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2 Jan 2025

पति पीड़ा

 पतियों की पीड़ा


हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज है। इस समाज मे ऐसा तानाबाना बुना गया है जिसमे पत्नी ही पीड़ित होती है। ऐसे अनगिनत दर्दनाक घटनाएँ भी रही हैं।


लेकिन भौतिकतावाद के प्रताड़ना की भेंट आज पति हो रहा है। अभी हाल में ही दो पतियों ने अपनी ईहलीला समाप्त की।


पत्नियां झूठे केसों में पतियों को फंसा रही हैं। भारत का कई देशों से चुराया हुआ कानून भी पत्नियों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।


जरूरी नहीं कि शारीरिक रूप से ही प्रताड़ना हो बल्कि उससे कहीं घातक होती है मानसिक प्रताड़ना। सालों साल की मानसिक प्रताड़ना में पति अपने होशो हवास खो कर सिर्फ मौत को गले लगाना ही आसान समझ रहा है। क्योंकि कार्यस्थल की परेशानियां और वहां से घर आने पर घर के अंदर मानसिक परेशानियां कहीं न कहीं पतियों को अंदर से खोखला कर दे रही हैं।


पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास के साथ साथ आपसी समझ का ज्यादा होता है। अगर आपसी समझ खत्म तो सब खत्म।


पति खत्म, पत्नी.........

25 Feb 2014

Communalism a bigger problem than Corruption : Kejriwal

भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा है सांप्रदायिकता : केजरीवाल


भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से पैदा हुआ फोर्ड और CIA का दलाल केजरीवाल आ गया अपनी असली औकात पर। हम शुरू से कह रहे थे की इस केजरीवाल को भ्रष्टाचार से कोई लेना देना नहीं, बस इसने भ्रष्टाचार विरोधी मुखौटा पहन रखा है ताकि चंदे के धंधे को आगे बढ़ा सके। 

केजरीवाल ने India Islamic Cultural Centre in Delhi मे अपने भाषण के दौरान सीधे तौर पर कहा की "भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा है सांप्रदायिकता"

केजरीवाल ये बातें कहते वक्त अकेले नहीं थे बल्कि चाँदनी चौक से आम आदमी पार्टी के लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार आशुतोष गुप्ता भी केजरीवाल के साथ थे। जो केजरीवाल राजनीति मे आते वक्त भौंकते हुए नहीं थकता था की हम राजनीति करने नहीं बल्कि राजनीति को बदलने आए हैं, हम जातिगत राजनीति नहीं करेंगे, हम धर्म आधारित राजनीति नहीं करेंगे, हमारा सिर्फ एक मात्र मुद्दा रहेगा जनलोकपाल और भ्रष्टाचार। वही केजरीवाल हमेसा मुस्लिम नेताओं को तरजीह देते रहे, केजरीवाल को कभी भी दंगा करने एवं कई हत्याओं के दोषी मुस्लिमों से उनके चरणों का आबे-जमजम लेने मे कोई बुराई नहीं दिखी। 

केजरीवाल और आशुतोष गुप्ता की जोड़ी इतने पर ही नहीं रुकी बल्कि आशुतोष गुप्ता तो केजरीवाल से भी 2 कदम आगे निकलते हुए वहाँ उपस्थित मुस्लिमों को मोदी विरोधी सीख देने मे लग गए।

आशुतोष गुप्ता ने कहा की, "कभी भी उस इन्सान (मोदी) का विश्वास ना करना जो पटना ब्लास्ट मे घायल और मृत लोगों से मिलने के लिए सैकड़ों मील चल के आ गया लेकिन गुजरात मे भी गुलबर्ग सोसाइटी मे दंगे मे मारे गए मुस्लिमों से मिलने नहीं गया।"

आशुतोष ने यहाँ परोक्ष रूप से ये जताया की पटना मे हुए ब्लास्ट मे मरने वाले सिर्फ हिन्दू थे और गुलबर्ग मे मरने वाले मुस्लिम। अब ऐसे मे कोई महामूर्ख ही होगा जो ये कहेगा की आम आदमी पार्टी जातीय या धर्म की राजनीति नहीं करती है। आम आदमी पार्टी और इस पार्टी से जुड़ा हर नेता सिर्फ एक दलाल है इससे ज्यादा और कुछ नहीं। आम आदमी पार्टी का प्रादुर्भाव ही सिर्फ मोदी को रोकने के लिए हुआ है।

बात यहीं नहीं खत्म हुई बल्कि कल जो India Islamic Cultural Centre in Delhi इवैंट का ऑर्गनाइज़र था उसने कहा की आज तक भारत मे जितने भी दंगे हुए क्या आम आदमी पार्टी शासन मे आने पर उन सभी दंगों का SIT जांच करवाएगी ? 

इस सवाल के जवाब मे केजरीवाल ने तुरंत कहा की "भारत मे हुए 23,500 दंगों की जांच फिर से एक नए सिरे से SIT से कराई जाएगी।"

अब कोई आपिया मुझे ये समझाये की ये दलाल केजरीवाल क्या भारत मे आज तक हुए 23,500 दंगों का दोषी हिंदुओं को ही मानता है।

ये वही केजरीवाल है जिसने कुछ समय पहले एक मौलवी से मिल कर दिल्ली को तहरीर चौक बनाना चाहा था। इसके लिए केजरीवाल बाकायदा उस मौलवी "मौलाना हसरत अली" से मदद मांगने गया था दिल्ली को तहरीर चौक बनाने के लिए। अब सभी जानते हैं की तहरीर चौक बन जाता अगर दिल्ली तो दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरा भारत उस आग मे जलता रहता और केजरीवाल अपनी पुंछ उठा कर अपनी बीबी जो की सोनिया गांधी की चहेती है उसके साथ अपने बाप CIA की मदद से भारत से भाग चुका होता।

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उपरोक्त इन सभी कथनों से आपको क्या शिक्षा मिलती है ? अगर ये सवाल मैं किसी छोटे बच्चे से भी करूँ तो वो यही कहेगा की ये केजरीवाल सिर्फ एक दलाल और देश का ऐसा गद्दार है जिसे सुवरबाड़े मे डाल कर इसके ऊपर हरी-मिर्च और नमक की चटनी मल कर सुवरों को परोस देना चाहिए।

हिन्दू-मुस्लिम मे जो एक खाई भरनी चालू हुई थी एवं मुस्लिम भी अपने विकास को सोच रहा था उस खाई को फिर से ये दलाल/गद्दार केजरीवाल खोद कर इतना बड़ा बनाना चाहता है ताकि उसमे ये अपनी दलाली का चंदा बटोर सके और देश को फिर से गुलाम बनवाए।

कभी मायावती ने नारा दिया था "तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार"

अभी सभी राष्ट्रभक्तों को ये नारा अपनाना चाहिए, "चंदा, धंधा और केजरीवाल, इसको मारो रोज जूते चार"

18 Jan 2014

Arvind Kejriwal or Anti-National Natwarlal





अरविंद केजरीवाल या राष्ट्रद्रोही नटवरलाल

हाल ही मे दिल्ली के मुख्यमंत्री बने माननीय अरविंद केजरीवाल जी की मंशा क्या है ये समझ से परे है। क्यूंकी ना तो उनकी जुबान उनके कर्मों का साथ देती है और ना ही दिल की सफगोई उनके आँखों मे उतरती है कभी। लेकिन फिर भी जो कुछ वो अभी तक पर्दे के आगे रहते हुए भी भोलेपन मे जोश के साथ कहते रहे थे, वो दिल्ली प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बदस्तूर जारी है।


अन्ना के आंदोलन के समय से लेकर दिल्ली मे चुनाव लड़ने के पहले तक केजरीवाल लगातार खुलासे तो कर रहे थे, अनसन तो कर रहे थे लेकिन इसके साथ-साथ केजरीवाल लगातार, अनवरत भारत की न्यायिक प्रणाली पर सवाल उठाते रहे। अगर भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने भी कोई फैसला सुनाया और वो फैसला इनके प्रतिकूल गया तो सीधा कहा और बारम्बार कहा की कोर्ट ने गलत किया है। वहीं अगर कोर्ट का फैसला इनके विरोधियों के हक मे गया तो भी कोर्ट गलत है और कोर्ट के आदेश की हर समय इन्होने ना सिर्फ अवहेलना की बल्कि जितना संभव हुआ कोर्ट के आदेशों का मखौल उड़ाया।

इस प्रकार से देश के न्यायालयों का मखौल उड़ाना वो भी लाखों की जनता के सामने ये एक प्रकार का देश-विरोधी कार्य है। 


१॰ सबसे पहले तो स्टडी लीव पर गए और बिना रीजाइन दिये इन्होने अपना एनजीओ चालू कर लिया। भारत सरकार मे एक अधिकार पद पर रहते हुए ना सिर्फ इन्होने अपना एनजीओ चालू किया बल्कि विदेशों से चंदा तक लिया, जो की कानून अपराध है।

२॰ जन भावना को इन्होने हर समय उकसाने वाला कार्य किया चाहे वो दामिनी के समय विरोध प्रदर्शन के समय अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा पुलिस पर पत्थर चलवा कर एक शांत आंदोलन को उग्र आंदोलन का रूप दिया।

३॰ खुलासे किए, एक से बढ़ कर एक खुलासे किए लेकिन क्या कोई भी एक बात बता सकता है की इनके खुलासों की परिणति क्या हुई। इन्होने अपने कितने खुलासों को सही साबित किया।

४॰ पूरी जनता और मीडिया के सामने इन्होने उन सभी लोगों के बिजली कनेक्सन जोड़े जिनके कनेक्सन बिजली बिल जमा ना देने के वजह से काट दिये गए थे। क्या अगर दूसरे राज्यों मे ऐसा ही शुरू हो जाए तो कोई भी बिजली बिल जमा ना करे और पूरा भारत बिना बिजली बिल दिये बिजली का उपयोग चालू कर दे। उदाहरण के तौर पर सभी भारतवासी केजरीवाल का उदाहरण देने लगे की साहब केजरीवाल ने तो मीडिया के सामने जोड़ा था काटा गया कनेक्सन और उनको तो कुछ भी नहीं हुआ तो हमे किस आधार पर पकड़ोगे आप।

५॰ केजरीवाल ने भारत सरकार मे कार्य करने वाले सभी अधिकारियों से अपील की कि सभी अपनी नौकरी छोड़ कर आंदोलन करें। क्या अगर ऐसा हो जाता तो भारत कि स्थिति क्या होती इसके बारे मे कभी केजरीवाल जी ने सोचा। 

६॰ बाटला हाउस एंकाउंटर मे शहीद का ना सिर्फ अपमान किया बल्कि बाटला हाउस एंकाउंटर सही था ऐसा कोर्ट का फैसला आ जाने के बाद भी उस एंकाउंटर पर सवालिया निशान लगाते हुए क्या केजरीवाल ने राष्ट्रद्रोही कार्य नहीं किया।

मुख्यमंत्री बनने से पहले केजरीवाल द्वारा कानून तोड़ने की फेहरिश्त बहुत लंबी है, बाकी बातें बाद मे अभी सरकारी केजरी बाबू की कारस्तानी देखते हैं।

अब जब सरकार बन गई केजरीवाल जी की तो भी ये कानून तोड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं और भारत की न्यायपालिका का अनवरत मज़ाक बना रहे हैं। 

१॰ केजरीवाल की दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती को कोर्ट ने अपराधी बताते हुए उनकी १ या २ महीने की वकालत की प्रैक्टिस पर बैन लगा दिया था क्यूंकी सोमनाथ भारती अपने जिस भ्रष्टाचारी मुवक्किल को बचाने की कोशिस कर रहे थे उस कोशिस मे उन्होने गवाह को फोन कर धमकाया इत्यादि जो करना हुआ फोन पर किया जो की कोर्ट के कार्य मे व्यवधान है। लेकिन इस पर अरविंद केजरीवाल ने बयान दिया की "कोर्ट से गलती हुई।"

२॰ सोमनाथ भारती ने मीडिया को बुला कर अपनी विधानसभा क्षेत्र मे विदेशी छात्रों के घर पर आधी रात को ना सिर्फ अपने समर्थकों समेत रेड मारी बल्कि पुलिस को धमकाया की पुलिस उन सभी महिलाओं को रात के समय गिरफ्तार करे साथ ही एक विदेशी छात्रा को कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने अपने सामने शौच करने के लिए बाध्य किया। जबकि भारतीय कानून के हिसाब से पुलिस ना तो रात को महिला को गिरफ्तार करके थाने ले जा सकती है और कानून मंत्री का अपने सामने महिला द्वारा शौच करवाना भारतीय कानून के हिसाब से बलात्कार कहलाता है। लेकिन इतने पर भी अरविंद केजरीवाल जी ने अपने कानून मंत्री जिसको कानून की जरा भी समझ नहीं है उसकी पीठ ना सिर्फ थपथपाई बल्कि उसको लेकर उपराज्यपाल के पास पहुँच गए।

अब जरा कोई अरविंद केजरीवाल को समझाये की महोदय पुलिस ने कोई गलत कार्य नहीं किया बल्कि कानून के दायरे मे रह कर अपना कर्तव्य निभाया है। साथ ही जब आपको पहले से पता था की दिल्ली पुलिस दिल्ली के मुख्यमंत्री के हाथों मे नहीं है तो इतने दिनों मे आपने कौन सा कदम उठाया है दिल्ली पुलिस को दिल्ली के मुख्यमंत्री के अंड़र मे करने का। आपको तो सरकार बनाते ही सबसे पहले ये कार्य करना चाहिए था।

३॰ अपनी पार्टी मे राष्ट्रद्रोही बयानों को बयानकर्ता का व्यक्तिगत मत कह कर टाल देना जबकि बयानकर्ता उक्त राष्ट्रद्रोही बयान देते समय पार्टी की टोपी के साथ पार्टी के बैनर तले बयान दे रहा हो। क्या ये राष्ट्रद्रोह का बढ़ावा नहीं है?

ये सभी घटनाक्रम अरविंद केजरीवाल द्वारा भारत की न्यायप्रणाली के साथ-साथ भारत के लोकतन्त्र का मखौल बनाने के लिए।

ऐसे मे मुझे "मौलाना हसरत अली" साहब का बयान सच जान पड़ता है जिसमे मौलाना हसरत अली साहब ने बताया है की अपने आंदोलन के शुरुवाती दिनों मे ही केजरीवाल हसरत अली जी से मिला था। हसरत अली साहब से अरविंद केजरीवाल ने कहा था की वो दिल्ली को तहरीर चौक बनाना चाहता है और इसमे हसरत अली साहब अरविंद केजरीवाल की मदद करें। तहरीर चौक (इजीप्ट) पर क्या हुआ था आज ये सभी जानते हैं और उस तहरीर चौक पर लगी आग आजतक इजीप्ट मे शांत नहीं हुई और आजतक इजीप्ट उस आग मे झुलस रहा है। 

इस प्रकार से हम देख सकते हैं की अरविंद केजरीवाल का मकसद भारत का भ्रष्टाचार खत्म करना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार विरोधी मुखौटे को पहन कर भारत देश के सभी देशवासियों के मन मे भारत की न्यायप्रणाली, लोकतन्त्र, अर्थतन्त्र और यहाँ तक की रक्षातन्त्र के खिलाफ ऐसा आक्रोश भर देना की लोग भारत के हर कोने से राष्ट्रविरोधी कार्यों मे लिप्त हो जाएँ। हर जगह कानून का मखौल उड़ाया जाए। गैरकानूनी कार्य भारत की जनता सीना तान कर करे। इन सभी घटनाओं के विश्लेषण को देख कर कहें तो अरविंद केजरीवाल ने भारत को आतंक एवं गृहयुद्ध के तरफ धकेलने के लिए उकसाया है। इस देश को ऐसे अवसाद मे धकेलने का षड्यंत्र रचा है अरविंद केजरीवाल ने जिससे जो देश अब प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है उसको नाइजीरिया, सीरिया इत्यादि देशों की श्रेणी मे खड़ा कर विदेशी हाथों की कठपुतली बना देना चाहता है।

लेकिन इन सभी कार्यों को अंजाम देने वाला अकेले केजरीवाल नहीं है बल्कि वो केंद्र सरकार भी है जिसने इस अरविंद केजरीवाल पर कोई कार्यवाई ना करके इसको अपने मन की करने की छुट दी।



17 Dec 2013

Justice Ganguli - Rapist or Soniya Gandhi's new Victim


जस्टिस गांगुली.....रेपिस्ट या फिर सोनिया द्वारा प्रताड़ित



जस्टिस गांगुली पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। आरोप लगाने वाली लड़की क्रिश्चियन है (लड़की के धर्म का जिक्र करना यहाँ जरूरी है, इसलिए जिक्र किया, कृपया अन्यथा ले कोई)। लड़की जस्टिस गांगुली पर यौन उत्पीड़न का कोई एफ़आईआर नहीं करना चाहती है। जस्टिस गांगुली का सिर्फ मीडिया ट्रायल चल रहा है।

आपको याद होगा की जस्टिस गांगुली पर जब यौन उत्पीड़न का आरोप लगा तब सुप्रीम कोर्ट ने जांच किया और आगे कुछ भी कार्य करने से मना करते हुए अपना जांच रिपोर्ट आगे बढ़ा दिया। उसके पहले और बाद से मीडिया जस्टिस गांगुली पर इतनी हमलावर हुई की उनको पद से हटाने तक का फैसला सुनाते हुए जस्टिस गांगुली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

लेकिन हालिया घटनाक्रम और माननीय सुब्रमनियम स्वामी जी द्वारा इस यौन उत्पीड़न घटना पर टिप्पणी कई बंद लिफाफे खोल कर सोचने पर मजबूर करता है।

सुब्रमनियम स्वामी जी ने बताया की जस्टिस गांगुली 2G घोटाले मे मुख्य जांचकर्ता हैं जिन्होने सोनिया गांधी की नींद उड़ा दी है। ऐसे मे जस्टिस गांगुली के ऊपर यौन उत्पीड़न का मात्र आरोप लगाना, वो भी एक क्रिश्चियन लड़की के द्वारा, लड़की का जस्टिस गांगुली के ऊपर यौन उत्पीड़न का एफ़आईआर करने से इन्कार करना, मीडिया समेत सभी कोंग्रेसी नेताओं का जस्टिस गांगुली पर मुखर विरोध और विरोध के एवज मे इस्तीफ़े की मांग, महिला आयोग द्वारा जस्टिस गांगुली के इस्तीफे की मांग लेकिन तेजपाल के मामले मे शांत बने रहना, कहीं ना कहीं दाल मे काला होने का या कहें तो पूरी दाल के ही काले होने का अंदेशा है।

अगर लड़की के द्वारा जस्टिस गांगुली पर लगाए आरोप को भी देखें तो वो भी हास्यप्रद होने के साथ-साथ संदेहास्पद  ज्यादा लगते हैं। लड़की ने पहले कहा की जस्टिस गांगुली ने लड़की को एक ही रूम शेयर करने को कहा, फिर लड़की ने कहा की जस्टिस गांगुली ने लड़की का हाथ चूमा और कहा की वो उससे प्यार करते हैं।

इन सभी घटनाक्रमों को देखें तो साफ-साफ दिखता है की सोनिया गांधी 2G घोटाले के जांच की आंच से बचने के लिए और जस्टिस गांगुली को ना खरीद पाने की स्थिति मे उन पर अपनी किसी यौन असंतृप्त, कभी यौन व्यापार की मंडी बनी वेटिकन की चमची द्वारा झूठा आरोप लगा कर जस्टिस गांगुली को महज बदनाम करने और 2G घोटाले की जांच से हटाने की साजिश रची है।

11 Dec 2013

Sheila Dikshit betrayed by Congress for LokSabha


मोदी के डर मे शीला दीक्षित का बलिदान किया कॉंग्रेस ने

अखबार मे पढ़ा की आम आदमी पार्टी केजरीवाल को मोदी जी के खिलाफ लोक सभा मे खड़ा करने के बारे मे सोच रही है।

इस खबर को पढ़ का दिमागी कीड़ा कुछ ज्यादा ही कुलबुलाने लगा....इसके कई कारण थे

१. केजरीवाल द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले एक सर्वे को मार्केट मे लाना की आम आदमी पार्टी के ४९% कार्यकर्ता मोदी को प्रधानमंत्री के रूप मे देखते हैं

२. केजरीवाल हालिया ५ राज्यों के चुनाव मे सिर्फ दिल्ली मे ही लड़े बाकी जगह पर नहीं क्यूंकी बाकी जगहों पर भाजपा इतनी तगड़ी थी की केजरीवाल का उस आँधी मे क्या हाल होता ये उनको पहले से पता था


लेकिन सबसे अहम कारण है.......केजरीवाल का शीला दीक्षित के खिलाफ रिकर्ड २५ हजार से ज्यादा मतों से जीत हासिल करना। केजरीवाल उस शीला दीक्षित के खिलाफ जीत हासिल किए जिस शीला ने १५ साल राज किया। लेकिन एक बात यहाँ गौर करने वाली है की शीला दीक्षित ने खुद अपनी विधानसभा मे खुद के वोट के लिए प्रचार नहीं किया। और शांति से बैठी रही ना कोई रैली, ना कोई पदयात्रा कुछ नहीं सिवाय घर पर बैठने के।

ऐसे मे केजरीवाल ने चुनाव मे शीला दीक्षित को रिकार्ड २५ हजार से ज्यादा मतों से हराया। लेकिन इस हार का चीर-फाड़ करने पर पता लग रहा है की कॉंग्रेस ने दिल्ली विधानसभा और शीला दीक्षित का बलिदान दिया ताकि केजरीवाल का कद बड़ा किया जा सके। केजरीवाल का कद इतना बड़ा किया जाये ताकि उसको मोदी जी के खिलाफ उतारा जा सके। क्यूंकी मोदी जी के खिलाफ उतारने के लिए कॉंग्रेस के पास कोई भी नेता नहीं है। ऐसे मे किसी ऐसे का कद बड़ा करना था जो थोड़ा सामाजिक हो और जनता मे जाना-पहचाना चेहरा हो। तो केजरीवाल के रूप मे कॉंग्रेस को एक मोहरा मिल गया।

कॉंग्रेस ने जैसे आईपीएस संजीव भट्ट की बीबी को गुजरात मे खड़ा किया लेकिन उसके पहले संजीव भट्ट का कद बड़ा किया, उसको मीडिया के द्वारा ईमानदारी का सर्टिफिकेट दिलवाया और भट्ट को केजरीवाल के नजदीक किया। 

वाह रे कॉंग्रेस हमेसा अपनों का बलिदान देने मे आगे रहती है वोट के लिए। सीता राम केसरी के बाद अब शीला दीक्षित का नाम कॉंग्रेस द्वारा बलिदान देने मे स्वर्णिम अक्षरों मे लिखा जाएगा।


8 Dec 2013

Delhi Election : A Learning Stage


दिल्ली चुनाव : एक सबक सभी के लिए


दिल्ली विधानसभा 2013 के हुए मतदान की मतगणना भी पूर्ण हो गई साथ ही रिजल्ट भी आ गए। इस चुनाव मे उम्मीद के मुताबिक बड़ी पार्टी के रूप मे कमल के खिलने को मैं भाजपा, नितिन गडकरी, नरेंद्र मोदी जी एवं सबसे अहम भाजपा के मुख्य मंत्री के ईमानदार उम्मीदवार डॉ हर्षवर्धन जी को बधाई देता हूँ। साथ ही 4-0 से जीत के लिए बधाई देता हूँ भाजपा के चारों प्रदेशों के समस्त कार्यकर्ताओं को। इस चुनाव मे अप्रत्याशित रूप से दूसरे स्थान पर आने वाली पार्टी जिसका अभी तक पंजीकरण भी नहीं हुआ "आम आदमी पार्टी" को भी बधाई देता हूँ। 

सबसे अहम है की दिल्ली का ये चुनाव हमे कई सीख दे कर गया। कहीं रुदालियों का दौर जारी है तो कहीं जीत के पटाखों के साथ नारों का शोर जारी है।

भाजपा के नेताओं को जमीनी स्तर पर और जुड़ाव चाहिए और अपने सैनिकों को चुनावी हथियारों से पूर्ण रूप से लैस करने की जरूरत के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं की बातों को ज्यादा ध्यान से सुनने की जरूरत है साथ ही कार्यकर्तों के सुझाओं का विश्लेषण कर उनपर अमल करने की जरूरत है। भाजपा को एक और जरूरत है अपने प्रतिद्वंदी को कभी भी कमजोर समझने की भूल ना करे।

साथ ही जिस प्रकार से दिल्ली की करीब 25% जनता ने केजरीवाल मे विश्वास दिखाया है ऐसे मे केजरीवाल को दिल्ली की जनता के विश्वास पर खरे उतरते हुए दिल्ली की जनता को पुनः चुनाव मे ना झोंकते हुए दिल्ली को एक ईमानदार मुख्य मंत्री देना चाहिए। ध्यान रहे की दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को वोट दिया है। ऐसे मे दिल्ली की जनता चाहेगी की जिस प्रकार से केजरीवाल ने राम लीला मैदान से जनलोकपाल पास करने को कहा या फिर दिल्ली की जनता को आधी कीमत पर बिजली देने का वादा किया साथ ही दिल्लीवासियों को मुफ्त मे पानी देने को कहा वो सभी चुनावी वादे इसी सत्र मे पूरा करने का माद्दा दिखाना चाहिए।

साथ ही दिल्ली की जनता हर्ष पूर्वक केजरीवाल की तरफ देखते हुए सोच रही है की भले ही केजरीवाल अपने नौकरी के कार्यकाल के दौरान इन्कमटैक्स डिपार्टमेन्ट मे घूस तो नहीं रोक सके थे लेकिन पूरी दिल्ली को घूसमुक्त क्षेत्र घोषित करके दिल्ली के बसींदो को घूस के बोझ से सम्पूर्ण मुक्ति दिलाएँगे। 

वैसे ये चुनाव पुरानी कहावत को भी चरितार्थ करता गया। जिस प्रकार कॉंग्रेस ने अपने ऊपर हो रहे चौतरफा हमलों और कई रिपोर्टों मे आ रही उसकी करारी हार को परख, आम आदमी पार्टी को हर तरह से सुविधा दे, अपनी कुर्सी बचाने के लिए मैदान मे उतारा उसने भाजपा को तो बहुमत लेने से रोक दिया लेकिन कॉंग्रेस का दिल्ली मे सफाया कर कॉंग्रेस को उसी के खोदे हुए गड्ढे मे गिरा दिया।

परंतु सभी बातें एक तरफ हैं और केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनते हुए मैं देखना चाहता हूँ। दिल्ली का रहवासी होने के नाते मैं चाहता हूँ केजरीवाल दिल्ली को "हंग असेंबली" ना दे कर अपनी सरकार बनाएँ और अपने चुनावी वादे पूरे करें।


17 Sept 2013

Mujaffarnagar riot and vote bank politics


उत्तराखंड त्राशदी के समय भी बीजेपी के नेताओं को तब तक नहीं जाने दिया गया जब तक की पप्पू नहीं पहुँच गया वहाँ अपनी नौटंकी दिखाने, कश्मीर दंगे के समय भी ऐसा ही देखने को मिला की बीजेपी के नेताओं को नहीं जाने दिया गया वहाँ जब तक की कोंग्रेसी नहीं पहुँच गए।

अब प्रदेश मे कॉंग्रेस से घोर दुश्मनी दिखाने वाले लेकिन केंद्र मे कोंग्रेसी टुकड़े पर पलने वाले मुल्ला-यम ने दिखाया अपना दोहरा चरित्र।

मुजफ्फर जाने वाले हर बीजेपी नेता को गिरफ्तार किया लेकिन मन्नू, पप्पू और उसकी इटालियन अम्मी को जाने की ना सिर्फ इजाजत दी बल्कि कई सारी और सहूलियतें भी।

अब यही मुल्लायम प्रदेश के बीजेपी नेताओं को वहाँ आने नहीं दे रहा है लेकिन जिसका उत्तर प्रदेश तक से कोई नाता नहीं है और खुद एक आतंकवादी है पर कॉंग्रेस के चलते बचा हुआ है बकरुद्दीन मवेशी को आने के लिए पलक-पावड़े बिछाये बैठी है ये सपा सरकार।

लेकिन इन सबके बीच एक ही बात कॉमन है की सभी के सभी ये तथाकथित धर्मनिरपेक्षी अवैध असलहा रखने वाले एवं दंगे भड़काने वाले शांतिप्रिय कौम के दहलीज पर ही अपना मत्था टेक वोट की भीख मांग वापस चले आ रहे हैं। करें भी क्यूँ ना ये दोहरे चरित्र वाले....आखिर इनको असलियत पता है की मुस्लिम कहीं भी वोट देगा एक मुश्त वोट देगा। लेकिन हिन्दू तो बिखरे हुए हैं। उनके भाई-बहन मार दिये जाएँ, बहनों की इज्जत उनकी आँखों के सामने लूट ली जाए तब भी दोगले बन उन्ही को वोट देंगे जिंहोने ऐसा जघन्य कार्य किया। ये हिन्दू उन्ही को वोट देंगे जो घूम-फिर का कॉंग्रेस के पाले मे गिरे।

जाट खुद को बहुत आगे मानते हैं और मुस्लिम विरोधी कहते हैं लेकिन वोट किसको देंगे रालोद को जो की अजित सिंह की पार्टी है और अजित सिंह खुद कॉंग्रेस के फेंके बोटी पर पलने वाला नरपिशाच है। वैसे भी इस दंगे मे मुजफ्फर नगर खुद अजित सिंह नहीं गया लेकिन अपने लड़के को भेजा। अब जाटों ने भी देखा ही होगा की अजित सिंह का लड़का जाटों के द्वार पर थूकने भी नहीं गया और केवल अपने वोट बैंक अवैध असलाहाधारी मुस्लिमों से मिल कर लौट आया।

साथ ही जब ये सभी अपनी वोट बैंक की राजनीति कर लौट आए मुस्लिमों के चौखट पर मत्था टेक कर, तब सेक्स सीडी के महानजनक अभिसेक्स मनु भिंगवी को अपने यहाँ बुला कर बुरखा धत्त अब ये प्रचार करने मे लग गई है की नेताओं को दंगाग्रस्त स्थलों से दूर रहना चाहिए ताकि जब बीजेपी के नेता या कोई हिन्दूवादी वहाँ जाए तो उसको सांप्रदायिक या दंगा भड़काऊ कह कर उसका दुष्प्रचार चालू कर सके ये कॉंग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाली गंदी महिला जो पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को दलाली का अड्डा बना रखी है। ऐसी ये अकेली नहीं है बल्कि आज हालत ये है की इस पत्रकारिता के पेशे मे एक दलाल ढूंढो तो हजार मिलते हैं। पूरा पत्रकार जगत ही जैसे दलालों का अड्डा नजर आने लगा है। किसी विशेष पार्टी या उक्त विशेष पार्टी को लाभ पहुँचने हेतु विशेष कौम को अच्छा एवं दूसरे कौम को हर छोटी बात मे भी गंदे तरीके से घसीटना ये इस पत्रकार जगत का पेशा हो गया है।

अब समय आ गया है की हिन्दू चाहे वो किसी भी जाति का हो, अपने वोट की अहमियत को समझे और ये देखने की कोशिस करे की उसका वोट अंत मे किस पार्टी के काम मे आ रहा है। वो अमुक पार्टी उस हिन्दू या देश के किसी भी हिन्दू के साथ कितनी खड़ी है। हिंदुओं के हित की कितनी रक्षा करती है एवं मानमर्दन करती है हिंदुओं के हितों का। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो दिन दूर नहीं जब भारत भी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की श्रेणी मे आ कर अपने अतीत को कोस रहा होगा एवं हमारी आने वाली पुश्तें हमें फूल माला नहीं चढ़ा रही होंगी बल्कि  गालियों से नवाज रही होंगी।


8 Sept 2013

Why media keep silence on anti-national Christian and Muslims


Opus dei इसाई समुदाय द्वारा पोषित मीडिया वाले जैसे दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही लगातार टीवी चैनल पर "सर्व धर्म समभाव" का पाठ पढ़ाते दिख रहे हैं! क्या यह जनता को दिग्भ्रमित करने वाला नहीं है? क्यों मीडिया वाले सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं रखते? या तो इनको इस देश की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान ही नहीं है या यह जानबूझ कर पैसा खा कर देशद्रोह और मक्कारी कर रहे हैं! 

क्यों मीडिया के मस्जिदों में पनपते 'इस्लामिक आतंवाद' की बात नहीं करते? क्यों वह नहीं बताते की आजकल मदरसों में केवल आतंकवादियों का निर्माण हो रहा है! क्यों नहीं बताते कि मस्जिदों में प्रतिबंधित अत्याधुनिक बिना लाइसेंस के हथियार संगृहीत कर के रखे जाते हैं जिसका कि दंगा फसाद में अनुचित और बर्बर प्रयोग होता है! अगर सच से आगाह करा दिया जाता तो पता नहीं कितने मासूम लोगो की जान बच जाती! क्यों मीडिया ऐसे "सर्व धर्म समभाव" की बात कर रही है जिससे की आतंकवादियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं? आतंकवादियों को पता है कि सारे कुकर्म करने के बाद भी उनको मासूम घोषित कर दिया जायेगा और भले ही दंगा उन्होंने शुरू किया हो इसका आधा श्रेय मासूम जनता के सर मढ़ दिया जायेगा! फिर क्या वह बरी और आज़ादी से फिर दंगा फसाद करने को स्वतंत्र! क्यों मीडिया 'विषधर नाग' को 'रस्सी' जैसा हानिरहित बता कर मासूम लोगो तो खतरे की तरफ लगातार धकेल रही है? क्या इसके लिए इनके खिलाफ PIL दाखिल नहीं होनी चाहिए?

कैथोलिक चर्च में हो रहे कुकर्मो की बात क्यों नहीं करती है मीडिया? दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही जैसे मूर्खो को तो शायद यह भी नहीं पता होगा की जीसस स्वयं क्रिस्चियन नहीं थे! रोमन लोगो ने उनको सूली पर चढ़ाया था और सौ साल स्वयं के फायदे के लिए रोमन ने ही जीसस के नाम को राजनैतिक हथियार की तरह  इस्तेमाल किया! इसाई धर्म की स्थापना जीसस की मृत्यु के सौ साल बाद उनके जीवन पर लिखे गए विभिन्न gospels/ वृतान्तो को संग्रहीत कर के की गयी थी! सैकड़ो में लिखे गए वृतान्तो में केवल 18 वृतांत चुन कर "ओल्ड टेस्टामेंट"/बाइबिल बनाया गया था! जिन रोमन्स ने जीसस का बेदर्दी से क़त्ल किया आज वह कैथोलिक चर्च खोल के धर्म के ठेकेदार बन बैठे हैं! आखिर क्यों ना हो जिसके पास स्वर्ग की चाभी होगी वही तो दुनिया पर राज करता आया है! 

"सर्व धर्म समभाव" की बात बुद्ध के समय की है जब की इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का नामो निशान नहीं था! वैसे भी हिन्दू धर्म में 'धर्म' का मतलब 'मज़हब' या 'religion' नहीं होता है! धर्म का अर्थ सही या  righteous मार्ग होता है जिसमे मानव जाती, पर्यावरण, जीव जंतु, सृष्टि, अंतरिक्ष हर किसी के प्रति मानवीय उत्तरदायित्व की बात की गयी है! 

"सर्व धर्म समभाव" और "वसुधैव कुटुम्बकम" का अर्थ इस देश की संस्कृति के परिपेक्ष में मेरी समझ में ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद के सन्दर्भ में किया गया है और दोनों ही विचारधाराओ को मान्यता देते हैं! कोई भी विचारधारा हो और अगर उसका मूल तत्व मानव समाज का भला, उन्नति और उत्थान नहीं है तो वह इस देश के अनुकूल नहीं है! समय के हिसाब से अगर कुछ कुरीतियाँ आ भी गयी है तो हमे उसको अपने आप सुधारना है ना कि उसके गलत अर्थ से सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देना है! मुझे ब्राह्मणों से कोई द्वेष नहीं है परन्तु यदि ब्राह्मण अपनी विद्वता, कर्म और उद्देश्य को छोड़ देता है तो उसको हम कैसे सम्मान दे सकते हैं? बिना किसी विवाद में फंसे मैं सबसे प्रार्थना करूँगा की वह श्री सी गोपालाचार्य द्वारा लिखित 'महाभारत' को पढ़ कर देख लें! जहां पर साफ़ साफ़ लिखा है की ना कोई जन्म से ब्राह्मण है और ना जन्म से शुद्र!

हमारे देश की संस्कृति में अगर हिन्दू विचारधारा को तार तार कर के चर्चा की जा सकती है तो हम इस्लाम क्रिश्चियनिटी कम्युनिज्म साधू संत सोनिया गाँधी मनमोहन सिंह को तार तार करके क्यों नहीं चर्चा कर सकते! जब हम भगवन के अस्तित्व पर प्रश्न उठा सकते हैं तब फिर बाकि सब तो बहुत छोटी मोती चीज़ें हैं!

अंत में इस्लाम के जानने वाले ज्ञाता यह बतायेंगे की खुदा ने गिब्रैल के द्वारा मोहम्मद से क्यों बात करी क्या खुदा मोहम्मद से सीधे बात नहीं कर सकते थे? मुल्ला मौलवी अपने स्वार्थ के लिए इस्लाम को तोड़ने मरोड़ने को आज़ाद क्यों हैं?

Written By: गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव

7 Sept 2013

Soniya Gandhi planning to Loot Indian Temples

रुपये का अवमूल्यन: सोनिया गांधी की साजिश


भारत मे रुपये का अवमूल्यन है नहीं बल्कि सरकार और सोनिया गांधी द्वारा जानबूझ कर किया गया है !

भारत देश जो की 2008-09 की वैश्विक मंदी के समय भी अडिग खड़ा था और पूरा विश्व भारत की तरफ देख कर पैसे लगाने को लालायित था वही भारत देश आज बांग्लादेश से भी आर्थिक रूप से पिछड़ रहा है। आखिर ऐसा क्यूँ?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको अभी से कुछ समय पहले हुई एक बड़ी घटना को जानना होगा। हमारे देश मे बहुत से मंदिर हैं और सभी मंदिर एक से बढ़ कर एक धनी मंदिर हैं। सभी मंदिरों मे अपार सोना, चाँदी, हीरे इत्यादि ना जाने कितने ही दुर्लभ वस्तुएँ रखी हुईं हैं। अभी तक ये सभी बातें सिर्फ किंवदंतियाँ थी, लेकिन जब जुलाई 2011 मे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का खजाना खुला तो भारत ही नहीं पूरे विश्व की आँखें फटी की फटी रह गईं।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर ना सिर्फ भारत का बल्कि विश्व का सबसे धनी मंदिर बन गया। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के अंदर अकूत सम्पदा खज़ानों मे सालों से पड़ी हुई है। अब जैसे ही श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का धन पूरी दुनिया के सामने आया, पद्मनाभ मंदिर मे पूरा विश्व दिलचस्पी लेने लगा एवं विश्व के कई देशों की नजरें उस मंदिर की सम्पदा पर गड गईं।

अब भारत के मूल्य निर्धारण प्रणाली से श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के अकूत धन का मूल्यनिर्धारण किया गया था, लेकिन चूंकि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का मे रखी सम्पदा सदियों पुरानी है, अतः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की ये सम्पदा का मूल्य निर्धारण कोई भी नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति मे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की इस सम्पदा का मूल्य कोई नहीं आंक सकता है एवं ये अमूल्य है।

ये तो हुई मंदिर की बात और शायद ऐसे खजाने भारत के अधिकांश मंदिरों मे मिलेंगे। 

लेकिन भारत के इस आर्थिक विनाश की कहानी इसी जुलाई 2011 के बाद से हुई। आपको याद होगा की अगस्त क्रांति के नाम पर अन्ना रामलीला मैदान मे अनसन पर बैठे और सोनिया गांधी इलाज कराने के नाम पर अमेरिका गई। उसके बाद से भारत मे प्रायः हर महीने ही तेल के दाम बढ्ने लगे, गैस के दाम बढ्ने लगे, सब्जियों के दाम आसमान पर पहुँच गए, सभी तरफ आर्थिक त्राहि-त्राहि मच गई, जो की भारत मे जो आज तक बदस्तूर जारी है।

इधर जो डॉलर कुछ साल पहले तक 44-45 रुपये था अचानक से बढ़ता हुआ 70 के करीब जा पहुंचा, पाउंड 78 से सीधा 100 के पास पहुँच गया, और भारत के महान अनर्थ-शास्त्रियों जिनमे कोंग्रेसी प्रधानमंत्री मन मौन-हन सिंह भी हैं ने तर्क दिया की चूंकि भारत मे खपत ज्यादा है एवं तेल के दाम बढ़ रहे हैं ऐसे मे रुपये का अवमूल्यन हो रहा है। चलो जी हमने मान लिया फिर एक टुच्चे से देश बांग्लादेश की करेंसी "टका" का अवमूल्यन क्यूँ नहीं हुआ। बल्कि डॉलर के मुक़ाबले बंगलादेशी टका का मूल्य जहां अक्टूबर 2012 मे 84 था आज वो घट कर 77 पर आ गया।

अब ये पूरा घटनाक्रम देखने के बाद एवं अचानक से सरकार के सोने को गिरवी रखने एवं मंदिरों से सोने की मांग करने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है की सोनिया गांधी ने अपने अमेरिकी एवं अन्य विदेशी मालिकों के कहने पर जानबूझ कर रुपये का अवमूल्यन कर मंदिरों मे पड़े अमूल्य खजाने को सोने के नाम पर बाहर निकाल कर बेच देने का है। और इसी कार्य को सही ढंग से करने हेतु अमेरिकी नागरिक को भारत का RBI गवर्नर बना कर लाया गया। आते ही इस अमेरिकी गवर्नर ने भारत के जिन मंदिरों को सोना देने को कहा उनमे से कुछ प्रमुख मंदिर इस प्रकार से हैं : तिरुमाला तिरुपति मंदिर, श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, गुरुवायुर के श्री कृष्णा मंदिर, श्री सिद्धिविनायक मंदिर एवं वैष्णोदेवी मंदिर। 

वैसे भी ध्यान देने वाली बात है की सोनिया गांधी की बहन जो मुफ़लिसी मे जिंदगी जी रही थी सोनिया गांधी के भारत आने के बाद एक आलीशान दुकान जहां भारतीय मूर्तियाँ बेची जाती हैं उसकी मालकिन बन बैठी एवं एक भी आयात की हुई मूर्ति की पर्ची उसके यहाँ नहीं मिलती लेकिन फिर भी भारत से मूर्तियाँ सोनिया गांधी की बहन के यहाँ पहुँच जाती है।

ऐसे उदाहरण के पश्चात ये कयास लगाना की भारत मे रुपये का अवमूल्यन जान बुझ कर मंदिरों की सम्पदा को लूटने के लिए गया है, को सही मानने की इच्छा बलवती हो रही है एवं पूर्णतया सच प्रतीत हो रही है।

1 Sept 2013

pratibha visthapan

प्रतिभा विस्थापन

आज लाखों की संख्या मे युवा प्रशासनिक परीक्षा मे बैठते हैं जिनमे से मात्र कुछ ही परीक्षा मे सफल हो पाते हैं। परीक्षा मे सफल हुए परीक्षार्थियों का सरकार देश के पैसे पर सर्वोत्तम उपलब्ध ट्रेनिंग कराती है, जिसमे लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। ट्रेनिंग के समय उन परीक्षार्थियों को सरकार वेतन भी देती है।

ट्रेनिंग खत्म होने के उपरांत परीक्षार्थी प्रशासनिक पद पर प्रतिष्ठित होते हैं। उक्त समय मे भी उन प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर देश का बहुत पैसा लगता है। कुछ अधिकारी बड़े ही मनोयोग से देश सेवा कार्य मे लगते हैं और कार्यकाल पूर्ण होने तक देश सेवा करते रहते हैं। पर इन्ही अधिकारियों मे से कुछ अधिकारी देश विरोधी कार्य मसलन लूट-खसोट करने मे लग जाते हैं, चूंकि ये लूट-खसोट का विषय भिन्न है अतः मौजूदा लेख मे उसको शामिल करना यथार्थपरक नहीं है। 

परंतु इन्ही अधिकारियों मे से अधिकारियों की एक जमात ऐसी भी है जो अपना कार्य तब तक चुपचाप करते हैं जब तक VRS लेने का समय नहीं आ जाता है एवं कुछ बड़े रसुखदारों से उनकी गाढ़ी जान पहचान नहीं हो जाती है। इतना होते ही वो सभी प्रशासनिक अधिकारी अपने प्रशासनिक कार्यों को छोड़ मुख्यतया 2 कार्य करते हैं-

1. या तो वो प्रशासनिक अधिकारी  VRS लेने के पश्चात NGO चालू कर देते हैं और अपने रसुखदारों से तथा विदेशों मे स्थित अपने जान पहचान का उपयोग कर पैसे बनाने चालू कर देते हैं एवं मस्त जिंदगी जीते हैं (वैसे इनमे से कुछ अधिकारी अच्छा कार्य भी करते हैं लेकिन उनकी गणना नगण्य समान है)।

2. या फिर वो प्रशासनिक अधिकारी अपना VRS लेने के पश्चात किसी बड़ी निजी कंपनी या विदेशी कंपनी मे चले जाते हैं जहां उनको मोटी तंख्वाह मिलती है।

अब सवाल यहीं उठता है की जिन प्रशासनिक अधिकारियों पर सरकार देश का इतना पैसा खर्चा करती है देश सेवा हेतु वो अधिकारी एक तय सीमा के पश्चात VRS ले कर पेन्सन तो लेते ही हैं लेकिन देश के पैसे से सीखे हुए चीजों को निजी स्वार्थ मे निजी कंपनी या स्वयं हेतु उपयोग मे लाने लगते हैं।

जब ये VRS लिए हुए अधिकारी सेवा कार्य मे थे तब बहुत सी आंतरिक बातें इनके पास होती हैं जिसे किसी को नहीं जानना चाहिए होता है, परंतु क्या जो निजी कंपनी इनको लाखो-करोड़ो रुपये वेतन के रूप मे या NGO मे चंदे के रूप मे देती वो कंपनी इनसे वो सभी राज नहीं जानेगी या फिर इसकी क्या गारंटी है की ये सभी विशिष्ट सेवा निवृत पूर्व अधिकारी वो सभी बातें उक्त निजी कंपनी या कंपनियों को नहीं बताएँगे या फिर जिस ट्रेनिग को इन अधिकारियों को देने के लिए सरकार लाखो करोड़ रुपये खर्च करती है उसको महज चंद सिक्कों मे दूसरी कंपनी को नहीं देंगे।

क्या ये निकृष्ट कार्य देशद्रोह नहीं है? क्यूँ बढ़ रही है प्रशासनिक अधिकारियों के बीच VRS लेने की प्रवृत्ति ? क्या VRS ले कर उक्त सभी प्रशासनिक अधिकारी देश की आम जनता के पैसे के साथ-साथ जनभावना के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं ? क्या ये अधिकारियों के द्वारा पैसे की चमक मे मंत्रमुग्ध हो देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाना एक क्षम्य अपराध है ? क्या इन अव्यवस्थाओं की जांच पड़ताल तथा रोकथाम हेतु केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिल कर समीक्षा नहीं करना चाहिए ?

इस प्रतिभा पलायन को रोक कर प्रशासनिक अधिकारी अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें एवं उन कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करें, ऐसा मैं सभी प्रशासनिक अधिकारियों से अनुरोध करना चाहूँगा !

16 Aug 2013

Bihar mid-day-meal or poison

बिहार के लोगों ने चुनी तो एनडीए की खुशहाली थी, लेकिन झेल रहे हैं यूपीए का दंश 


16 जुलाई छपरा तो 16 अगस्त वैशाली मिड-ड़े-मील बना जहर

बिहार मे अभी पिछले महीने मिड-ड़े-मील खा कर मारे बच्चों की कब्र गीली ही होगी की आज फिर से 40 बच्चों की तबीयत खराब हो गई बिहार के ही वैशाली जिले मे।

छपरा मे 23 बच्चों का लील गया था नितीश बाबू का मिड-ड़े-मील और इस बार वैशाली जिले के 40 बच्चे पड़े बीमार

ज्ञात खबरों के आधार पर मिड-ड़े-मील खाते ही बच्चों को पेट मे तेज दर्द और उल्टी की शिकायत हुई। बीमार बच्चों का इलाज अस्पताल मे कराया जा रहा है।

आश्चर्य इस बात का है की पिछले महीने हुई मिड-ड़े-मील जहर काण्ड की पड़ताल अभी चल ही रही है की आज दूसरा काण्ड हो गया।

क्या मिड-ड़े-मील जहर से कभी अमृत बन सकता है और दूसरा सबसे बड़ा प्रश्न यही अनाज तो मिलेगा फूड सिक्योरिटी बिल मे भी

19 Dec 2012

121 Crore Indians are responsible for any RAPE in India

सारी 121 करोड़ की भारतीय जनता है बलात्कारी 



भारत में अगर किसी भी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो उसका बलात्कार केवल बलात्कार करने वाला या वाले इन्सान नहीं करते हैं बल्कि उस लड़की का बलात्कार पुरे भारत की 121 करोड़ जनता एक साथ मिल कर करती है 

बलात्कार जैसी घटना की जमीन हम सभी ही मिल कर बनाते हैं 
जब बलात्कारी बलात्कार के बाद छुपता है तो हम ही छुपाते हैं 
जब बलात्कारी अपने पैसे के बल पर बाहर आता है तो उसको खाने पर बुलाते हैं 
जब बलात्कारी अपने वकील और पैसे के बल पर बरी हो जाता है तो हम उसको लड्डू खिलाते हैं जबकि सच्चाई पता होती है हमें 
जब बलात्कार की शिकार लड़की मर जाती है तो हम 2 मिनट का मौन रख फिर से निकल पड़ते हैं अगले शिकार की खोज में 
जब बलात्कार की शिकार लड़की के परिवार वाले मर जाते हैं तो हम दारू और मुर्गे के साथ किसी और परिवार की लड़की को दबोच लाते हैं 
अगर लड़की बच जाती है अपनी दृढ-इक्षाशक्ति से तो हम ही आगे आते हैं और उसको बार-बार उस वाकिये को याद दिला-दिला कर उसका हर क्षण बलात्कार करते हैं 
हम ही हैं की अपनी लड़की को घर में सुरक्षित रखने का ढोंग करके हर दूसरी लड़की के ऊपर गन्दी नजर रखते हैं 
हम ही हैं जो घर में अश्लील फिल्मे बड़े चाव से देखते और दिखाते हैं ताकि आने वाले समय का बलात्कारी हमारे घर में पले-बढे 
हम ही हैं जो पडोसी के घर में ताक-झाँक में लगे रहते हैं की उसकी बेटी ने आज क्या-क्या पहना है 
किसी भी लड़की को ऐसे घूरते हैं की वो घर पहुंचते-पहुंचते गर्भवती हो जाए 

आधुनिकता के नाम पर नंगेपन तथा मलेक्षपने की तरफ अग्रसर हैं हम 

और भी बहुत कुछ है कितना कहूँ, हाँ इतना जरुर कहूँगा की आज हर घर में एक बलात्कारी है फिर चाहे वो पुरुष हो, नारी हो या अर्धनारी हो।

अब आगे क्या करना है हम खुद को जांचने के बाद सोचें और करें उन कार्यों को नहीं तो एक पुड़िया जहर तो सभी खरीद कर रख ही सकते हैं अपने पास में और जहर कब खाना है इतना तो समझ आएगा ही तो खा लेना।



18 Dec 2012

Delhi the Rape Capital of India


दिल्ली में हुआ लड़की का गैंग रेप



यहाँ लड़की का गैंग रेप नहीं हुआ बल्कि ये पुरे भारत का सामूहिक बलात्कार था जो किसी और ने नहीं बल्कि देश के कर्णधार और सुरक्षा को पैबंद लोगों ने किया। पुरे भारत का बलात्कार करने वाले हमारे नेता जो अपना वेतन बढाने में ही सोचते रहते हैं या कैसे लूट कर सकें इसमें लगे रहते हैं और जो समय बचता है उसमे ये लोग आम जनता को कैसे चुप करा सकें इस कानून को बनाने में लगे रहते हैं काश ये आम जनता की सुरक्षा के लिए भी थोडा सोचे होते।

आदमी तो आदमी यहाँ जो औरते हैं लोक सभा या राज्य सभा या दिल्ली प्रदेश की मुखिया शिला दीक्षित महिलाओं को ही नसीहत देती रहीं। महिलाओं को दी गई नसीहत की बात ही क्या कहें जब शिला दीक्षित अपराधियों को अपने गोद में बैठा कर पुलिस महकमे को अपने पैरों के निचे रखती हैं। कहीं ऐसा तो नहीं की यहाँ का पुलिस महकमा या कहें तो दिल्ली पुलिस के उच्चस्थ पदासीन व्यक्ति ही अपराधियों को सह दे रहा है क्यूंकि शायद अपराधी और उन अपराधियों की अम्मी इसके मुंह में इसके औकात की कीमत ठूंस रही हैं। अगर पुलिस प्रशासन दिल्ली में होता तो कोई मंदिर से भीखारी के कटोरे से एक सिक्का तक नहीं चुरा सकता है।

या शायद पाश्चात्य सभ्यता के लिए मर रही पाश्चात्य महिला जो देश में कुछ भी करके देश को टुकड़ों में विभाजित करने में लगी है लोगों के सोच को इतना कलुषित कर देना चाहती है की देश में कोई परिवार शांति से न रह सके।

जैसे शिला दीक्षित महिलाओं को नसीहत दे रही थी की ऐसे कपडे मत पहनो वैसे मत रहो ये मत करो, अबे बुड्ढी जिस दिन तेरी बेटी अर्धनग्न और नशे की हालत में बेहोश हो बार से निकलती थी तब तो तेरे पाले हुए बॉडी गार्ड रहते थे तो तू क्या समझेगी एक महिला की व्यथा। और जो समय तू ये सलाह देने में बिता रही थी उस समय में तू अगर अपराधियों पर पाबन्दी लगाने में बिताती तो दिल्ली और दिल्ली की महिलाओं की ऐसी स्थिति नहीं होती। क्यूंकि यहाँ महिलाएं तो महिलाएं नवजात नासमझ बच्चियां तक भी शिकार बन रही हैं। अब तू क्या चाहती है शिला दीक्षित की महिलाएं तेरी बेटी की दिन में बुर्के में रहें और रात को................

इसके बाद अब पुलिस को कहने को कुछ बचता ही कहाँ है ये तो ढक्कन की औलादें हैं जो अपने अपराधी बापों के गोद में बैठ अपनी बेटी और बहन का सौदा करते रहने में व्यस्त रहते हैं।

अब जब दिल्ली जो की देश की राजधानी होने के साथ-साथ एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति रखती है उसका ये हाल है तो देश के दुसरे हिस्से और सुदूर के गांवों में क्या हाल होगा। जब देश की राजधानी ही सुरक्षित नहीं है तो देश के गाँव कितने सुरक्षित होंगे ये समझा जा सकता है।

और कहाँ मर गया ये महिला आयोग ? कोई जवाब नहीं आया इनका और नाही इनकी कोई प्रतिक्रिया ? क्या ये महिला आयोग बलात्कार के केसों को मनोरमा कहानियों के किस्सों की तरह चाय की चुश्की की साथ पढ़ कर ठहाके लगाती हैं और अपने बारी का इन्तेजार करती हैं की काश ऐसा मजा इनको कब मिलेगा आखिर।

अब तो इस देश को राम ही राखें ! ! !

24 Sept 2012

हिंदी है हिन्दू की पहचान



भारत विभिन्नता में एकता रखने वाला देश है. इसका प्रमाण एक बहुत ही प्रचलित कहावत से साफ़-साफ़ पता चलता है "कोस-कोस पर पानी बदले, ढाई कोस पर वाणी". भारत में बहुत तरह की भाषाएँ बोलीं जाती हैं. हर भाषा का अपना ही एक महत्व होता है. भाषाएँ एक-दुसरे को जोड़ने का काम करती हैं. देश में ४ भाषाओँ को देव भाषा का नाम दिया गया है जो की लिपि बद्ध हैं इनमे पहला है संस्कृत, तमिल, तेलगु और कन्नड़. लेकिन इन सभी भाषाओँ के साथ-साथ हमारी बाकि की क्षेत्रीय भाषाओँ का भी अपना ही एक महत्व होता है. हर क्षेत्र की अपनी एक अलग भाषा है. कोई बंगाली बोलता है तो कोई मराठी, कोई असमी बोलता है तो कोई भोजपुरी लेकिन इन सभी भाषाओँ का एक ही उद्देश्य होता है अपने विचारों की अभिव्यक्ति और एक जुडाव अपनों से अपनों की तरह. पर क्या होगा अगर एक कश्मीरी अपनी भाषा में किसी तमिल से बात करे या कोई असमी में किसी मराठी से बात करे. अगर ऐसा होता है तो अभिव्यक्ति तो हम कर सकते हैं लेकिन इस अभियक्ति का कोई महत्व नहीं होगा क्यूंकि हमारी बातें सामने वाले के समझ में नहीं आएँगी और हमारा संचार तंत्र वहीँ खत्म हो जायेगा. 

क्षेत्रीय होना एक स्तर तक सही है लेकिन क्या भारतीय होना गलत है? इन्सान होना सही है लेकिन क्या अपने धर्म और अपने मूल को भूल जाना सही है? हिन्दू धर्म का सब कुछ अपने में समाहित करता है फिर एकता को क्यूँ नहीं समाहित करता है?

अब इसका दो ही उपाय है. हम जहाँ भी जाएँ वहां की भाषा सीखें जैसे की अगर कोई भोजपुरी बोलने वाला असम में जाये तो असमी सीखे जोकि जरुरी भी है लेकिन ये एक लम्बी प्रक्रिया है. तो यहाँ एक दूसरा पहलु है की अगर हम अपने देश की राष्ट्रीय भाषा हिंदी में बात करें. चूँकि हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे अधिकांश लोग समझ सकते हैं और टूटी-फूटी बोल भी सकते हैं. इस प्रकार अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाने में बहुत आसानी होती है. क्यूंकि भाषा अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए होती है न की अपनों को अपनों से दूर करने के लिए. दूर करने के लिए तो नेता हैं न जो की हमें लड़ाते रहते हैं कभी जाती के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर. पर इस भाषा के नाम पर लड़ने में हम अपने देश को ही बदनाम करते हैं जिसमे हम रहते हैं और अपनी मातृभूमि कहते हैं. क्या हम अपनी मातृभूमि का फर्ज पूरी तरह समझ पाए हैं?  

हम इस सच्चाई को पूरी तरह ह्रदय से सर झुका कर मानते हैं की भारत देश जो कभी बिखरा हुआ था उसे सरदार बल्लभ भाई पटेल जी ने एक सूत्र में जोड़ा और इस जोड़ने में उनका उद्देश्य एक ही था की पूरा देश एक होकर रहे. इसी एक सूत्री भारत के उद्देश्य के लिए तत्कालीन आजाद भारत की सरकार ने हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाया. लेकिन तत्कालीन भारत सरकार ने भी हिंदी को थोपा नहीं. सरकार ने यही कहा की जो जिस भाषा में भारत में बोलने में आसानी महसूस करता है वो उस अमुक भाषा में बात करे लेकिन अगर २ अलग भाषा को बोलने वाले एक दुसरे से बात करना हो तो हिंदी का प्रयोग करें.

मैं आज भी वही बात करना चाहता हूँ की जैसे कोई भी बात जबरदस्ती किसी पर थोप कर नहीं की जा सकती है वैसे ही कोई भी भाषा किसी पर थोप कर एक-दुसरे को नहीं जोड़ा जा सकता है. एक दुसरे को अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए किसी भी भाषा से पहले आत्मीयता की जरुरत होती है. अगर हमारे अन्दर आत्मीयता है तो हर भाषा हमारे लिए एक हो सकती है फिर चाहे वो हिंदी हो या असमी या फिर तमिल. भाषा तो हमें एक ऐसा पुल प्रदान करती है जो नदी के दो किनारों को आपस में जोडती है और नदी के दोनों किनारों पर खड़े इंसानों को आपस में जोडती है. 

अतः हम एक होकर एक भाषा को अपनी सामूहिक और कई क्षेत्रों के मध्य की भाषा बनायें और इस कार्य में एक ही भाषा है जो इस कार्य को कर सकती है और वो है हिंदी. हिंदी कोई एक अमुक समूह की भाषा नहीं है वरन हिंदी पुरे हिन्दू समूह और भारत की भाषा है. हर हिन्दू को हिंदी भाषा को अपने ऊपर थोपा हुआ नहीं समझना चाहिए वरन हिंदुत्व के लिए उसे सहर्ष अपनाना चाहिए साथ ही अपने दुसरे हिन्दू भाइयों को हिंदी भाषा को ह्रदय से अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए न की किसी हिन्दू को हिंदी भाषा बोलने से हतोत्साहित करना चाहिए.

हिंदी या कोई भी भाषा किसी पर थोपिए मत वरन हिंदी को हिन्दू सहर्ष अपनाएं ! ! !



2 Jun 2012

गाय की महत्ता किसान ही जाने


आज कल देश में रोज नए गाय के कत्लखाने खुल रहे हैं| बहुत से इसके महत्व को समझा रहे हैं| कुछ लोगो का कहना है की इससे मांस के निर्यात में सहायता मिलेगी| कुछ लोगों का कहना है की इससे चमड़ा व्यापार को सहायता मिलती है| तो कुछ लोग कुछ पश्चिमी देशों से तुलना करते हैं की अमेरिका जैसे देशों में गाय को काटा जाता है पर अमेरिका या उस जैसे देशों को तो कुछ नहीं हुआ|

पर शायद ये लोग तुलना करने में ये भूल जाते हैं की अमेरिका या पश्चिमी देश विकाशसील नहीं बल्कि एक विकसित देश की श्रेणी में आते हैं और अपने खाने पिने की चीजें आयात करते हैं| ये विकसित देश कहीं से भी कृषि प्रधान देश नहीं हैं बल्कि टेक्नोलोजी प्रधान देश हैं|

अब अगर भारत के परिपेक्ष्य में गाय के महत्व को देखें व्यावहारिक परिपेक्ष्य में:

भारत किसानों का देश है, भारत गावों का देश है| आज भी भारत की करीब ७०% जनता गावों में रहती है और खेती पर निर्भर है| खेती के लिए कुछ चीजें बहुत जरुरी होती हैं जैसे खाद, खेत की जुताई और खाने के लिए सस्ता पर पौष्टिक खाना| पर आज की दिन दुनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रही महंगाई के वजह से खेती करना एवरेस्ट चढ़ने के सामान हो गया है|

किसानो के पास जुताई के लिए पैसे नहीं है| किसानो के पास खेत में खाद डालने के पैसे नहीं हैं| किसानो को खाने के लिए भी सोचना पड़ रहा है क्युकी उनके पास सब्जी खरीदने की कूबत नहीं है और आज भी बहुत से किसान रोटी और प्याज खा कर ही अपना और अपनों का जीवनयापन करने को बाध्य हैं| जलावन के लिए लकड़ी की जगह गोबर के उपले उपयोग में आते थे जिससे गाँव की हरियाली भी बची रहती थी| जबकि कुछ समय पहले यही बात नहीं थी|

कुछ समय पहले गाँव में गाय और बैल हुआ करते थे साथ भैंस भी| इन चौपायों के होने के वजह से किसानी करना बहुत आसान हो जाता था| क्युकी इन चौपायों के गोबर को एक जगह इकठ्ठा कर उसे खाद बनाया जाता था और उसे खेतो में डाला था| ये वैज्ञानिक पद्धति से भी माना हुआ है की चौपायों खास तौर पर गाय का गोबर एक बहुत ही बढियाँ जैविक खाद होता है| पर आज वो जैविक खाद कहीं भी देखने को मिल नहीं रहा है और साथ ही रासायनिक खादों के दाम असमान को छू रहे हैं और पहले से दुसरे फसल में ही खाद का दोगुना दाम बढ़ रहा है जिस वजह से किसानों के लिए खेती करना बहुत मुश्किल भरा हो रहा है और इस कारण किसान सामूहिक खुदखुसी कर रहे हैं| 

साथ ही खेत को जोतने के लिए हाथ से चलाने वाले हल होते थे जिनको बैलो की सहायता से खेतो को जोता जाता था| पर आज गाय के न होने के वजह से बैल भी नहीं हैं किसानो के पास और ट्रैक्टर से जुताई करनी पड़ती है खेतों की पर हर दिन बढ़ रहे पेट्रोलियम पदार्थों के दाम के चलते और बाकि की चीजो के बढ़ते दामों के चलते खेत की जुताई कराना किसानो के बूते से बहार होता जा रहा है| आज बहुत से खेतों की जुताई नहीं हो रही बल्कि फावड़े और कुदाल से खेतों की कुदाई होती है जो खेतों की शक्ति को नष्ट करते हैं| 

इसके अलावा किसानो को सब्जी खरीदने की जरुरत नहीं होती थी क्युकी जहाँ कहीं भी चौपायों के गोबर को इकठ्ठा किया जाता था उसके आस पास की मिटटी इतनी उपजाऊ हो जाती थी की वहीँ किसानो के उपयोग लायक सब्जी उत्पादित हो जाती थी| और अगर कभी सब्जी कम पड़ रही होती थी तो गाय या भैंस का दूध होता था उस कमी को पूरा करने के लिए| दूध की भरपूर मात्रा होने के चलते बच्चों में कुपोषण नहीं होता था| पर आज दूध के आभाव में जो कैलोरी चाहिए होती है बच्चों को वो नहीं मिल रही है और बच्चो में बाल मृत्यु का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है|

गाँव की हरियाली ख़तम हो रही है धीरे धीरे क्यूंकि लोगों को उपले नहीं मिल रहे हैं और वो बाध्य हैं लकड़ी को काटने के लिए| पहले लोग जो गोबर होता था उसे दो भागों में बाँट कर रखते थे पहला हिस्सा खेतों के लिए होता था खाद के रूप में और दूसरा हिस्सा होता था उपलों के लिए| पर आज तो गोबर ही नहीं मिलता है तो उपले कहाँ से मिलेंगे तो किसान लकड़ी को काटने को बाध्य हैं|

साथ ही चमड़ा व्यवसाय में भारत हमेसा चौथे या पांचवे स्थान पर रहा और कमोबेश आज भी इतने चमड़ा उत्पादन के बाद भी उसी स्थान पर है पर दुग्ध उत्पादन में भारत पहले स्थान से निचे खिसक रहा है बल्कि जिन पश्चिमी देशों पर गाय के काटने का इल्जाम लगाया जाता है वही देश गाय के दूध उत्पादन में भारत से कहीं आगे हैं| वो देश और कोई नहीं बल्कि अमेरिका ही है| आज हर दो या तिन महीने पर दूध का भारत में ही दाम बढ़ा दिया जा रहा है और साथ ही हर रोज कोई न कोई नकली दूध बनाने का कारखाना उजागर हो रहा है|

गायों की देश में घटती संख्या के चलते गायों को खरीदना किसानों के बस की बात नहीं रही| जो गाय पहले ५-१० हजार रुपयों में मिल जाती थी वही गाय अब २० हजार के ऊपर हो गईं हैं और ये चौपाया किसानो के पहुँच से बहार चला गया है| साथ ही अगर भैंसों की बात करें तो वो तो और महँगी हो गई हैं| अब उपले और जैविक खाद तो भारतीय किसान भूल चुके हैं और आयातित रासायनिक खादों को अपना खून बेच खरीदने को मजबूर हैं और गायों को कटते हुए देख रहे हैं|

क्या ये सब देख कोई कह सकता है भारत देश को किसानों के देश बनाये रखा जा सकता है या धीरे धीरे गरीबी हटाओ की जगह गरीब हटाओ पर कार्य हो रहा है| ये आप ही तय करें क्यूंकि किसान की महत्ता तो आप समझते ही हैं और गाय किसान का मुलभुत जरुरत है|


5 May 2012

प्रजातंत्र या राजतन्त्र


हमारे देश भारत के बारे में हम बड़े गर्व से कहते हैं की हमारा देश विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र देशो में से एक है| ऐसा हमारे राजनेता भी दुहाई देते हुए दिख जाते हैं| प्रजातान्त्रिक देश होना अपने में बड़े सौभाग्य की बात है| क्युकी प्रजातंत्र मुझे अपनी बात रखने की आज़ादी देता है| मुझे पढने की आज़ादी देता है| मुझे समानता का अधिकार है जो शायद पूरी तरह नहीं भी है आज के भारत के दौर में| 

पर कुछ सवाल मुझे बहुत परेशान करते हैं| कहने को तो हम एक प्रजातान्त्रिक देश के नागरिक हैं| पर देश में हमारी कितनी भागिरदारी होती है| कुछ मुख्य बिन्दुवों को मै उठाना चाहूँगा यहाँ:- 

हम एक गाँव के प्रतिनिधि को तो चुनते हैं वहा हमारा प्रजातान्त्रिक अधिकार हमें दीखता है| पर अपने क्षेत्र के ब्लाक प्रमुख को सीधे तौर पर नहीं चुनते हैं|

हम अपने क्षेत्र के MLA को तो चुनते हैं वहा हमें प्रजातान्त्रिक अधिकार हमें दिया जाता है पर मुख्यमंत्री कौन हो ये हम तय नहीं करते हैं वो तय किया जाता जिनको चुनने के समय हमारे पास विकल्प नहीं होता क्युकी MLA के लिए चुनाव लड़ने वाले १० में से ९.५० के ऊपर कोई न कोई चार्ज  जरुर होता है और ये लोग चुनते हैं हमारा मुख्यमंत्री|

हम अपने क्षेत्र के MP को तो चुनते हैं उसी तरह जिस तरह MLA को पर क्या हमें पता होता है की कौन बनने वाला है हमारा प्रधानमंत्री या उप-प्रधानमंत्री| हम अपने प्रधानमंत्री या उप-प्रधानमंत्री को कभी भी नहीं चुनते हैं और न ही हमसे पूछा गया है कभी भी|

किस MP या MLA को कौन सा कार्यभार मिलना चाहिए क्या ये हमसे आज तक पूछा गया है|

बजट में हम क्या चाहते हैं क्या ये कभी पूछा गया है|

प्रजातंत्र में हमारे गाँव के प्रतिनिधि से लेकर MLA या MP हमारे प्रतिनिधि होते हैं पर क्या होता है प्रतिनिधि का मतलब की बिना हमारे संज्ञान के कोई भी निर्णय लिया जाता है और हमारे बोलने या आवाज उठाने को दबा दिया जाता है|

राष्ट्रपति कौन हो, किस जाती का हो, किस पार्टी का हो क्या हमारी कोई राय होती है या ली जाती है या कभी ली गई है|

क्या हमने कभी अपने राज्यपाल को चुना है या कभी पूछा गया की कौन बनना चाहिए हमारा राज्यपाल?

आज के दौर में राज्यपाल और राष्ट्रपति वही चुने जा रहे हैं जो किसी विशेष पार्टी के चमचे हैं या किसी वर्ग विशेष हैं| क्या यही है हमारा प्रजातंत्र?

यहाँ तक की अगर कही कोई सभा करनी हो या अनशन करना हो तो पहले आदेश पारित कराना पड़ता है|

ये तो मौजूदा दौर की बाते हुई अगर हम शुरुवात से देखे तो पाएंगे की जब घोषित या अघोषित आज़ादी हमें मिली तब भी प्रधानमंत्री कौन हो ये हमसे नहीं पूछा गया और यहाँ तक की जब कुछ लोगो ने सम्मिलित प्रयास से कई देशो से कुछ हिस्से संविधान के ले कर जो की सबसे प्रेरित था इंग्लैंड के संविधान से तो भी हम पर थोपा गया|

तो मेरा सवाल है मेरे समझदार और बुधजिवी बंधुवो से की क्या हमारा देश एक प्रजातान्त्रिक देश है?

क्या हम एक प्रजातान्त्रिक देश के निवासी हैं?

30 Mar 2012

भारतीय: जिन्दा या मुर्दा


आए दिन इतने घोटाले होते हैं अपने इस भारत देश में पर क्या कोई बता सकता है की जिम्मेदार कौन है इसका........क्यों सारे नेता जिनपर कोई न कोई आरोप या केस है वो सांसद या विधान सभा में पहुच जाते हैं...........चोरो, लूटेरो, डकैतों, बलात्कारियो, खुनियों और यहाँ तक की देशद्रोहियों तक को हमारे सर के ऊपर ला कर बैठा ही नहीं दिया जाता है बल्कि फेविकोल के जोड़ से भी ज्यादा मजबूत जोड़ से जोड़ या चिपका दिया जाता है.......कहाँ से बैठ जाते हैं ये लोग हमारे सर पर..........क्यों झेलते हैं हम ऐसो को.........कौन हमें अलग अलग मुद्दों पर लडाता है और क्यों लड़ा पता है वो ........किसने हमारे बिच में खाई पैदा करी.......किसने हमें बांटा है.........सबसे बड़ा प्रश्न कौन सबसे ज्यादा गलत है नेता या खुद हम.....क्या हम अपनी जिम्मेदारी समझते हैं......अपनी जिम्मेदारियों का सही से निर्वाहन करते हैं|

अब यक्ष प्रश्न यह है की हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन सही से क्यों नहीं कर पाते हैं ...... ऐसी क्या परेशानी है हमको अपनी जिम्मेदारियों के निर्वाहन में.......क्या हम अपने परिवार की जिम्मेदारियों से पीछे हटते हैं......क्या हम अपने घर वालो के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं......क्या हम अपने घर के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन नहीं करते हैं......नहीं ना......फिर हम अपने देश जो की सबसे पहले हमारा घर है उसके प्रति हम क्यों अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाते हैं........क्या ये देश हमारा घर नहीं है......क्या इस देश के लोग हमारे घर वाले नहीं हैं......या की हमारी गैरत मर गई है......या हम खुद अन्दर से मर नहीं सड़ चुके हैं......क्यूंकि अगर हमारे घर वालों की तरफ कोई बुरी नजर भर उठता है तो हम उसको जान से मारने तक की कोसिस तो कर ही लेते हैं इसी में से कुछ लोग जान से मारने में सफल भी हो जाते हैं अपने घर वालों के तरफ बुरी नजर उठाने वालों को......ऐसा क्यों होता है क्युकी जिन पर बुरी नजर उठी है वो हमारे अपने हैं और ये देश में जिसका दिया हम खाते हैं.....या जिसके हवा में हम साँस लेते हैं......या जिसके जमीं पर हम रहते हैं और अपनी पूरी जिंदगी बिताते हैं......उनके प्रति हमारा कोई हक़ नहीं बनता है.

अगर ऐसा है की हम मुर्दों के सामान हो गए हैं और देश के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है या हम देश के प्रति किसी भी जिम्मेदारी का निर्वाहन नहीं करेंगे या नहीं कर सकते हैं किसी भी स्तर पर तो क्या हम इस देश की अबो-हवा में साँस लेने तक के भी हक़दार हैं.

नेटीजन्स या सिटीजंस

अंततोगत्वा सोसिअल नेट्वोर्किंग साइट्स का प्रभाव देखने को मिला दुनिया में.......दुनिया के कई कोने में बड़े-बड़े क्रांति आ गई और वहां की भ्रष्ट सरकारे या तानाशाह ख़तम हो गए.....इसमें एक बहुत बड़ा हाथ सोसिअल नेटवर्किंग साइट्स का रहा....पर वो क्रांति हमारे भारत में क्यों नहीं दिखती है

इसका कारन बहुत आसान है......यहाँ NETIZENS (FACEBOOKIYE and SOCIAL NETWORKING WORMS ) हैं, CITIZENS नहीं.....सब बड़ी-बड़ी बाते लिख सकते हैं....लिख कर एक दुसरे को गलियां दे सकते हैं और अपने आप को बहुत बड़ा देशभक्त या क्रन्तिकारी दिखा सकते हैं.....लेकिन इन लोगो से कोई क्रांति नहीं आ सकती कभी देश में......इनसे केवल गन्दगी फ़ैल सकती है....और फ़ैल रहा है जिसका कही न कही खामियाजा हो ही रहा है|

आप क्या चाहते हैं?