंबेडकर ने ही बनाया था| ये शब्द १९७७ में जब इमाम बुखारी इंदिरा गाँधी के विपक्ष में खड़े हुए जनता दल के प्रचार में तभी क्यूँ संविधान संसोधन के जरिये जोड़ा गया? क्या मंसा थी १९७७ में इस शब्द को जोड़ने के पीछे? क्या जो संविधान में इस शब्द के पीछे लोगों को दिखने के लिए जोड़ा गया वो पूरी तरह से पारित हो रहा है? या ये सेक्युलर शब्द केवल हरा रंग का कपडा और जालीदार टोपी पहनने और पहनाने तक सिमट कर रह गया है और पूरा देश इसका मखौल बन रहा है| और जो सच्चे सेक्युलर हैं उन्हें सांप्रदायिक घोषित कर दिया जा रहा है|


अभी हाल ही में कोसीकलां में दंगा हुआ जिसके थोड़े समय पहले जब उत्तर प्रदेश की सरकार बनी तो मुस्लिम बहुल इलाके में शिविर लगा कर हथियारों के लाइसेंस बांटे गए| एक ही वर्ग क्यूँ भाई? हिन्दुओं को क्यों नहीं बाँटा गया ऐसे लाइसेंस? और इस लाइसेंस बांटे जाने के थोड़े समय पश्चात क्या हुआ एक दंगा| वैसे भी भारत में दंगों का इतिहास बहुत ही प्यारा रहा है| देश का संविधान बनने के बाद १९५० से लेकर १९९५ तक में ११९४ दंगे हुए हैं| इनमे से कुछ दंगों को हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने अपने बयानों से भड़काया है और लाखों लोग मारे इनकी अंधी अति महत्वाकांक्षा के चलते| और क्या हुआ इन्ही प्रधानमंत्रियों को भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया| खुद उस प्रदेश में जहाँ से आज खुद को सेक्युलर कहने वाले कुछ क्या बड़ी तादाद में लोग खुलेआम अपने आदर ही अन्दर जल रहे हैं और जब मौका मिलता है तो इस बात को प्रगट भी कर देते हैं क्यूंकि उनकी रोटियां नहीं सिक रही हैं उस महान प्रदेश में जहाँ का मुख्य मंत्री एक निचे वर्ण का पर कर्म से महान हिन्दू है| वो प्रदेश है गुजरात| इसी गुजरात में १९५० से लेकर १९९५ तक में २९५ दंगे हुए उसके बारे में कोई नहीं बोलता पर २००२ के दंगे को लेकर आज के महान हिन्दू सम्राट और एक सच्चे राष्ट्रभक्त मोदी को मौत के सौदागर की उपाधि से नवाजा गया| कौन जिम्मेदार था इन २९५ दंगो के लिए और उसमे मारे गए निरीह इंसानों के लिए? तथा उन्ही स्वघोषित झूठे सेक्युलरों से मेरा एक सवाल २००२ के बाद से कितने दंगे हुए गुजरात में? मीडिया ने भी इस दंगे पर खूब पैसे बटोरे और कमोबेश आज भी बटोर रही है पर २००४ से २००८ के बिच महाराष्ट्र में हुए कुल छोटे बड़े दंगे मिला कर हुए ६८१ दंगो का क्या, उत्तर प्रदेश में इसी दौर में हुए ६१३ दंगों का क्या? क्या इन दंगों में लोगो की मौत नहीं हुई? मीडिया यहाँ क्यों चुप है?

अरे महामुर्खो इस मौत के सौदागर कहे जाने वाले मोदी जी ने ही किसी भी जाँच के आदेश खुद दिए थे और सुप्रीम कोर्ट तक ने 2002 के दंगे की जाँच करवाया| पर अगर अभी के उत्तर प्रदेश के हाल के चल रहे दंगे में महान सेक्युलर और हमेसा जालीदार टोपी पहने रहने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके सुपुत्र तथा उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्य मंत्री अखिलेश यादव, और उत्तर प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आज़म खान ने क्यों न्यायिक जाँच के लिए मना कर दिया? क्यूँ नहीं मीडिया कोसीकलां का एक भी न्यूज़ दिखा रही है? जबकि २१ दिनों से कोसीकलां में सभी दुकाने और बाजार बंद थे| पर ये दुकाने और बाजार हिन्दुओं के थे| क्या हिन्दुओं के नुकसान का कोई मोल नहीं है इन सेक्युलरों के आँखों में? या ये एक ऐसी गन्दी राजनीती खेल रहे हैं जिसका दूरगामी परिणाम एक ही है "गृह युद्ध"|

अब ये भारत की जनता अपना अघोषित राष्ट्रपति तो नहीं चुन सकी पर प्रधानमंत्री तो चुन सकती है| मित्रों अपना प्रधानमंत्री जो राष्ट्रप्रेमी और जिसने खुद को साबित किया हो उसे आप सभी अपना प्रधानमंत्री चुन इन नकली सेक्युलरों के गाल पर जोरदार तमाचा मारिये और इन्हें बता दीजिये की भारत की जनता ना तो अंधी है और ना बहरी है पर जब बोलती है तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद कर देती है|

मित्रों मैंने अपना प्रधानमंत्री चुन लिया है| वो हैं विकास पुरुष और सच्चे सेक्युलर माननीय "श्री नरेन्द्र मोदी जी"| अब आपकी बारी है!!!


जय श्री राम
वन्देमातरम




21 Jun 2012

सेक्युलरों बाज आ जाओ अपनी हरकत से


हिन्दुओ को गाली देने वालो बाज आ जाओ हिंदू है तो इतना सुन भी रहे है, अगर इतने ही बड़े बहादुर हो तो श्रीनगर मे तिरंगा जलाने से रोक लेते, लाल चौक पर हर साल तिरंगा फहराते, नागालेंड मे गोमाता के कटे हुए सर और उनका बिकता हुआ गोमांस रोक लेते| 

क्या खा गया था तुम्हारा सेक्युलरिज्म जब निर्दोष सिखों को पुरे देश मे सड़कों पर काटा जा रहा था इंदिरा गांधी के बदले मे क्या सब के सब दोषी थे| सेक्युलरिज्म की बात करते हो और कट्टर पंथियों और अलगाववादियों के तलबे चटने बुखारी और गिलानी के पास जाते हो| भरत माँ को डायन कहने वाले और राम को गाली देने वालो को आदाब करते हो| 

अगर तुम्हारे जैसे गद्दार न होते तो इस देश का मुसलमान कभी का घर वापस आ गया होता| अगर हिंदू कश्मीर के मेवाती मुसलमानों को पुनः मूल धारा मे शामिल करने तैयार हो तो एक दिन मे सारा कश्मीर हिंदू बहुसंख्यक हो सकता है| गरीब अनपढ मुसलमान को कब तक धर्म के नाम पर, जिहाद के नाम पर गुमराह करके मरवाते रहोगे, कोई जन्नत बन्नत मे हूरे नहीं होती क्यों बेबकुफ़ बना रहे हो| 

अरे सेक्युलरो देश की धर्म संस्कृति, शिक्षा, चरित्र का कबाडा तो करा दिया, माँ बहिनों की इज्जत भी तुर्क पठानों से लुट्वाली, अपनी बहन बेटी भी मुगलों को दे दी, अपने डोले भी तुम्ही जैसो ने तुर्क पठानों के महलों मे पहुचाये थे उन्ही कायरो की औलाद जान पड़ते हो या किसी माँ बहन से बलात्कार मे तुम्हारे पुर्बज पैदा हुए होगे लाज शर्म के कारण उनको हिंदू पिता ने नाम दिया होगा, बरना हिंदू धर्म की महानता उदारता मे ही है सेक्यूलरिज्म और कही नहीं है, अगर इतने बड़े सेक्युलर हो तो अपनी भीं बेटियों को लब जिहाद से बचालो, बोट के खातर ईमान बेचने वालो, शराब बाँट कर चुनाब जीतने वालो, बिदेशी कम्पनीयों से कमीशन खाने वालो तुमको देख कर तो सूअर को भी लज्जा आ जाये, जिस ड़ाल पर बैठें हो उसी को काट रहे हो, पैसे कमाने के लालच मे जनता को सरकारी ठेकों से शराब बाँट रहे हो, जनता को दिमक से कमजोर करके बोट बटोरते हो तब इसको तुम्हारा सेक्युलर चरित्र कहा जाता है|


अनाम



19 May 2012

धर्मनिर्पेक्षता और हमारा भारत: पर क्या है सच्चाई?


जब कभी कही धार्मिक उन्माद होता है तो स्वयंभू धर्मनिर्पेक्ष रोना चालू कर देते हैं और बोलते हैं की अगर ये सब नहीं रोका गया तो बहुत जल्द भारत में एक आतंरिक लड़ाई चालू हो जाएगी जैसी आज तक भारत में नहीं हुई| अब इतना देखने के बाद मैंने धर्मनिर्पेक्षता को नजदीक से जानना चाहा पर मुझे केवल यही मिला की आज हम जिसे भी देखते हैं चाहे वो जिस पद पर भी बैठा है या जहाँ भी है वो धर्मनिर्पेक्षता की बात करता हुआ दिख जाता है पर धर्मनिर्पेक्षता का मतलब नहीं बता पता है| धर्मनिर्पेक्षता एक बहुत अच्छी बात है| सारे धर्म के लोगो को जोड़ कर एक करने की बात है, एक पथ पर लाने की बात है जैसा धर्मनिर्पेक्ष बताते हैं| पर असल में क्या है ये धर्मनिर्पेक्षता? आइये हम सबसे पहले इस धर्मनिर्पेक्षता का मतलब समझाने की कोशिस करते हैं भारत के सन्दर्भ में|

जहाँ तक भारत में धर्मनिर्पेक्षता का सवाल है, भारत सरकार के तरफ से ही धर्मनिर्पेक्षता की कोई परिभाषा नहीं दिया गया है तो क्या ये धर्मनिर्पेक्षता केवल इस लिए है की जो हमारी सरकार चाहे या धर्मनिर्पेक्षता को लेकर जो भी सोच हो हम पर जबरदस्ती थोप दिया जाये| धर्मनिर्पेक्षता नामक इस गूढ़ प्रश्न का सर्वविदित उत्तर देखें तो वो होता है की देश में सभी धर्मों का दर्जा बराबर रहे कहीं से कोई अंतर ना रहे किन्ही भी धर्मो के बिच में चाहे धर्म के नाम पर चाहे उस धर्म को मानने वालों के संख्या के आधार पर| देश में उपस्थित सारे धर्मों को अपने धर्मानुसार आगे बढ़ने की आज़ादी हो और वो बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के| देश की सरकार का धर्म से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए| धर्म देश में रहने वाले लोगो का व्यक्तिगत सोच हो और राह हो|

पर भारत में धर्मनिर्पेक्षता को पूरी तरह से गलत तरीके से समझाया या बताया जाता है कुछ लोगों की अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए| पिछले ६५ सालो में हमने बहुत से राजनेता देखे जो दिल्ली की संसद में बैठ कर हमर देश पर राज कर रहे हैं या किये पर सभी ने धर्मनिर्पेक्षता की परिभाषा अपने स्वार्थ अनुसार दिया ताकि इनकी बनी बनाई दुकान हमेसा फलती फूलती रहे चाहे भारतीय जनता भांड में जाये|

अब अगर हम हमारे संविधान को देखें तो सबसे पहले संविधान संसोधन के ४२ चरण में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया और उसके कालम २५-१ में साफ-साफ लिखा है, "धार्मिक अंतःकरण का अधिकार सभी को है, जो चाहे अपने धर्म को खुलेआम व्यक्त कर सकता है, अपने धर्म की बात कर सकता है, अपने धर्म को फैला सकता है|" पर इसके साथ एक और बात संविधान में जोड़ी गई की देश धर्म से जुडी बातो पर ध्यान दे सकता है की इससे दुसरो को आर्थिक और शारीरिक रूप से कोई कष्ट ना हो| इतना ही नहीं लिखा है हमारे संविधान में बल्कि इसके आगे भी लिखा गया है जो की बहुत ही महत्वपूर्ण है|

संविधान के कालम २८ में लिखा गया है की, "कोई भी धार्मिक संस्थान को सरकारी फंड से मदद नहीं मिलनी चाहिए|"

पर हमारे देश की ६५ सालो की सरकारों ने संविधान के इन सिद्धांतों को इतना तोड़-मरोड़ दिया की ये धर्मनिर्पेक्ष शब्द मात्र एक मखौल बन कर रह गया हमारे देश में| अब जब हमारे संविधान में सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्ष की परिभाषा दे दी गई है की कोई भी भारतीय सरकार से जुड़ा किसी धर्म के बारे में नहीं सोचेगा और न ही व्यक्तिगत रूप से उस धर्म से जुड़े लोगो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने से जोड़ने की कोशिस करेगा तब हमारे राष्ट्रपति भवन में कभी ईद के मौके पर तो कभी दिवाली के मौके पर क्यों लोगो को आमंत्रित किया जाता है| हमारे नेता फिर चाहे वो जो कोई भी हो वो अधिकांश तौर पर इदी बांटते दिख जाते हैं दुहाई दी जाती है धर्मनिरपेक्षता की| हद तो तब हो जाती है जब चुनाव के मौके पर किसी धर्म विशेष के लिए आरक्षण की मांग कर दी जाती है| चलिए छोडिये हम आरक्षण के बारे में यहाँ क्या बताये हमारा मुद्दा तो धर्मनिरपेक्षता है उसके बारे में आगे बताते हैं|

जब संविधान के कालम २८ में ये साफ़-साफ़ लिखा है की किसी भी धार्मिक संसथान को सरकारी फंड से मदद नहीं मिलनी चाहिए तब कुछ चर्चों और मदरसों को कैसे मदद दी जा रही है क्या हमारे देश की संविधान का सीधा-सीधा उलंघन नहीं है?

असलियत ये है की जो भी धर्मनिरपेक्षता की बात करते दीखते हैं वो ही सबसे ज्यादा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं फिर चाहे वो हमारे धर्मनिरपेक्ष नेता हों या हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकार| इसके पीछे और कोई कारण नहीं होता बल्कि उन नेताओ और सरकारों का व्यक्तिगत लाभ होता है जो धर्म के नाम पर अल्पसंख्यक दिखा राजनीती चाल चलते दिख जाते हैं| जबकि संविधान में एक दम सरल भाषा में कहा गया है की कोई भी सरकार धर्म के नाम पर राजनीती नहीं कर सकती है पर ६५ सालों से धर्म के नाम पर राजनीती करती आ रही हैं सारी धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ| सारी धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ केवल धार्मिक अल्प्संख्यकता को ढाल बना कर उक्त धर्म से जुड़े लोगों को बहलाती फुसलाती हैं जिसका उल्टा असर दुसरे धर्म के लोगो पर पड़ता है जोकि पूरी तरह लाजमी है और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है|

आज तक धर्मनिरपेक्ष भारत में धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने धार्मिक अल्प्संख्यकता का कोई माप दंड नहीं दिया की देश की कुल जनसँख्या का कितना प्रतिशत होने पर उक्त धर्म विशेष को अल्पसंख्यक घोषित किया जायेगा|

अब इन धर्मनिरपेक्षों के सामने मै कुछ सवाल रखना चाहूँगा और आशा करूँगा की धर्मनिरपेक्ष इन सवालो का सीधा और सरल भाषा में जवाब देंगे:-

१. जम्मू-कश्मीर में १९४६ से साम्प्रदायिकता कैंसर की तरह फैली हुई है और खुलेआम वहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला ने पहले तो १९४६ में विद्रोह किया जम्मू-कश्मीर को मुस्लिम राष्ट्र बनाने और वहाँ के तत्कालीन राजा, महाराज हरी सिंह तक को जम्मू-कश्मीर छोड़ने की धमकी दी और फिर आजाद भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय के बाद खुलेआम भाषण देते देखे और सुने गए की जम्मू-कश्मीर केवल मुसलमानों का है यहाँ के हिन्दुवों को यहाँ से भगा दिया जाये| और परिणाम आज सबके सामने है की कश्मीर से एक तरह से सारे हिन्दू परिवारों को अपना बसा-बसाया घर छोड़ना पड़ा और दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर होना पड़ा| वहाँ के हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद बना दिया गया और ये सब हुआ आजाद भारत में| तब कोई धर्मनिरपेक्ष क्यों नहीं आया सामने?

२. गुजरात दंगे की बात करते हैं आज लोग, शुरुवाती दौर में १९९५ तक में २९५ दंगे हुए गुजरात में और तब शासन में हमारी अभी की धर्मनिरपेक्ष सरकार ही थी और साथ ही अधिकतर दंगाई पाकिस्तान भाग गए उदहारण के तौर पर मै गोधरा के सदवा रिज़वी और चुडिघर का नाम लेना चाहूँगा|

३. गोधरा में साबरमती ट्रेन के साथ ५८ मासूम जानें जलीं तब कहाँ थे ये धर्मनिरपेक्षी|

४. १९८४ में कहाँ थी ये धर्मनिरपेक्षता जब सिखों को खुलेआम सड़कों पर काटा जा रहा था और हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री और भारत रत्न धारी राजीव गाँधी जी ने कहा था की जब बड़ा पेंड गिरता है तब उसके आस पास की धरती हिलती है तो इसमें परेसान होने वाली बात नहीं है| क्या ये धर्मनिरपेक्षता का उदहारण दिया था तब तत्कालीन भारत रत्न विजेता प्रधानमंत्री जी ने?

५. भोजसाला का सरस्वती मंदिर जो की आज भोजशाला कमाल मौला मस्जिद बन चूका है और अभी कुछ समय पहले तक हिंदुवो को साल में एक बार बसंत पंचमी के दिन उस मंदिर के प्रान्गड़ में जाने की इजाजत थी और मुस्लमान हर शुक्रवार को वहाँ नमाज अदा करते थे पर कुछ लोगों के प्रयास और जान गंवाने के बाद हर मंगलवार को मंदिर को हिंदुवो के लिय खोला गया जबकि उस मंदिर में खुदाई करके भी जांचने की जरुरत नहीं है बल्कि वहाँ उस मंदिर की दीवारों और चबूतरों पर आज भी श्लोक खुदे हुए मिले हैं जो एक मस्जिद में नहीं होते| ये क्या है धर्मनिरपेक्षता या कुछ और?

६. अभी हाल में ही हैदराबाद में मंदिर में घंटा बजने पर और राम नवमी मानाने पर प्रतिबन्ध लगाने वाली वहाँ की सरकार ही थी साथ ही हनुमान जयंती मानाने पर भी प्रतिबन्ध लगाने की मांग थी पर जनाक्रोश के कारण उसे पारित नहीं किया गया और कमोबेश इससे भी बदतर स्थिति जम्मू-कश्मीर और बंगाल में है|

७. बंगाल में मुसलमानों को अलग से १०% का आरक्षण देने के साथ-साथ वहाँ मस्जिदों में काम करने वालों को मासिक वेतन के साथ-साथ मुफ्त का इलाज और घर भी| ये कौन सी धर्मनिरपेक्षता है?

उपरोक्त पंक्तियाँ केवल उदहारण मात्र हैं हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष होने के मुखौटे की| ऐसी घटनाएँ लिखने बैठ जाएँ तो पता नहीं कितने ही पन्ने भर जायेंगे|

अब सवाल ये है की क्या सच में हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है या हमारे नेता और लोग जो धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते नहीं थकते हैं?

क्या अनेक कारणों में से कुछ कारण जो ऊपर उल्लेखित हैं वो आपको धर्मनिरपेक्ष दिख रहे हैं?

या यहाँ भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल, जो आज अल्पसंख्यक नहीं रहे उनके वोट को पाने के लिए, दुसरे धर्म विशेष के लोगों के हितों को तक पर रख कर और उन्हें धर्मनिरपेक्ष होने का लबादा ओढा कर नपुंसक बनाया जा रहा है? ताकि उस धर्म विशेष के लोग इतने निचे गिर जाएँ की इन नेताओं की आँखों में बसे इन अल्पसंख्यकों के टुकडो पर पालें और उनके कदमो में पड़े रहें जैसा आज से १००० साल पहले हुआ था जब मोहम्मद गोरी नाम का आतताई आया और उसके बाद कई मुग़ल आते गए और उनमे से कुछ यहाँ बस गए| ये मुग़ल भी भारत की धरती पर वैसे ही घुसपैठिये की तरह आए जैसे की अंगरेज| गए केवल अंगरेज| मुग़ल नहीं गए| तो भारत तो १००० साल से गुलाम था आजाद कब होगा ये नहीं पता और ना ही ये पता है की आजाद होगा भी की नहीं ऐसी स्थिति के चलते?


क्या हम सब आज भी धर्मनिरपेक्षता के आड़ में गुलाम बने रहना चाहते हैं जैसे १००० सालों से गुलाम बने हैं?

क्या हमारे अन्दर का खून पानी बन गया है?

क्या हमारी आत्मा मर चुकी है या खुद हम?