• India

    Every particle, even sand says I AM AN INDIAN

  • Indian Tea

    India is a leading producer of TEA, do you wanna have Indian Tea

  • India Heart Of the World

    Take the Aroma of Indian Soil and it's promise that you would not forget it

  • Soil to Sea, it's India

    You may be tired but Scenories will not end, those will come with some new surprises

  • Forts still holds

    An eye catching but surprise everyone, how big and beutiful they are

Showing posts with label Religious. Show all posts
Showing posts with label Religious. Show all posts

8 Sept 2013

Why media keep silence on anti-national Christian and Muslims


Opus dei इसाई समुदाय द्वारा पोषित मीडिया वाले जैसे दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही लगातार टीवी चैनल पर "सर्व धर्म समभाव" का पाठ पढ़ाते दिख रहे हैं! क्या यह जनता को दिग्भ्रमित करने वाला नहीं है? क्यों मीडिया वाले सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं रखते? या तो इनको इस देश की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान ही नहीं है या यह जानबूझ कर पैसा खा कर देशद्रोह और मक्कारी कर रहे हैं! 

क्यों मीडिया के मस्जिदों में पनपते 'इस्लामिक आतंवाद' की बात नहीं करते? क्यों वह नहीं बताते की आजकल मदरसों में केवल आतंकवादियों का निर्माण हो रहा है! क्यों नहीं बताते कि मस्जिदों में प्रतिबंधित अत्याधुनिक बिना लाइसेंस के हथियार संगृहीत कर के रखे जाते हैं जिसका कि दंगा फसाद में अनुचित और बर्बर प्रयोग होता है! अगर सच से आगाह करा दिया जाता तो पता नहीं कितने मासूम लोगो की जान बच जाती! क्यों मीडिया ऐसे "सर्व धर्म समभाव" की बात कर रही है जिससे की आतंकवादियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं? आतंकवादियों को पता है कि सारे कुकर्म करने के बाद भी उनको मासूम घोषित कर दिया जायेगा और भले ही दंगा उन्होंने शुरू किया हो इसका आधा श्रेय मासूम जनता के सर मढ़ दिया जायेगा! फिर क्या वह बरी और आज़ादी से फिर दंगा फसाद करने को स्वतंत्र! क्यों मीडिया 'विषधर नाग' को 'रस्सी' जैसा हानिरहित बता कर मासूम लोगो तो खतरे की तरफ लगातार धकेल रही है? क्या इसके लिए इनके खिलाफ PIL दाखिल नहीं होनी चाहिए?

कैथोलिक चर्च में हो रहे कुकर्मो की बात क्यों नहीं करती है मीडिया? दीपक चौरसिया और विजय विद्रोही जैसे मूर्खो को तो शायद यह भी नहीं पता होगा की जीसस स्वयं क्रिस्चियन नहीं थे! रोमन लोगो ने उनको सूली पर चढ़ाया था और सौ साल स्वयं के फायदे के लिए रोमन ने ही जीसस के नाम को राजनैतिक हथियार की तरह  इस्तेमाल किया! इसाई धर्म की स्थापना जीसस की मृत्यु के सौ साल बाद उनके जीवन पर लिखे गए विभिन्न gospels/ वृतान्तो को संग्रहीत कर के की गयी थी! सैकड़ो में लिखे गए वृतान्तो में केवल 18 वृतांत चुन कर "ओल्ड टेस्टामेंट"/बाइबिल बनाया गया था! जिन रोमन्स ने जीसस का बेदर्दी से क़त्ल किया आज वह कैथोलिक चर्च खोल के धर्म के ठेकेदार बन बैठे हैं! आखिर क्यों ना हो जिसके पास स्वर्ग की चाभी होगी वही तो दुनिया पर राज करता आया है! 

"सर्व धर्म समभाव" की बात बुद्ध के समय की है जब की इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का नामो निशान नहीं था! वैसे भी हिन्दू धर्म में 'धर्म' का मतलब 'मज़हब' या 'religion' नहीं होता है! धर्म का अर्थ सही या  righteous मार्ग होता है जिसमे मानव जाती, पर्यावरण, जीव जंतु, सृष्टि, अंतरिक्ष हर किसी के प्रति मानवीय उत्तरदायित्व की बात की गयी है! 

"सर्व धर्म समभाव" और "वसुधैव कुटुम्बकम" का अर्थ इस देश की संस्कृति के परिपेक्ष में मेरी समझ में ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद के सन्दर्भ में किया गया है और दोनों ही विचारधाराओ को मान्यता देते हैं! कोई भी विचारधारा हो और अगर उसका मूल तत्व मानव समाज का भला, उन्नति और उत्थान नहीं है तो वह इस देश के अनुकूल नहीं है! समय के हिसाब से अगर कुछ कुरीतियाँ आ भी गयी है तो हमे उसको अपने आप सुधारना है ना कि उसके गलत अर्थ से सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देना है! मुझे ब्राह्मणों से कोई द्वेष नहीं है परन्तु यदि ब्राह्मण अपनी विद्वता, कर्म और उद्देश्य को छोड़ देता है तो उसको हम कैसे सम्मान दे सकते हैं? बिना किसी विवाद में फंसे मैं सबसे प्रार्थना करूँगा की वह श्री सी गोपालाचार्य द्वारा लिखित 'महाभारत' को पढ़ कर देख लें! जहां पर साफ़ साफ़ लिखा है की ना कोई जन्म से ब्राह्मण है और ना जन्म से शुद्र!

हमारे देश की संस्कृति में अगर हिन्दू विचारधारा को तार तार कर के चर्चा की जा सकती है तो हम इस्लाम क्रिश्चियनिटी कम्युनिज्म साधू संत सोनिया गाँधी मनमोहन सिंह को तार तार करके क्यों नहीं चर्चा कर सकते! जब हम भगवन के अस्तित्व पर प्रश्न उठा सकते हैं तब फिर बाकि सब तो बहुत छोटी मोती चीज़ें हैं!

अंत में इस्लाम के जानने वाले ज्ञाता यह बतायेंगे की खुदा ने गिब्रैल के द्वारा मोहम्मद से क्यों बात करी क्या खुदा मोहम्मद से सीधे बात नहीं कर सकते थे? मुल्ला मौलवी अपने स्वार्थ के लिए इस्लाम को तोड़ने मरोड़ने को आज़ाद क्यों हैं?

Written By: गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव

7 Sept 2013

Soniya Gandhi planning to Loot Indian Temples

रुपये का अवमूल्यन: सोनिया गांधी की साजिश


भारत मे रुपये का अवमूल्यन है नहीं बल्कि सरकार और सोनिया गांधी द्वारा जानबूझ कर किया गया है !

भारत देश जो की 2008-09 की वैश्विक मंदी के समय भी अडिग खड़ा था और पूरा विश्व भारत की तरफ देख कर पैसे लगाने को लालायित था वही भारत देश आज बांग्लादेश से भी आर्थिक रूप से पिछड़ रहा है। आखिर ऐसा क्यूँ?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको अभी से कुछ समय पहले हुई एक बड़ी घटना को जानना होगा। हमारे देश मे बहुत से मंदिर हैं और सभी मंदिर एक से बढ़ कर एक धनी मंदिर हैं। सभी मंदिरों मे अपार सोना, चाँदी, हीरे इत्यादि ना जाने कितने ही दुर्लभ वस्तुएँ रखी हुईं हैं। अभी तक ये सभी बातें सिर्फ किंवदंतियाँ थी, लेकिन जब जुलाई 2011 मे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का खजाना खुला तो भारत ही नहीं पूरे विश्व की आँखें फटी की फटी रह गईं।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर ना सिर्फ भारत का बल्कि विश्व का सबसे धनी मंदिर बन गया। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के अंदर अकूत सम्पदा खज़ानों मे सालों से पड़ी हुई है। अब जैसे ही श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का धन पूरी दुनिया के सामने आया, पद्मनाभ मंदिर मे पूरा विश्व दिलचस्पी लेने लगा एवं विश्व के कई देशों की नजरें उस मंदिर की सम्पदा पर गड गईं।

अब भारत के मूल्य निर्धारण प्रणाली से श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के अकूत धन का मूल्यनिर्धारण किया गया था, लेकिन चूंकि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का मे रखी सम्पदा सदियों पुरानी है, अतः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की ये सम्पदा का मूल्य निर्धारण कोई भी नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति मे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की इस सम्पदा का मूल्य कोई नहीं आंक सकता है एवं ये अमूल्य है।

ये तो हुई मंदिर की बात और शायद ऐसे खजाने भारत के अधिकांश मंदिरों मे मिलेंगे। 

लेकिन भारत के इस आर्थिक विनाश की कहानी इसी जुलाई 2011 के बाद से हुई। आपको याद होगा की अगस्त क्रांति के नाम पर अन्ना रामलीला मैदान मे अनसन पर बैठे और सोनिया गांधी इलाज कराने के नाम पर अमेरिका गई। उसके बाद से भारत मे प्रायः हर महीने ही तेल के दाम बढ्ने लगे, गैस के दाम बढ्ने लगे, सब्जियों के दाम आसमान पर पहुँच गए, सभी तरफ आर्थिक त्राहि-त्राहि मच गई, जो की भारत मे जो आज तक बदस्तूर जारी है।

इधर जो डॉलर कुछ साल पहले तक 44-45 रुपये था अचानक से बढ़ता हुआ 70 के करीब जा पहुंचा, पाउंड 78 से सीधा 100 के पास पहुँच गया, और भारत के महान अनर्थ-शास्त्रियों जिनमे कोंग्रेसी प्रधानमंत्री मन मौन-हन सिंह भी हैं ने तर्क दिया की चूंकि भारत मे खपत ज्यादा है एवं तेल के दाम बढ़ रहे हैं ऐसे मे रुपये का अवमूल्यन हो रहा है। चलो जी हमने मान लिया फिर एक टुच्चे से देश बांग्लादेश की करेंसी "टका" का अवमूल्यन क्यूँ नहीं हुआ। बल्कि डॉलर के मुक़ाबले बंगलादेशी टका का मूल्य जहां अक्टूबर 2012 मे 84 था आज वो घट कर 77 पर आ गया।

अब ये पूरा घटनाक्रम देखने के बाद एवं अचानक से सरकार के सोने को गिरवी रखने एवं मंदिरों से सोने की मांग करने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है की सोनिया गांधी ने अपने अमेरिकी एवं अन्य विदेशी मालिकों के कहने पर जानबूझ कर रुपये का अवमूल्यन कर मंदिरों मे पड़े अमूल्य खजाने को सोने के नाम पर बाहर निकाल कर बेच देने का है। और इसी कार्य को सही ढंग से करने हेतु अमेरिकी नागरिक को भारत का RBI गवर्नर बना कर लाया गया। आते ही इस अमेरिकी गवर्नर ने भारत के जिन मंदिरों को सोना देने को कहा उनमे से कुछ प्रमुख मंदिर इस प्रकार से हैं : तिरुमाला तिरुपति मंदिर, श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, गुरुवायुर के श्री कृष्णा मंदिर, श्री सिद्धिविनायक मंदिर एवं वैष्णोदेवी मंदिर। 

वैसे भी ध्यान देने वाली बात है की सोनिया गांधी की बहन जो मुफ़लिसी मे जिंदगी जी रही थी सोनिया गांधी के भारत आने के बाद एक आलीशान दुकान जहां भारतीय मूर्तियाँ बेची जाती हैं उसकी मालकिन बन बैठी एवं एक भी आयात की हुई मूर्ति की पर्ची उसके यहाँ नहीं मिलती लेकिन फिर भी भारत से मूर्तियाँ सोनिया गांधी की बहन के यहाँ पहुँच जाती है।

ऐसे उदाहरण के पश्चात ये कयास लगाना की भारत मे रुपये का अवमूल्यन जान बुझ कर मंदिरों की सम्पदा को लूटने के लिए गया है, को सही मानने की इच्छा बलवती हो रही है एवं पूर्णतया सच प्रतीत हो रही है।

17 Jan 2013

Maha Kumbh, Ganga and Sangam


महिमा गंगा मईया की


आस्था ने मिटाई जातियों एवं समंदरों की दूरियाँ


14 जनवरी, 2013, पौष सूद 3, विक्रम संवत 2069, दिन सोमवार मकर संक्रांति के दिन इलाहाबाद स्थित संगम पर साधुओं के शाही स्नान के साथ सदी के महाकुंभ का शुभारम्भ।


आज मैं बहुत ही उत्सुक था सदी के महाकुंभ के दिन और शाही स्नान के समय मे ही संगम मे डुबकी लगाने को। लेकिन मन मे एक डर था की कहीं भीड़ के वजह से मैं संगम मे डुबकी ना लगा पाऊँ। कहीं ऐसा ना हो की जहां मैं डुबकी लगाऊँ वहाँ केवल पतित पावनी गंगा हों या फिर यमुना हों। मेरा मन था सिर्फ उस स्थान पर डुबकी लगाने को जहां माँ गंगा, यमुना और अदृश्य रूप मे सरस्वती मिल संगम बनाती हैं।

मैं एक उत्साह और मन मे संगम से दूर जाने के डर को लिए हुए घर से निकल गया संगम की ओर। जैसे-जैसे मैं नदी तट के समीप पहुँच रहा था वैसे-वैसे दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी। रास्ते मे बहुत से श्रद्धालु मिले जिनमे कोई बंगाली था तो कोई मराठी, कोई उड़ीसा से आया था तो कोई केरल से, किसी का घर कश्मीर मे था तो किसी का गुजरात मे, कोई आसाम का रहने वाला था तो कोई पंजाब का, यहाँ तक की मुसलमान भी पहुंचे थे इस सदी के महाकुंभ मे डुबकी लगाने। आश्चर्य हुआ मुझे देख कर की सात समंदर पार से आए विदेशी श्रद्धालुओं को देख कर जो भगवा भेष मे नंगे पाँव श्रद्धाभाव मे नदी के तरफ बढ़े चले जा रहे थे। ये विदेशी श्रद्धालु रास्ते मे जो भी मिल रहा था उससे हाथ जोड़ नमस्ते कर रहे थे। भगवा वस्त्र मे तन कर चले जा रहे थे। जिनके पास भगवा वस्त्र नहीं थे वो खरीददारी करते हुए दिखे भगवा वस्त्रों की।

सभी के अंदर एक ललक और एक उत्साह था नदी मे डुबकी लगाने का। सभी भाव-विह्वल थे। सभी निष्काम भाव से आगे बढ़े चले जा रहे थे और गंगा मईया की जय, जय श्री राम अथवा अपने इष्ट देव का आहवाहन करते हुए चले जा रहे थे। रास्ते मे कई लोग ऐसे मिले जो आने जाने वालों को चाय, नाश्ता या पानी वगैरह की सुविधा देने के लिए खड़े थे और सब मुफ्त था। मैं चूंकि अपने रिस्तेदार के यहाँ से ही निकला था तो मैंने उनके इस आग्रह को विनम्रता से मना कर दिया की मुझे जरूरत नहीं है आप मेरा हिस्सा किसी दूर से आए श्रद्धालु को दें मैं तो अभी घर से ही आ रहा हूँ।
मैं भी विभिन्नता मे एकता को प्रदर्शित करती श्रद्धालुओं की भीड़ के साथ उस जगह पहुंचा जहां से कुम्भ मेला आरंभ था। मैं जैसे वहाँ पहुंचा तो देखा की नदी के तरफ मुंह करके रेत मे लेट कर गंगा मईया को सस्टांग नमन करते भगवाधारी कई विदेशी श्रद्धालु जिनकी आँखें नम थी माँ गंगा के मुहाने पर आ कर ही एवं एक बच्चे के मानिंद खुश हो रहे थे वो विदेशी तथा भारत के भिन्न-भिन्न कोने से पहुंचे हुए भक्त गण। उनको देख मेरे अंदर भी माँ गंगा को वंदन करने की ईक्षा हुई और मैं भी लोट गया उस सफ़ेद बालू मे। सफ़ेद बालू की शीतलता ने ही मेरे अंदर के अभी तक के सारे थकान को जैसे एक क्षण मे हर लिया हो और एक नई स्फूर्ति मेरे नसों मे दौड़ गई हो।

वहाँ से उठ हम सभी बढ़ चले संगम तट की ओर एक नए उत्साह से ओत-प्रोत हो कर। रास्ते मे हमें और श्रद्धालु भी मिलते गए और कारवां बनता गया, जयकारा लगता गया गंगा मईया का। सभी श्रद्धालु एक दूसरे को साथ ले कर चल रहे थे। हर तरफ केवल श्रद्धालुओं की भीड़ थी। लड़के-लड़कियाँ, बड़े-बुड्ढे यहाँ तक की बच्चों मे भी एक उत्साह था, गंगा मे डुबकी लगाने का। जमीन तो कहीं दिख ही नहीं रही थी। केवल श्रद्धालुओं का शरीर और उनकी भक्ति-निष्ठा दिख रही थी। एक भाव-विह्वलता दिख रही थी। एक समर्पण दिख रहा था माँ गंगा के प्रति। 

रास्ते के दोनों तरफ साधुओं के स्थल थे। उसके बीच से ही सारे श्रद्धालु बस संगम तट की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। रास्ते मे पुलिस की बैरिकेटिंग थी भीड़ को दूसरे तरफ मोड़ने हेतु ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ एक ही घाट पर ना पहुँचे। पर गंगा मईया की महिमा भी अपरंपार थी और मैं अपने साथियों समेत संगम के तरफ ही मुड़ गया। जैसे पता चला की मैं संगम के तरफ मुड़ा हूँ मेरा उत्साह और दुगुना हो गया साथ ही विदेशी और देश के विभिन्न प्रान्तों से आए श्रद्धालुओं का भी। 

अब हम सूखी सफ़ेद रेत से निकल कर गीली रेत पर आ गए और गीली रेत के ठंढक कर अहसास तन के साथ-साथ मन को भी सुकून दे रहा था। अब हमारी निगाहों के सामने विशाल क्षेत्र मे फैला संगम था। संगम का दृश्य बहुत ही विहंगम था और सभी भावविह्वल थे वहाँ। कुछ की आंखे नम थीं वहाँ तो कुछ श्रद्धा भाव मे बस गंगा और संगम की अविरलता को निहारे जा रहे थे। क्यूँ झूठ बोलूँ मैं खुद भी उनही श्रद्धालुओं की भीड़ मे था जो अविरलता को निहार रहे थे।

मैंने कब कपड़े उतारे और कब मैं संगम की गोद मे समा और उस अविरलता को अपने तन और मन पर महसूस करने हेतु और भी गीले रेत मे कब उतर गया, मैं कब झुका माँ गंगा को श्रद्धा सुमन अर्पित करने हेतु, इसका मुझे पता ही नहीं चला। मुझे तो तब पता चला जब गंगा मैं संगम के ठंडे पानी मे उतरा और ऐसा लगा की जैसे मेरे पैर ठंड से सुन्न हो गए। यकीन मानिए और जगह होती मैं निकल गया होता पानी से, इतनी ठंड मे कौन इस बर्फ वाले पानी मे नहाये। परंतु जाने वो कौन सी शक्ति थी जिसने मेरे अंदर इतनी गर्मी पैदा कर दी की जब मैं छाती के बराबर पानी मे पहुँचा और डुबकी लगाई तो ऐसा जान पड़ा की इससे बड़ी शांति नहीं मिल शक्ति और कौन कहता है की जनवरी मे उत्तरी भारत मे 0 के आस-पास तापमान पहुँच गया था। कौन कहता है की इस ठंडी मे नदी का पानी बर्फ के मानिंद ठंडा होगा। पहली डुबकी के बाद जरा भी ठंड नहीं थी। 

तभी मेरी नजर नदी के दूसरे तट पर गई जहां साधू-सन्यासी शाही स्नान कर रहे थे और वो भी उसी प्रकार उछल-कूद मचा रहे थे माँ गंगा और संगम मे जैसे की वो किसी माँ के गोद मे किलकारी मार हाथ-पैर चला रहे हों। 

एक वाक्य मे कहें तो "क्या साधू क्या सन्यासी या फिर था वो कोई श्रद्धालु, सब थे मगन ध्यान मे लिन, गंगा की गोद मे समा जाने को तैयार।"

फिर मैंने अपने सभी परिजनों, स्वजनों और मित्रों के नाम की डुबकी लगाई जिनके नाम मुझे याद आते गए उस भावविह्वलता मे। फिर अपनी डुबकियाँ लगाईं मैंने। फिर जैसा माना जाता है की संगम मे स्नान के बाद वहीं नदी मे खड़े-खड़े सूर्य भगवान को अर्घ दिया जिसमे मैंने अपने सभी स्वजनों के लिए प्रार्थना और देश का भविष्य बदले ऐसी कामना की। (अब प्रार्थना क्या की ऐसा मानना है की बताया नहीं जाता है तो आपको मेरे कहे पर विश्वास करना पड़ेगा की मैंने प्रार्थना की)।

संगम मे अच्छा समय बिताने के बाद मैं बाकी के श्रद्धालुओं के साथ ही बाहर निकला। अपने कपड़े पहने। तब मैंने देखा की वहाँ तो लड़कियाँ भी नहा रही हैं, माताएँ भी नहा रही हैं, सात समंदर पार से लड़कियाँ भी नहा रही हैं और बाहर निकल कर कपड़ों के ओट मे वो अपने कपड़े बदल रही हैं परंतु लाखों की भीड़ के बाद भी किसी भी माता-बहन के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं कर रहा है। सभी अपने मे मस्त हैं। शारीरिक सौंदर्य की उपेक्षा कर केवल और केवल संगम के सौंदर्य को देखने मे व्यस्त हैं।

अब कपड़े पहन लेने के बाद मैंने सोचा की घूमते हैं कुम्भ लेकिन तभी घाट पर ही मैंने देखा की कुछ परिवार जिनमे औरतें ज्यादा थीं वो स्नान करने के बाद वहाँ पुजा वगैरह कर लेने के बाद प्लास्टिक की थैलियाँ वहीं छोड़े जा रही थी। मैंने उन्हे रोका और कहा की आप कृपया अपने फैलाये हुए कूड़े को समेट लें और इन्हे बाहर फेंके। इतने पर औरतें मेरे ऊपर चढ़ बैठीं। मैं कौन होता हूँ उन्हे मार्गदर्शन देने वाला या उनके काम मे टांग अड़ाने वाला या मुझे अपने काम से मतलब रखना चाहिए।

तब मैंने शांत मन से उन सभी परिवारों को समझाया की हम यहाँ अपने अगर कोई मैल है तो इस पावन घाट पर उस मैल को धोने आते हैं, हम यहाँ एक श्रद्धा भाव से आते हैं, हम यहाँ माँ गंगा के दर्शन और उनकी शीतलता और अविरलता को अपने अंदर आत्मसात करने आते हैं ना की हम यहाँ अपनी गंदगी को माँ गंगा को दान करने आते हैं, हम यहाँ आपने कूड़े को माँ गंगा मे प्रवाहित करने नहीं आते हैं, हमारे इस कूड़े से माँ गंगा कितनी दूषित होंगी और माँ गंगा को क्या कष्ट होगा हमारे इस कूड़े के प्रवाह से आप इतना तो समझ ही रहे होगे। 

मेरे इतना समझने पर वो परिवार तुरंत समझ गया और उस परिवार ने ना केवल अपना ही कूड़ा बल्कि बाकी और भी जो कूड़े वहाँ थे सभी कूड़े को उठा एक झोले मे भर लिया और यही कार्य वहाँ उपस्थित बाकी लोगों ने भी किया और तुरंत ही घाट पूरी तरह से कूड़ा विहीन हो गया।

इन सारी गतिविधियों लोगों के बीच के बिना भेद-भाव के आत्मीयता को देख कर यही लगा की सच मे माँ गंगा और संगम साथ ही इस महाकुम्भ मे कुछ तो शक्ति है जो सभी को एक सूत्र मे बांध देती है।


हर हर गंगे

जय निर्मल पतित पावनी गंगा 



13 Jan 2013

Media against Kumbh a hidden agenda


भारतीय मीडिया पर भारी महाकुंभ


मीडिया सही मार्ग के नाम पर हिंदुओं को कर रही गुमराह




जो कुम्भ मेला जाने कितनी सदियों से चलता चला आ रहा है और न केवल भारत बल्कि देश-विदेश से लोग यहाँ जुटते हैं और ये मेला मानव जाती का पृथ्वी का सबसे बड़ा जनसमूह को अपने मे समेटता है उसके लिए अब मीडिया के पेट मे दर्द शुरू हो गया। शायद मीडिया घराने को इस मेले की भव्यता से कुढ़न हो गई तभी तो इन मीडिया के ओहदेदारों को बाकी मे नहीं दिखाई दे रहा है कुछ।

क्या मतलब है क्रिसमस पर लोगों को गिफ्ट बाँट कर या भारत मे रह कर विदेशी कैलेंडर के हिसाब से नया साल मनाने का या एक तय तिथि 14 फरवरी को प्यार का दिन मनाने का जबकि भारत मे हर एक दिन प्यार का दिन माना जाता है।

क्या मीडिया को किसी तय पर्व मे सड़कों पर नंगे हथियारों से अपने शरीर को जख्मी करती भीड़ नहीं दिखती है या की सनातन पैदा बच्चे या बच्ची का शरीर विक्षेदित किया जाये ताकि उसको मुसलमान बनाया जा सके परंतु ईमान ना हो उसके अंदर। 

या इस मीडिया को ये दर्द हो रहा है की करीब 10 लाख विदेशी मूल के गोरे या काले लोग जो अपने मूल सनातन धर्म से भटक गए थे वो वापस सनातन धर्म मे वापस आ गए हैं और कुम्भ मे धुनि रमाए बैठे हैं वो भी भगवा मे।

अब तो यही लगता है की जैसे हिन्दू धर्म का कोई भी त्योहार हो ये भीखारी पहले पहुँचेंगे अपना कटोरा ले कर और भीख मिलने के तुरंत बाद गाली भी देना चालू करेंगे।

अब ये असल दर्द क्या है ये या तो इन मीडिया के कर्मी जाने या फिर इनके आका परंतु ये इस बात को भूल रहे हैं की हिन्दू जिस दिन उठ गया उस दिन इनको देखने को कुछ नहीं बचेगा। 

अतः मीडिया के सरदारों आपको एक नम्र सलाह है

"चड्ढी मे ही रहो.......लंगोट ना बांधो........खुल जाएगी जल्दी.......और नंगे हो जाओगे"



10 Jan 2013

Rudraksha

रुद्राक्ष



आज के युग मे सभी वर्गों मे रुद्राक्ष के विषय मे अनेकानेक धारणाएँ प्रचलित हैं। धार्मिक संस्थानों पर रुद्राक्ष की मालाएँ भी खूब बिकती हैं। यह देखकर क्रेता के मन मे रुद्राक्ष के विषय मे उचित जानकारी पाने की जिज्ञासा होती है। लेकिन रुद्राक्ष के विषय मे प्रचलित अनेकानेक भ्रांतियों से उलट उचित जानकारी का अभाव होता है।

मनुष्य के जीवन मे तीन एषणाएँ होती हैं, प्रथम- प्राण एषणा, द्वितीय- लोक एषणा और तृतीय धन एषणा। ये तीनों एषणाएँ रुद्राक्ष धारण करने से पूर्ण होती हैं। यह रुद्राक्ष चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने मे सक्षम है। मनुष्य के लिए स्वास्थ्य, आयुष्य, मेघा, शक्ति, सुंदरता, ऋद्धि-सिद्धि से लेकर धन, संतान और उच्च पद की प्राप्ति रुद्राक्ष धारण से प्राप्त होती है। आठों सिद्धि और नवों निधियों का सुख रुद्राक्ष के धारण से प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों मे पढ़ने को मिलता है। रुद्राक्ष की अपरिमित माँग और बहुमूल्यता भी इसके महत्व मे चार चाँद लगाती है। इसके विभिन्न प्रकारों या जातियों का अलग-अलग महत्व है।

रुद्राक्ष की दिव्यता से पूरा विश्व आलोकित होता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की "रुद्राक्ष" पर जीतने शोध विदेशों मे हुए हैं उसके आगे हम भारतीय शिथिल हैं इसके प्रति। हम अपनी ही दिव्य वस्तु को महत्व नहीं दे पा रहे हैं। वहीं विदेशी इसके गुणों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं।

यदि रुद्राक्ष को विधिवत इसके प्रत्येक मुख की विवेचना करके धारण और उपयोग मे लाया जाये तो दुनिया का महंगे से महंगा रत्न (हीरा, नीलम, पुखराज, माणिक्य, पन्ना और मोती) भी गुणों मे रुद्राक्ष की बराबरी नहीं कर सकते हैं। रत्न धारण करने से पूर्व जीवन का ज्योतिषीय विवेचन करना पड़ता है, लेकिन रुद्राक्ष धारण करने से पूर्व यद्दपी धारणकर्ता को जीवन की ज्योतिषीय विवेचन नहीं करना पड़ता है तथापि यदि थोड़ा सा विवेचन करके विधि-विधान से रुद्राक्ष को धारण और उपयोग किया जाये तो रत्नों से कई गुना ज्यादा लाभ निश्चित उठाया जा सकता है, इसमे संशय नहीं है। 

रुद्राक्ष भगवान शिव का प्रसाद और साक्षात उनका स्वरूप है, ये शिव के रूप मे पूजित है। वैज्ञानिक परीक्षणों से यह प्रमाणित हो गया है की रक्तचाप को संतुलित रखने की इसमे अपूर्व क्षमता है रुद्राक्ष को धारण करने वाला सदा सुखी, निरोगी, प्रसन्न और आलस्य रहित रहता है। रुद्राक्षधारी को दिल का दौरा, मधुमेह, गुर्दा संबंधी बीमारियाँ या तो नहीं होती या फिर नियंत्रित रहती हैं। बीमारियों को काबू मे रखना उन्हे ठीक करना रुद्राक्ष जैसी दिव्य वस्तु का एक छोटा सा गुण है, इसका मुख्य कार्य तो मानव जीवन को पूर्णता प्रदान कर मोक्ष तक पहुँचना है।

नक्षत्रों की संख्या सत्ताईस है, प्रत्येक नक्षत्र पर किसी न किसी का आधिपत्य अवश्य होता है। अलग-अलग मुखी रुद्राक्ष का अलग-अलग नौ गृह आधिपत्य है। अतः ये सत्ताईस नक्षत्र किसी न किसी सम्बद्ध रुद्राक्ष से संचालित होते हैं। इसलिए यदि जन्म नक्षत्र के अनुसार विभिन्न मुखों के रुद्राक्ष धारण किए जाएँ तो अधिक लाभ प्राप्त होता है, क्यूंकी वे अपने सम्बद्ध ग्रहों से शक्ति ग्रहण करते हैं। रुद्राक्ष की ग्रहिका शक्ति सर्वाधिक तीव्र और संचयिता की तरह है। रुद्राक्ष केवल शक्ति संग्रहण ही नहीं अपितु ऊर्जा का विकीर्णन (धारणकर्ता के शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को बाहर करना) भी करता है, जबकि रत्न केवल ऊर्जा का संग्रहण ही करते हैं। विकीर्णन की क्षमता रत्नों मे नहीं होती है। शोध, अध्ययन, प्रयोग, धारण, अनुभूति एवं अनुभव के आधार पर जो निष्कर्ष निकलता है वह अद्भुत है, लोक हितकारी है।


डॉ॰ एम॰ पी॰ सिंह 


6 Jan 2013

I am Hindu ...

"मैं हिन्दू हूँ"




हिन्दुत्व ही क्यूँ ?


पिछले साठ वर्षों से स्कूलों मे जाने वाले हर बालक-बालिका के मुख से तथा जनता के मुख से यही गवाया जाता रहा है - "मजहब नहीं सिखाता, आपस मे बैर रखना", जबकि तथ्य यह है कि पिछले पंद्रह सौ वर्षों मे विश्व मे जितना खून मझाब के नाम पर बहा है, उसकी कोई तुलना ही नहीं है। कत्लेआम, बलात्कार, अत्याचार का तो कोई हिसाब ही नहीं है।

हिन्दू ने प्रत्येक मजहब का स्वागत किया है और इसे भारत मे फलने-फूलने का अवसर दिया है।

अब एक अन्य खतरनाक मझाब 'नास्तिक' एक चुनौती बन कर उभर रहा है। दुनिया मे नास्तिक मत (कम्यूनिज़्म) ने भी हंगरी इत्यादि देशों मे कम रक्त नहीं बहाया। नास्तिक्य और कम्यूनिज़्म भी मजहब के अंतर्गत आते हैं।

अभी बीसवीं शताब्दी पर ही दृष्टि डालें तो देखेंगे कि भारत, जैसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हिमांचल से पूरी तक एक सूत्र मे बंधे देश को तीन टुकड़ों मे मझाबी आधार पर विभाजित कर दिया गया। यह उस मजहबी जुनून का कमाल है जो "नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना।"

एक मात्र हिन्दू धर्म ही ऐसा है जिसने विश्व को मानवता का प्रचार करने के लिए शांति दूत भेजे और बिना युद्ध किए विश्व भर को मानवता का पाठ पढ़ाया और प्रचार किया। 

इस पर भी हिन्दू धर्म को सांप्रदायिक कहना या तो मूर्खता ही काही जाएगी अथवा धूर्तता। हिन्दू कोई मजहब नहीं है। यह कुछ मान्यताओं का नाम है। वे मान्यताएं ऐसी हैं जो मानवता का पाठ पढ़ाती हैं।

हिंदुओं कि धर्म पुस्तकों मे मनुस्मृति का नाम सर्वोपरि है और मनुस्मृति धर्म का लक्षण करती है - धुर्ति क्षमा दमोस्तेय शौचम इंद्रिय-निग्रह, धीर्विधा सत्यमक्रोधी दशकम धर्म लक्षणम। कोई बताए इसमे कौन सा लक्षण है जो मानवता के विपरीत है। 

स्मृति मे धर्म का सार स्पष्ट शब्दों मे कहा है - श्रूयतां धर्म सर्वस्व, श्रूत्व चैवाव धार्यताम, आत्मनः, प्रतिकूलानि परेणाम न समाचरेत ।। (धर्म का सार सुनो और सुनकर धारण करो, अपने प्रतिकूल व्यवहार किसी से न करो।)

ऐसे लक्षण वाले धर्म को साम्प्रदायिक कहता तो मूर्खता की पराकाष्ठा कही जाएगी।

वास्तव मे हिन्दू धर्म को न समझने के कारण दुनिया मे अशांति मची हुई है। सम्पूर्ण भारत देशवासी हिन्दू ही हैं क्यूंकी वे हिंदुस्तान के नागरिक हैं। इस्लाम, ईसाई, पारसी, बौद्ध इत्यादि जो हिंदुस्तान का नागरिक है वह हिन्दू ही है।

हमारे राजनैतिक नेता तथा आज के कुशिक्षित लोग अंधाधुंध, बिना सोचे समझे लट्ठ लिए हुए हिन्दू के पीछे पड़ जाते हैं। 

समस्या का हल तो है परंतु राजनीति में आए स्वार्थी नेता अपना उल्लू कैसे सीधा करेंगे?

बच्चों की पाठ्य पुस्तक मे एक पाठ इस विषय मे हो, कि हिन्दू क्या है, इसके मान्यताएं क्या हैं, और भारत का प्रत्येक नागरिक जो भी भारतवासी है, वह हिन्दू ही है।

हिंदुओं कि मान्यताएं शास्त्रोक्त हैं, बुद्धियुक्त हैं, किसी भी मझाब के विरोध मे नहीं। किसी भी मजहब को मानने वाले यदि वे हिन्दू कि मान्यताओं को जो मानवता ही है, मान लें तो द्वेष का कोई कारण नहीं रहेगा।

संक्षेप मे हिन्दू कि मान्यताएं हैं - जोकि शास्त्रोक्त हैं, युक्तियुक्त हैं, इस परकर हैं -

1॰ जगत के रचयिता परमात्मा पर जो सर्वशक्तिमान है, अजर अमर है, विश्वास;
२. जीवात्मा के अस्तित्व पर विश्वास;
३. कर्म-फल पर विश्वास। इसका स्वाभाविक अभिप्राय है पुनर्जन्म पर विश्वास;
४. धर्म पर विश्वास। धर्म जैसा कि मनुस्मृति मे लिखा है, जिसका सार है - 

आत्मनः प्रतिकूलानी परेषाम न समाचरेत । । 

हिन्दू जनसंख्या विश्वपटल पर 

हिन्दू के इतिहास पर, हिन्दू राष्ट्र कि विवेचना पर तथा हिन्दू कि मान्यताओं पर श्री गुरुदत्त जी ने तीन पुस्तकें लिखीं हैं - हिन्दुत्व कि यात्रा, वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान-हिन्दू राष्ट्र तथा मैं हिन्दू हूँ (हिन्दू धर्म कि मान्यताएं), जो प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को पढनी चाहिए। 

साभार : श्री गुरुदत्त जी 
पुस्तक : मैं हिन्दू हूँ (हिन्दू धर्म कि मान्यताएं)




21 Dec 2012

History of Hindus after 50 years

50 साल बाद कुछ इस प्रकार लिखा जायेगा हिन्दुओं का इतिहास



यदि इस देश का हिन्दू अब भी नहीं जगा तो 50 साल बाद कुछ इस प्रकार लिखा जायेगा हिन्दुओं का इतिहास :


कभी इस देश का नाम भारत हुआ करता था, फिर भारत से बदल कर हिंदुस्तान हुआ, अब दोनों भारत और हिंदुस्तान को हम भारतवाशियों ने ख़तम कर बना दिया उसे इंडिया। इस देश में विदेशी आतताइयों के निरंतर  हुए। यहाँ के हिन्दू शासक ताकतवर और साहसी तो जरुर थे परन्तु उनकी आपस में ही फुट थी। धार्मिक कायरता थी इस लिए भारत के हिन्दू शासक विदेशी आतताइयों से हार गए।

यहाँ की औरतें, खाना, जमीन और मौसम बहुत अच्छा था (आज भी अहि) जिस वजह से भारत की ये पावन धरा हमारी वसुंधरा विदेशियों को भा गई। धीरे-धीरे उन विदेशियों का राज हो गया। उनकी संख्या बढती गई। फिर इक और विदेशी कौम आई हमारी इस पावन धरा को कलुषित करने वो थी अंग्रेज। इस अंग्रेज कौम ने हमारे फूट का फायदा उठा यहाँ इसाई कौम को फैलाया तथा अंत में जाते-जाते इस देश के तीन टुकड़े करके थमा दिए हमें एक सोने की थाली में सजा कर और देखो हमने क्या किया उनकी सोने की थाली में दिए हुए विष को भी अमृत समझ कर ख़ुशी-ख़ुशी पी लिया और बड़े आराम से बैठ गए दोनों कोनों पर और इसको और टुकड़ों में बाँटने के काम में मनोयोग से लग गए।

अब क्या कहें की इस देश का हिन्दू महाबेवकुफ़ था या है जो इन आतताइयों को अपना हितैषी और भाई मानता रहा। इसमें इनके कुकर्मों को आसान करने हेतु और भी कई लोग कंधे से कन्धा मिला कर देश को पतन के मार्ग पर चलने के लिए आ गए इनमे प्रमुख थे बहुतों के महाश्रद्ध्येय गाँधी और नेहरु। ये दोनों महाशय देशी वस्तु के उपयोग को बढ़ावा देने की बात तो करते थे परन्तु खुद विदेशी वस्तु को गले में लटकाए घूमते रहे जिसे आज पूरा भारत भुगत रहा है। जी हाँ आपने सही सुना विदेशी वस्तु का गाँधी-नेहरु के द्वारा पूर्ण मनोयोग से उपयोग जीवनपर्यंत। ये विदेशी वास्तु कोई और नहीं कांग्रेस है जिसे "एओ ह्युम" ने बनाई जो खुद एक अंग्रेज था। वैसे नेहरु को तो और भी विदेशी वस्तुओं से कुछ खास प्यार था जैसे की एडविना और जहाँ तक सुना जाता है इनके कपडे पेरिस से आते थे और धुलने को भी पेरिस ही जाते थे परन्तु ये देशी वस्तुओं के परिचायक थे।

हाँ इन्होने देशी वस्तुओं के प्यार में एक कार्य किया की विदेशी वास्तु कांग्रेस को भारत पर थोपने के बाद देशी संगठन "आरएसएस" को देश के लिए खतरा घोषित कर दिया परन्तु जब भी देश पर कोई संकट आया जैसे की भारत-पाक युद्ध या भारत-चीन युद्ध तब इसी "आरएसएस" के धुर विरोधी नेहरु "आरएसएस" के गणवेश में पथसंचलन तथा अधिवेशन में भाग लेते हुए पाए गए। ये एक मौकापरस्ती और चाटुकारिता नहीं थी तो और क्या थी। क्यूंकि आप पीठ पिछे तो इसी संगठन को देश के लिए खतरा बता रहे हैं और देश पर खतरा आने पर इसी संगठन के आँचल में अपना सर छुपाने तथा देश की सम्प्रभुता तथा आतंरिक सुरक्षा की व्यवस्था सौंप आये। आपका मकसद क्या था इसमें पहले तो इस देशभक्त और देशी संगठन को बदनाम कर दो फिर इसको अपने स्वार्थ में उपयोग भी करते रहो क्यूंकि ये "आरएसएस" के लोग तो सीधे और सच्चे इन्सान थे जो देशहित की ही सोचते थे।

फिर आई बारी जाँत-पात की जिसे नेहरु जी आपने अपने झूठे जनेउ जो आप केवल चुनाव के वक्त धारण करते थे ताकि जनेउ दिखा कर आप वोट पा सकें खुद को पंडित दिखा कर। फिर इस जाँत-पात को बढ़ाने के बाद बारी आई झूठी धर्मनिरपेक्षता की जिसे इंदिरा ने बुखारी और जनता दल से हारने के बाद अल्पसंख्यक जिनको जम कर कटवाया इनकी पार्टी ने उनको अपने साथ मिला उनका दोहन करने के नाम पर लागु करवा दिया ताकि  इनके कुकर्म अबाध गति से चलतें रहे।

इसी बिच गरीबी हटाने के नाम पर गरीबों का दोहन कर उच्चस्थ पदासीन लोगों को खरीदने हेतु आरक्षण नाम का भूत छोड़ दिया गया लोगों के पीछे। इसी धर्मनिरपेक्षता और आरक्षण के नाम पर मुल्लायम और दिग्विजय जैसे लोगों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष और आरक्षण प्रणेता बताने के चक्कर में इनको इस पद तक पहुँचाने वाले हिन्दुओं को ही बिसरा दिया लेकिन बेचारे हिन्दू आज तक इस बात को समझ नहीं आये और उलझे हुए हैं दलित, पंडित, राजपूत इत्यादि जातियों में और ये लोग मलाई काटे जा रहे हैं हम हिन्दुओं के छातियों पर चढ़ कर।

हाँ इन छद्म धर्मनिर्पेक्षियों का सबसे बड़ा कार्य ये था की "आरएसएस" नाम के संगठन को गाली देते रहो और उनको गलत ठहराते रहो ताकि लोग इनसे नफरत करने लगें और इनके संगठन में जुड़ने से बचते रहें ताकि इनकी दुकान निर्बाध रूप से चलती रहे। इसी बिच आई इनकी मददगार महिला जो पता नहीं क्या थी शादी से पहले और शादी से पहले प्यार के किस्से तो बहुत ही सुनने को मिलते रहते हैं साथ ही बहुत से आरोपियों को अपने घर में 7 सालों तक छुपाये रखना ऐसी महिला सोनिया गाँधी जी इंडिया में पधारीं। इन महिला के आते ही भारत को इंडिया बनाने और धर्मपरिवर्तन कराने का कार्य तथा दलाली और कालाबाजारी का धंधा बड़े ही जोर-शोर से चालू हो गया।

इन सबके बिच खुलेआम लव जिहाद के नाम पर हिन्दू लड़कियों को बरगलाया जाने लगा लेकिन प्रशासन चुप था और है साथ ही हिन्दू भी चुप है क्यूंकि हिन्दू की लड़कियां बरगला कर मुसलमान बनाई जाने लगी थीं। मजारों, फकीरों और चर्चों को कुछ ज्यादा ही प्रचलित किया जाने लगा देश में और हिन्दुओं में ऐसी भावना जगाई जाने लगी की इन जगहों पर उन्हें शांति मिल सकती है उनके धर्मिकस्थल तो बिना काम के हैं लेकिन इतने पर भी हिन्दू चुप रहा।

हिन्दुओं के साधू-संत भी आपसी फूट तथा लालच में अपने मठ तथा मंदिरों में ही पदासीन रहे उससे बाहर निकल अपने हिन्दू भाइयों की सुध लेने का शायद विचार तक अपने मन-मंदिर में नहीं आने दिया। क्यूंकि शायद उनको चढ़ावे और अपने मठ से लगाव रहा। लेकिन इस फूट का फायदा हुआ किसे चर्च और मदरसों को अपनी अनियंत्रित गतिविधियों में लगे रहे तथा पुरे हिन्द देश में चुन-चुन कर मारते रहे और साधू-संत अपने मठों में बैठ धूनी रमाते रहे लेकिन मठ के बाहर कदम नहीं निकाले ताकि उनके पद कोई और न बैठ जाए।

आज हमने इस देश को चार टुकडों में बाँट लिया है। हर शहर में इक चिड़ियाघर बनाया जिसमे हिन्दुओं को कुछ सैम्पल जानवरों के साथ रखे हैं हिन्दुओं को ही कंकण-पत्थर मारने के लिए। ये चिड़ियाघर में बंद हिन्दू ही उनकी औरतों को सताने के लिए दूर-दूर से इन जानवरों के मनोरंजन के खेलों में भाग लेने के लिए जबरदस्ती पकड़ लायी गई हिन्दू महिलाओं और लड़कियों के चीत्कारों को सुन ताली बजाते रहे और आज भी बदस्तूर बजा रहे हैं शायद उन हिन्दू औरतों की चीत्कारों से उन जानवरों से ज्यादा इन छद्म हिन्दू पाखंडियों को मजा आता है।

जिन जानवरों ने भारत को हिन्दुस्तान तथा फिर कब्रिस्तान बनाया वो तो हमारे बिच नहीं रहे परन्तु शायद उनके हरम में कैद हमारी हिन्दू बहनों के कोख से पैदा हुए इन्सान तो नहीं बन पाए अलबत्ता उसी जानवर योनि को ह्रदय से लगा हरम के व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए छद्म हिन्दू पाखंडियों को अपने हरम में सबसे पहले मिला लिया और फिर से अपना जानवर-राज कायम करने के राह पर चल निकले। अब भाई हिन्दू कोख से पैदा हो जानवरों से मिलोगे तो ऐसा ही होगा वो तुम्हरे घरों में घुस तुम्हारी बहु-बेटियों की दावत उड़ायेंगे और अपनी बहु-बेटियों के चीत्कारों को कमरे के बाहर बैठ सुन कर तुम ताली बजाना लेकिन ये सिलसिला टूटे और एक नया सवेरा इस पावन धरा को चूमे ऐसा कोई कर्म न करना।

रुद्राक्ष को पहनना सांप्रदायिक दिख गया लेकिन गंदे जगह के बाल की ताबीज और क्रोस पहनना शांति का प्रतिक बन बैठा। साड़ियों को पहनना बहन जी टाईप हो गया और बदन उघाडू परिधान आधुनिकता का द्योतक बन गया। शादी उपरांत पति या पत्नी के साथ घूमना मज़बूरी और शादी से पहले माँ-बाप को धोखा दे अपनी प्रेयसी या प्रेमी के संग अठखेलियाँ करना सभ्यता बन गया। महाराणा प्रताप, लक्ष्मीबाई और सुभाष चन्द्र बोस आतंकी बन गए परन्तु हिन्दुओं को ही काट कर उनके सर से मीनार बनाने वाले अकबर, औरंगजेब इत्यादि फ़क़ीर और रहनुमा बन गए और तो और जब फ़िल्मी हस्तियाँ हमारे पुस्तकों में स्थान पाने लगीं तो हमें ऐसा ही दूषित परिवेश मिलना तथ्यपरक लगता है।

ऐसे अंधों से एक निवेदन करना चाहूँगा मैं की अपने घर की महिलाओं और बेटियों का चेहरा देख समय रहते मुख्यधारा अपने मूल के तरफ लौट आओ कहीं देर न हो जाए और तुम केवल ताली बजाते रह जाओ।




3 Nov 2012

बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिसनरियां


कई वर्ष पहले दूर दक्षिण भारत से बाबा माधवदास नामक एक संन्यासी दिल्ली में ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ प्रकाशन के कार्यालय पहुँचे। उन्होंने सीताराम गोयल की कोई पुस्तक पढ़ी थी, जिसके बाद उन्हें खोजते-खोजते वह आए थे। मिलते ही उन्होंने सीताराम जी के सामने एक छोटी सी पुस्तिका रख दी। यह सरकार द्वारा 1956 में बनी सात सदस्यीय जस्टिस नियोगी समिति की रिपोर्ट का एक सार-संक्षेप था। यह संक्षेप माधवदास ने स्वयं तैयार किया, किसी तरह माँग-मूँग कर उसे छपाया और तब से देश भर में विभिन्न महत्वपूर्ण, निर्णयकर्ता लोगों तक उसे पहुँचाने, और उन्हें जगाने का अथक प्रयास कर रहे थे। किंतु अब वह मानो हार चुके थे और सीताराम जी तक इस आस में पहुँचे थे कि वह इस कार्य को बढ़ाने का कोई उपाय करेंगे।

माधवदास ने देश के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ स्वयं ध्यान से देखी थीं। उन्हें यह देख बड़ी वेदना होती थी कि मिशनरी लोग हिन्दू धर्म को लांछित कर, भोले-भोले लोगों को छल से जाल में फँसा कर, दबाव देकर, भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर आदि विधियों से ईसाइयत में धर्मांतरित करते थे। सबसे बड़ा दुःख यह था कि हिन्दू समाज के अग्रगण्य लोग, नेता, प्रशासक, लेखक इसे देख कर भी अनदेखा करते थे। यह भी माधवदास ने स्वयं अनुभव किया। वर्षों यह सब देख-सुन कर अब वे सीताराम जी के पास पहुँचे थे। सीताराम जी ने उन्हें निराश नहीं किया। उन्होंने न केवल जस्टिस नियोगी समिति रिपोर्ट को पुनः प्रकाशित किया, वरन ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की ऐतिहासिक क्रम में समीक्षा करते हुए ‘छद्म-पंथनिरपेक्षता, ईसाई मिशन और हिन्दू प्रतिरोध’ नामक एक मूल्यवान पुस्तिका भी लिखी। पर ऐसा लगता है कि हिन्दू उच्च वर्ग की की काहिली और अज्ञान पर शायद ही कुछ असर पड़ा हो।

उदाहरण के लिए, सात वर्ष पहले जब ‘तहलका’ ने साप्ताहिक पत्रिका आरंभ की तो अपना प्रवेशांक (7 फरवरी 2004) भारत में ईसाई विस्तार के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र पर केंद्रित किया। इस के लिए अमेरिकी सरकार तथा अनेक विदेशी चर्च संगठनों द्वारा भारी अनुदान, अनेक मिशनरी संगठनों के प्रतिनिधियों से बात-चीत, उनके दस्तावेज, मिशनरियों द्वारा भारत के चप्पे-चप्पे का सर्वेक्षण और स्थानीय विशेषताओं का उपयोग कर लोगों का धर्मांतरण कराने के कार्यक्रम आदि संबंधी भरपूर खोज-बीन और प्रमाण ‘तहलका’ ने जुटा कर प्रस्तुत किया था। किंतु उस पर भारतीय नेताओं, बुद्धिजीवियों, प्रशासकों की क्या प्रतिक्रिया रही? कुछ नहीं, एक अभेद्य मौन! मानो उन्होंने कुछ न सुना हो। जबकि मिशनरी संगठनों में उस प्रकाशन से भारी चिंता और बेचैनी फैली (क्योंकि वे उस पत्रिका को संघ-परिवार का दुष्प्रचार बताकर नहीं बच सकते थे!)। उन्होंने तरह-तरह के बयान देकर अपना बचाव करने की कोशिश की। मगर हिन्दू समाज के प्रतिनिधि निर्विकार बने रहे! हमारे जिन बुद्धिजीवियों, अखबारों, समाचार-चैनलों ने उसी तहलका द्वारा कुछ ही पहले रक्षा मंत्रालय सौदों में रिश्वतखोरी की संभावना का पर्दाफाश करने पर खूब उत्साह दिखाया था, और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस समेत सबके इस्तीफे की माँग की थी। वही लोग उसी अखबार के इस पर्दाफाश पर एकदम गुम-सुम रहे। मानो इस में कोई विशेष बात ही न हो।

ठीक यही पचपन वर्ष पहले नियोगी समिति की रिपोर्ट आने पर भी हुआ था। जहाँ मिशनरी संगठनों में खलबली मच गई थी, वहीं हमारे नेता, बुद्धिजीवी, अफसर, न्यायविद सब ठस बने रहे। अंततः संसद में सरकार ने यह कह कर कि समिति की अनुशंसाएं संविधान में दिए मौलिक अधिकारों से मेल नहीं खाती, मामले को रफा-दफा कर दिया। कृपया ध्यान दें – किसी ने यह नहीं कहा कि समिति का आकलन, अन्वेषण, तथ्य और साक्ष्य त्रुटिपूर्ण है। बल्कि सबने एक मौन धारण कर उसे चुप-चाप धूल खाने छोड़ दिया। (उसके तैंतालीस वर्ष बाद, 1999 में, यही जस्टिस वधवा कमीशन रिपोर्ट के साथ भी हुआ, जिसने उड़ीसा में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या के संबंध में विस्तृत जाँच की थी)। हिन्दू सत्ताधारियों व बौद्धिक वर्ग की इस भीरू भंगिमा को देख कर सहमे हुए मिशनरी संगठनों का साहस तुरत स्वभाविक रूप से बढ़ गया। सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में उनकी गतिविधियाँ इतनी अशांतिकारक हो गईं कि उड़ीसा व मध्य प्रदेश की सरकारों को क्रमशः 1967 और 1968 में धूर्तता और प्रपंच द्वारा धर्मांतरण कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने पड़े। उस से माधवदास जैसे दुखियारों को कुछ प्रसन्नता मिली। मगर वह क्षणिक साबित हुई क्योंकि उन कानूनों को लागू कराने में किसी ने रुचि नहीं ली। जिन स्थानों में मिशनरी सक्रिय थे, वहाँ इन कानूनों को जानने और उपयोग करने वाले नगण्य थे। जबकि शहरी क्षेत्रों में जो हिन्दू यह सब समझने वाले और समर्थ थे, उन्होंने रुचि नहीं दिखाई कि इन कानूनों के प्रति लोगों को जगाकर चर्च के विस्तारवादी आक्रमण को रोकें।
एक अर्थ में आश्चर्य है कि ब्रिटिश भारत में मिशनरी विस्तारवाद के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध सशक्त था, जबकि स्वतंत्र भारत में यह मृतप्राय हो गया। 1947 से पहले के हमारे राष्ट्रीय विचार-विमर्श, साहित्य, भाषणों आदि में इस का नियमित उल्लेख मिलता है कि विदेशी मिशनरी भारतीय धर्म-संस्कृति को लांछित, नष्ट करने और भारत को विखंडित कर जहाँ-जहाँ संभव हो स्वतंत्र ईसाई राज्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। तब हमारे नेता, लेखक, पत्रकार अच्छी तरह जानते थे कि यूरोपीय साम्राज्यवाद और ईसाई विस्तारवाद दोनों मूलतः एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। इसलिए 1947 से पहले के राष्ट्रीय लेखन, वाचन में इस के प्रतिकार की चिंता, भाषा भी सर्वत्र मिलती है। किंतु स्वतंत्रता के बाद स्थिति विचित्र हो गई। स्वयं देश के संविधान में धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान देकर मिशनरी विस्तारवाद को सिद्धांततः वैधता दे दी गई!

जबकि स्वतंत्रता से पहले गाँधीजी जैसे उदार व्यक्ति ने भी स्पष्ट कहा था कि यदि उन्हें कानून बनाने का अधिकार मिल जाए तो वह “सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे जो अनावश्यक अशांति की जड़ है”। पर उन्हीं गाँधी के शिष्यों ने, यह सब जानते हुए भी कि कौन, किन तरीकों, उद्देश्यों से धर्मांतरण कराते हैं, मिशनरियों को उलटे ऐसी छूट दे दी जो उन्हें ब्रिटिश राज में भी उपलब्ध न थी। देशी-विदेशी मिशनरी संगठनों को यह देख आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई, जो उन्होंने छिपाई भी नहीं! उन्होंने भारत को अपने प्रमुख निशाने के रूप में चिन्हित कर लिया। परिणामस्वरूप अंततः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अलगाववाद की आँच सुलग उठी। इसके पीछे असंदिग्ध रूप से मिशनरी प्रेरणाएं थीं।

इसी पृष्ठभूमि में हम बाबा माधवदास जैसे देशभक्तों की वेदना समझ सकते हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता ने हिन्दू धर्म-संस्कृति व समाज की सुरक्षा निश्चित करने के बदले, उल्टे उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है। विदेशी, साम्राज्यवादी, सशक्त संगठनों को खुल कर खेलने से रोकने का कोई उपाय नहीं किया। उन का अवैध, धूर्ततापूर्ण खेल देख-सुन कर भी स्वतंत्र भारत के नेता, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी उस से मुँह चुराने लगे। नियोगी समिति ने जो प्रमाणिक आकलन किया था, उसका महत्व इस में भी है कि स्वतंत्र भारत के मात्र पाँच-सात वर्षों में मिशनरी धृष्टता कितनी बेलगाम हो चली थी। उस रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस की एक-एक बात और अनुशंसाएं आज भी उतनी ही समीचीन हैं। कम से कम हम उसे पढ़ भी लें तो बाबा माधवदास की आत्मा को संतोष होगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में ईसाई मिशनरी संगठनों को भय था कि अब उन का कारोबार बाधित होगा। आखिर स्वयं गाँधीजी जैसे सर्वोच्च नेता ने खुली घोषणा की थी कि कानून बनाने का अधिकार मिलने पर वह सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे। किंतु मिशनरियों की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि उन की दुकान बंद कराने के बदले, भारतीय संविधान में धर्मांतरण कराने समेत धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान मिल गया है! इसमें किसी संदेह को स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने दूर कर दिया था। नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने पत्र (17 अक्तूबर 1952) में स्पष्ट कर दिया, “वी परमिट, बाई अवर कंस्टीच्यूशन, नॉट ओनली फ्रीडम ऑफ कांशेंस एंड बिलीफ बट आलसो प्रोजेलाइटिज्म”। और यह प्रोजेलाइटिज्म मुख्यतः चर्च-मिशनरी करते हैं और किन हथकंडों से करते है, यह उस समय हमारा प्रत्येक नेता जानता था!

जब स्वतंत्र भारत का संविधान बन रहा था, तो संविधान सभा में इस पर हुई पूरी बहस चकित करने वाली है। कि कैसे हिंदू समाज खुली आँखों जीती मक्खी निगलता है। एक ही भूल बार-बार करता, दुहराता है, चोट खाता है, फिर भी कुछ नहीं सीखता! धर्मांतरण कराने समेत ‘धर्म-प्रचार’ को मौलिक अधिकार बनाने का घातक निर्णय मात्र एक-दो सदस्यों की जिद पर कर दिया गया। इसके बावजूद कि धर्म-प्रचार के नाम पर इस्लामी और ईसाई मिशनरियों द्वारा जुल्म, धोखा-धड़ी, रक्तपात और अशांति के इतिहास से हमारे संविधान निर्माता पूर्ण परिचित थे। इसीलिए संविदान सभा में पुरुषोत्तमदास टंडन, तजामुल हुसैन, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, हुसैन इमाम, जैसे सभी सदस्य ‘धर्म-प्रचार’ के अधिकार को मौलिक अधिकार में जोड़ना अनुचित मानते थे। फिर भी केवल “ईसाई मित्रों का ख्याल करते हुए” उसे स्वीकार कर बैठे! यह उस हिन्दू भोलेपन का ही पुनः अनन्य उदाहरण था जो ‘पर-धर्म’ को गंभीरता-पूर्वक न जानने-समझने के कारण इतिहास में असंख्य बार ऐसी भूलें करता रहा है।

इसीलिए स्वतंत्र भारत में मिशनरी कार्य-विस्तार की समीक्षा करते हुए जेसुइट मिशनरी फेलिक्स अलफ्रेड प्लैटर ने अपनी पुस्तक द कैथोलिक चर्च इन इंडियाः येस्टरडे एंड टुडे (1964) में भारी प्रसन्न्ता व्यक्त की। उन्होंने सटीक समझा कि भारतीय संविधान ने न केवल भारत में चर्च को अपना धंधा जारी रखने की छूट दी है, बल्कि “टु इनक्रीज एंड डेवलप हर एक्टिविटी ऐज नेवर बिफोर विदाउट सीरियस हिंडरेंस ऑर एंक्जाइटी”। यह निर्विघ्न, निश्चिंत, अपूर्व छूट पाने का ही परिणाम हुआ कि चार-पाँच वर्ष में ही कई क्षेत्रों में मिशनरी गतिविधियाँ अत्यंत उछृंखल हो गईं। तभी सरकार ने मिशनरी गतिविधियों का अध्ययन करने और उस से उत्पन्न समस्याओं पर उपाय सुझाने के लिए 1954 में जस्टिस बी. एस. नियोगी की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय समिति का गठन किया। इस में ईसाई सदस्य भी थे। समिति ने 1956 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसका संपूर्ण आकलन आँखें खोल देने वाला था। किंतु कोई कार्रवाई नहीं हुई। न किसी ने उस के तथ्यों, साक्ष्यों को चुनौती दी, न खंडन किया। केवल मौन के षड्यंत्र द्वारा उसे इतिहास के तहखाने में डाल दिया गया।

तब से आधी शती बीत गई, किंतु उस के आकलन और अनुशंसाएं आज भी सामयिक हैं। जो सामग्री नियोगी समिति ने इकट्ठा की उस से वह इस परिणाम पर पहुँची कि मिशनरी गतिविधियाँ किसी राज्य या देश की सीमाओं में स्वायत्त नहीं है। उनका चरित्र, संगठन और नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय है। जब समिति ने कार्य आरंभ किया तब पहले तो ईसाई मिशनों ने सहयोग की भंगिमा अपनाई। किंतु जब उन्होंने देखा कि समिति अपने काम में गंभीर है तब उन्होंने बहिष्कार किया। फिर नागपुर उच्च न्यायालय जाकर इस का कार्य बंद कराने का प्रयास किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि समिति का गठन और कार्य किसी नियम के विरुद्ध नहीं है।

अपनी जाँच-पड़ताल के सिलसिले में नियोगी समिति चौदह जिलों में, सतहत्तर स्थानों पर गई। वह ग्यारह हजार से अधिक लोगों से मिली, उस ने लगभग चार सौ लिखित बयान एकत्र किए, इसकी तैयार प्रश्नावली पर तीन सौ पचासी उत्तर आए जिस में पचपन ईसाइयों के थे और शेष गैर-ईसाइयों के। समिति ने सात सौ गाँवों से भिन्न-भिन्न लोगों का साक्षात्कार लिया। समिति ने पाया कि कहीं किसी ने ईसा की निंदा नहीं की, सभी जगह केवल अवैध तरीकों से धर्मांतरण कराने पर आपत्ति थी। यह आपत्तियाँ सुदूर क्षेत्रों में, जहाँ यातायात न होने के कारण शासन या प्रेस का ध्यान नहीं, वहाँ गरीब लोगों को नकद धन देने; स्कूल-अस्पताल की बेहतर सुविधाएं देने के लोभ; नौकरी देने; पैसे उधार देकर दबाव डालने; नवजात शिशुओं को आशीर्वाद देने के बहाने जबरन बप्तिस्मा करने; आपसी झगड़ों में किसी को मदद कर के बाद में दबाव डालने; छोटे बच्चों और स्त्रियों का अपहरण करने; तथा विदेशों से आने वाले धन के सहारे इन्हीं तरीकों से किसी क्षेत्र में पर्याप्त धर्मांतरण करा कर पाकिस्तान जैसा स्वतंत्र ईसाई राज्य बना लेने के प्रयासों, आदि संबंधी थीं।

समिति ने पाया कि लूथरन और कैथोलिक मिशनों द्वारा नीतिगत रूप से धर्मांतरित ईसाइयों में अलगाववादी भाव भरे जाते हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि धर्म बदल लेने के बाद उनकी राष्ट्रीयता भी वही नहीं रहती जो पहले थी। अतः अब उन्हें स्वतंत्र ईसाई राज्य का प्रयास करना चाहिए। मिशनरी दस्तावेजों, पुस्तकों, कार्यक्रमों आदि का अध्ययन कर समिति ने पाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत के प्रति मिशनरी नीतियाँ हैं – (1) राष्ट्रीय एकता का प्रतिरोध करना, (2) भारत और अमेरिका के बीच सहअस्तित्व के सिद्धांत से मतभेद, (3) भारतीय संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए मुस्लिम लीग जैसी ईसाई राजनीतिक पार्टी बनाकर अंततः एक स्वतंत्र राज्य बनाना अथवा कम से कम एक जुझारू अल्पसंख्यक समुदाय बनाना। भारतीय संविधान की उदारता देखकर यूरोप और अमेरिका में मिशनरी सूत्रधारों ने अपना ध्यान भारत पर केंद्रित किया, समिति ने इसके भी प्रमाण पाए।
किंतु समिति की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण अंश मध्य प्रदेश में मिशनरी गतिविधियों की स्थिति पर था। उस ने पाया कि जिन क्षेत्र में स्वतंत्रता से पहले स्वायत्त रजवाड़ो का शासन था और मिशनरियों पर अंकुश था, अब वहाँ उनकी गतिविधियाँ तीव्र हो गई हैं। इन नए खुले क्षेत्रों में पिछड़े आदिवासियों को धर्मांतरित कराने के लिए विदेशी धन उदारता से आ रहा है। ‘आज्ञाकारिता में भागीदारी’ नामक सिद्धांत के अंतर्गत चर्च को बताया जाता है कि वे जमीन से जुड़े रहें, किंतु अपनी निष्ठा और आज्ञाकारिता को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखें। समिति ने ईसाई स्त्रोतों से ही पाया कि वे मानते हैं कि उन के कार्य में सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति केवल धन है, हर जगह, हर समय, हर चीज धन पर ही निर्भर है। यहाँ तक कि जो भी व्यक्ति मिशनरियों से मिलने आता है केवल धन के लिए। भारतीय ईसाई विदेशी मिशनरियों का स्वागत भी केवल पैस के लिए करते हैं। कहीं किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक चर्चा या प्रेरणा का नामो-निशान नहीं था।

यह तथ्य एक लाक्षणिक उदाहरण भर था कि ‘नेशनल क्रिश्चियन काऊंसिल ऑफ इंडिया’ के खर्च का मात्र बीसवाँ अंश ही भारतीय स्त्रोतों से आता है, शेष बाहर से। कमो-बेश आज भी स्थिति वही है। यह कितनी विचित्र बात है कि जब जोर-जबर्दस्ती, छल-प्रपंच आदि द्वारा ईसाइयत विस्तार कार्यक्रमों पर चिंता होती है, तो ईसाइयत को भारत में दो हजार वर्ष पुराना, इसलिए, ‘भारतीय’ धर्म बताया जाता है। किंतु जब उसे राष्ट्रीय और आत्मनिर्भर होने के लिए कहा जाता है, तो उसे निर्बल होने के कारण विदेशी सहायता की आवश्यकता का तर्क दिया जाता है! जो भी हो, नियोगी समिति ने विदेशी स्त्रोतों से मिशनरी कार्यों के लिए आने वाले धन का भी हिसाब किया था और पाया कि ‘शिक्षा और चिकित्सा’ के लिए आए धन का बड़ा हिस्सा धर्मांतरण कराने पर खर्च किया जाता है।

जिन तरीकों से यह कार्य होता है वह आज भी तनिक भी नहीं बदले हैं। नियोगी समिति ने ठोस उदाहरण नोट किए थे। हरिजनों, आदिवासी छात्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें दी जानी वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ईसाई प्रार्थनाओं में शामिल होने की शर्त से जोड़ा जाता है। बाइबिल कक्षा में शामिल न होने को पूरे दिन की अनुपस्थिति के रूप में दंडित किया जाता है। स्कूल के उत्सवों का उपयोग ईसाई चिन्ह की अन्य धर्मों के चिन्हों पर विजय दिखाने के लिए किया जाता है। अस्पतालों में गरीब मरीजों को ईसाई बनने के लिए दबाव दिया जाता है। सबसे जोरदार फसल अनाथालयों में काटी जाती है जहाँ बाढ़, भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा में तबाह परिवारों के बच्चों को लाकर सबको ईसाई बना लिया जाता है। अधिकांश धर्मांतरण अनिच्छा से होते हैं, क्योंकि सबमें किसी न किसी लाभ-लोभ की प्रेरणा रहती है। समिति ने पाया कि किसी ने अपने नए धर्म का कोई अध्ययन या विचार जैसा कभी कुछ नहीं किया। धर्मांतरित लोग केवल साधारण आदिवासियों के झुंड थे जिनकी चुटिया कटवा कर बस उन्हें ईसाई के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।

रोमन कैथोलिक मिशनरी जरूरतमंदों को उधार देकर बाद में उसे वापस न करने के बदले ईसाई बनाने की विधि में सिद्धहस्त हैं। अन्य ईसाई मिशनरियों ने ही नियोगी समिति को यह बात बतायी। यदि कोई वापस करना चाहे तो उसे कड़ा ब्याज देना पड़ता है। कर्ज पाने की शर्त में भी कर्ज माँगने वाले को अपने हिन्दू चिन्ह छोड़ने, जैसे सिर की चोटी कटाने को कहा जाता है। कई लेनदार किशोर उम्र के और मजदूर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति कर्ज लेता है, तो मिशनरी रजिस्टर में उस के पूरे परिवार को संभावित धर्मांतरितों में नोट कर लिया जाता है। कर्ज लेते समय ही एक वर्ष का ब्याज उस में से काट लिया जाता है। समिति को अपने संपूर्ण आकलन, अन्वेषण के दौरान एक भी ऐसा धर्मांतरित ईसाई न मिला जिस ने धन के लोभ या दबाव के बिना ईसाई बनना स्वीकार किया हो!

कितने आश्चर्य है कि जो प्रगतिवादी लेखक संगठन और वामपंथी नाट्यकर्मी प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूँ’ पर हजारों नाटक मंचित कर चुके हैं, वे मिशनरियों की इस स्थायी, अवैध और घृणित महाजनी पर कभी कोई नाटक क्यों नहीं करते! मगर इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि भारतीय वामपंथियों को वैसा हर साम्राज्यवाद प्रिय है जिसका निशाना हिन्दू समाज हो।

मिशनरी साहित्य में हिन्दू देवी-देवताओं की छवियों और उन की पूजा पर अत्यंत भद्दे आक्षेप रहते हैं। स्कूलों में मंचित नाटकों में उनकी हँसी उड़ाई जाती है। उनका मखौल बनाने वाले गाने लिखे, गाए जाते हैं। हिन्दू ग्रंथों को विकृत करके प्रस्तुत किया जाता है। संविधान बनने के बाद से सरगुजा जिले में बने ईसाइयों की एक सूची सरकार ने समिति को दी थी। नियोगी समिति ने पाया कि वहाँ दो वर्ष में चार हजार उराँव ईसाई बने। उन में एक वर्ष से साठ वर्ष के पुरुष, स्त्री शामिल थे। समिति ने पाया कि उन में अपने नए धर्म का कहीं, कोई भाव लेश मात्र न था। प्रायः लोगों को झुंड में थोक भाव में धर्मांतरित करा लिया जाता है। किंतु रोमन कैथोलिक मिशनों ने समिति को अपने द्वारा धर्मांतरित कराए लोगों का विवरण नहीं दिया। क्योंकि उस से यह सच्चाई सामने आ जाती कि वह स्वेच्छा से नहीं, बल्कि संगठित, प्रायोजित हुआ था।

नियोगी समिति का प्रमाणिक निष्कर्ष था कि धर्मांतरण लोगों को राष्ट्रीय भावनाओं से विलग करता है (यही अपने समय में गाँधीजी ने भी कहा था)। धर्मांतरित ईसाइयों को सचेत रूप से इस दिशा में धकेला जाता है। उन से ‘राम-राम!’ या ‘जय हिन्द’ जैसे अभिवादन छुड़वा कर ‘जय यीशू’ कहना सिखाया जाता है। मिशनरी स्कूलों के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर ईसाई झंडा लगाया जाता है। ईसाई अखबारों में गोवा पर पुर्तगाल की औपनिवेशिक सत्ता बने रहने के पक्ष में लेख रहते थे, और इस बात की आलोचना की जाती थी कि भारत उसे अपना अंग बनाना चाहता है (तब गोवा पुर्तगाल के अधिकार में था)।

मिशनरी गतिविधियों की एक तकनीक समिति ने नोट की कि वह स्थानीय शासन और सरकार पर नियमित आरोप और शिकायतें करके एक दबाव बनाए रखते हैं, ताकि कोई उन की अवैध कारगुजारियों पर ध्यान देने का विचार ही न करे। यह एक जबरदस्त तकनीक है जो आज भी बेहतरीन रूप से कारगर है। समिति ने पाया कि मध्य प्रदेश शासन मिशनरी सक्रियता के क्षेत्रों में पूरी तरह तटस्थ रहा है, उस ने कभी कोई हस्तक्षेप किया हो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिला। किंतु मिशनरी संगठन सरकार पर प्रायः कोई न कोई भेद-भाव जैसी शिकायत करते रहने की आदत रखते हैं। समिति ने पाया था कि यह प्रशासनिक अधिकारियों को रक्षात्मक बनाए रखने की पुरानी मिशनरी तकनीक रही है। यही आज भी देखा जाता है, जब दिल्ली, गुजरात, झारखंड, उड़ीसा या मध्य-प्रदेश में मिशनरी संगठन अकारण या उलटी बयानबाजी करके सरकार को रक्षात्मक बने रहने के लिए विवश करते हैं। उलटा चोर कोतवाल को डाँटे जैसी सफल तकनीक।

नियोगी समिति ने अनेकानेक मिशनरी दस्तावेजों का अध्ययन करके पाया था कि भारत में मिशनरी धर्मांतरण गतिविधियाँ एक वैश्विक कार्यक्रम के अंग हैं जो पूरे विश्व पर पश्चिमी दबदबा पुनर्स्थापित करने की नीति से जुड़ी हुई हैं। उस में कोई आध्यात्मिकता का भाव नहीं, बल्कि गैर-ईसाई समाजों की एकता छिन्न-भिन्न करने की चाह है। जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। समिति की राय में ईसाई मिशन भारत के ईसाई समुदाय को अपने देश से विमुख करने का प्रयास कर रहे हैं। यानी, धर्मांतरण कार्यक्रम कोई धार्मिक दर्शन नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य के अंग हैं। भारत के चर्च स्वतंत्र नहीं, बल्कि उन के प्रति उत्तरदायी हैं जो उनके रख-रखाव का खर्च वहन करते हैं। समिति के अनुसार धर्मांतरण दूसरे तरीके से राजनीति के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

यह संयोग नहीं है कि नियोगी समिति ने अवैध, राष्ट्र-विरोधी, समाज-विरोधी मिशनरी गतिविधियों को रोकने के लिए जो अनुशंसाएं दी थीं, उन का आज भी उतना ही मूल्य है। वे अनुशंसाएं यह थीं – (1) जिन विदेशी मिशनों का प्राथमिक कार्य मात्र धर्मांतरण कराना है, उन्हें देश से चले जाने के लिए कह देना चाहिए, (2) चिकित्सा और अन्य सेवाओं के माध्यम से धर्मांतरण बंद करने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए, (3) किसी की विवशता, बुद्धिहीनता, अक्षमता, असहायता आदि का लाभ उठाते हुए धोखे या दबाव से धर्मांतरण को पूर्णतः प्रतिबंधित करना चाहिए, (4) विदेशियों द्वारा तथा छल-प्रपंच से धर्मांतरण रोकने के लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन होना चाहिए, (5) अवैध तरीकों से धर्मांतरण बंद करने के लिए नए कानून बनने चाहिए, (6) अस्पतालों में नियुक्त डॉक्टरों, नर्सों और अन्य अधिकारियों के रजिस्ट्रेशन में ऐसे संशोधन करने चाहिए जिस से उनके द्वारा किसी मरीज के ईलाज और सेवा के कार्यों के दौरान उस का धर्मांतरण न होने की शर्त हो, (7) बिना राज्य सरकार की अनुमति के धार्मिक प्रचार वाले साहित्य के वितरण पर प्रतिबंध हो।

जब नियोगी समिति की यह रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो मिशनरी संगठनों ने इसे तानाशाही की ओर बढ़ने का उपाय बताकर निंदा की। किंतु किसी ने इस रिपोर्ट के तथ्यों, आकलनों को मिथ्या कहने का साहस नहीं किया। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे नेताओं, प्रशासकों, बुद्धिजीवियों ने समिति की किसी अनुशंसा को लागू करने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि रोग, उस के फैलने के तरीके, उस से होने वाली हानि और देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा भी यथावत है। इस अर्थ में नियोगी समिति की ऐतिहासिक रिपोर्ट आज पचपन वर्ष बाद भी सामयिक और पठनीय है।

बाबा माधवदास संभवतः अब नहीं हैं, किंतु उनकी वेदना का कारण यथावत है। न रोग दूर हुआ, न उस के निदान की कोई चिंता है। कंधमाल (उड़ीसा) की घटनाएं इस का नवीनतम प्रमाण हैं। नियोगी समिति ने उस के सटीक उपचार के लिए जो सुचिंतित, विवेकपूर्ण अनुशंसाएं दी थीं। वह आज भी उतनी ही आवश्यक हैं जितनी तब थीं। परंतु उस के प्रति हिन्दू उच्च वर्ग की उदासीनता भी लगभग वैसी ही है। इन में वैसे हिन्दू भी हैं जो सभी बातें जानते हैं, किंतु अपने सुख-चैन में खलल डाल कोई कार्य नहीं करना चाहते। कोई दूसरा कर दे तो उन्हें अच्छा ही लगता है। पर उसके लिए एक शब्द कहने तक का कष्ट वह उठाना नहीं चाहते।

इस भीरू प्रवृत्ति को महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने ‘म्यूनिख भावना’ की संज्ञा दी थी। इस मुहावरे की उत्पत्ति 1938 में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के बीच हुए म्यूनिख समझौते के बाद हुई। उस समझौते में महत्वपूर्ण यूरोपीय देशों ने चेकोस्वोवाकिया को हिटलरी जर्मनी की दया पर छोड़ कर स्वयं को सुरक्षित समझ लिया था। अपने नोबेल पुरस्कार भाषण (1970) में सोल्झेनित्सिन ने कहा था, “The spirit of Munich is a sickness of the will of successful people, it is the daily condition of those who have given themselves up to the thirst after prosperity at any price, to material well-being as the chief goal of earthly existence. Such people – and there are many in today’s world – elect passivity and retreat, just so that their accustomed life might drag on a bit longer, just so as not to step over the threshold of hardship today – tomorrow, you’ll see, it will all be all right. (But it will never be alright! The price of cowardice will only be evil; we shall reap courage and victory only when we dare to make sacrifices.)” भारत के उच्च वर्गीय हिन्दुओं में यह भावना केवल ईसाई मिशनरियों के आध्यात्मिक आक्रमण के प्रति ही नहीं, बल्कि इस्लामी आतंकवाद, कश्मीरी मुस्लिम अलगाववाद और नक्सली विखंडनवाद जैसे उन सभी घातक परिघटनाओं के प्रति है जिनका निहितार्थ उन्हें मालूम है। किंतु इन से लड़ने के लिए वे कोई असुविधाजनक कदम उठाना तो दूर, दो सच्चे शब्द कहने से भी वे कतराते हैं।

साभार: शंकर शरण


2 Jul 2012

वर्णों की उत्पत्ति

ऐसा माना जाता है की ब्राम्हण की उत्पत्ति ब्रम्ह के मुख से और इसी प्रकार क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रम्ह के भुजा से, वैश्य की उत्पत्ति ब्रम्ह के जंघा से तथा शुद्र की उत्पत्ति ब्रम्ह के पैरों से हुई है।

पर इसका मतलब क्या है?

लोग इसके मतलब को समझे बिना इसको गलत मायने में लेकर जातिवाद को बढ़ावा देते आये हैं।

असल में ये अलंकृत शब्द हैं जिनका मतलब गूढ़ है...इश्वर के शारीरिक अंगो से चार वर्ण दिखाए गए हैं जातियां नहीं ... ज्यादा तो मैं नहीं लिख पाउँगा पर इस विषय पर, पर फिर भी मैं कोशिस करता हूँ।

उपरोक्त पंक्तियों का मतलब हुआ की:

ब्राम्हण वर्ण बना था शिक्षा और लोगो को सन्मार्ग पर चलाने के लिए और ऐसे में ब्राम्हण के वाणी पर बहुत कुछ निर्भर करता है अतः जो भी इस कार्य को कर रहा है वो ब्राम्हण हुआ ...अतः सन्मार्ग और पढाई के मार्ग पर चलाने  के लिए बने वर्ण को ब्राम्हण और उनके मुख-प्रभाव को देखते हुए उनकी उत्पत्ति ब्रम्ह के मुख से होना कहा गया|

क्षत्रिय वर्ण है सहस और लोगो की रक्षा हेतु...अतः इसमें बाहू बल का प्रयोग है...इस वजह से इस वर्ण की उतपत्ति ब्रम्ह के भुजा से दिखाते हैं|

वैश्य वर्ण का कार्य था हिसाब-किताब या सही मायने में कहे तो व्यापारिक गतिविधियों हेतु अतः इसमें प्राचीनतम पद्धति में जैसे गल्ले पर बैठना दिखाया गया उसी से इस वर्ण की उतपत्ति ब्रम्ह के जंघा से दिखाई गई|

शुद्र वर्ण और सबसे विशेष वर्ण...इस वर्ण का कार्य भी बहुत बड़ा था...साफ़-सफाई से ले कर लोगों की सेवा-सुश्रुषा तक करना ताकि वो अपने निर्धारित कार्य को आसानी से कर सकें...इसमें पैरों का उपयोग ज्यादा सोच इस वर्ण की उतपत्ति को ब्रम्ह के पैरों से दिखाया गया|

कर्म आधारित इन वर्णों की उत्पत्ति उनके कर्मो के अनुसार अलंकरण किया गया| इसे कौन सा अलंकर कहते हैं इस बारे में नहीं पता मुझे पर शायद अतिशयोक्ति अलंकर कहते हैं इसे (सही अलंकर बताने की कोई कृपा करे)। अतः मैं इसे केवल अलंकृत बोल कर ही चल रहा हूँ|

इसमें कही से ये जातियां नहीं थी वरन ये सभी वर्ण थे जिनका निर्धारण केवल उनके कर्म के आधार पर किया गया था। जो जिस कर्म को करेगा उसका वर्ण वही हुआ। पर कुछ विशेष परिश्थितियों ने इसे एक सोची-समझी गन्दी मानसिकता के चाल के तहत इसे जातिगत बना दिया और दंश हम सभी झेल रहे हैं।

जातियों का उल्लेख केवल मुगलिया सल्तनत के आने के बाद ही दीखता है। उसके पहले तक केवल वर्ण व्यवस्था ही चल रही थी। पर भारत पर राज करने के लिए बाँटना जरुरी था अतः इस घृणित जातिगत व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ जो आज एक विकराल रूप धारण कर चुकी है और भारत को निगलने को बेकरार बैठी है।

आज जरुरत है की हम पुनः वर्ण व्यवस्था को बनायें और जातिगत ताने बाने को जड़ से उखड फेंके। मानता हूँ की ये मुस्किल है परन्तु नामुमकिन नहीं। हम अपने से इसे शुरू कर सकते हैं फिर धीरे-धीरे समाज में।