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2 Jan 2025

पति पीड़ा

 पतियों की पीड़ा


हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज है। इस समाज मे ऐसा तानाबाना बुना गया है जिसमे पत्नी ही पीड़ित होती है। ऐसे अनगिनत दर्दनाक घटनाएँ भी रही हैं।


लेकिन भौतिकतावाद के प्रताड़ना की भेंट आज पति हो रहा है। अभी हाल में ही दो पतियों ने अपनी ईहलीला समाप्त की।


पत्नियां झूठे केसों में पतियों को फंसा रही हैं। भारत का कई देशों से चुराया हुआ कानून भी पत्नियों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।


जरूरी नहीं कि शारीरिक रूप से ही प्रताड़ना हो बल्कि उससे कहीं घातक होती है मानसिक प्रताड़ना। सालों साल की मानसिक प्रताड़ना में पति अपने होशो हवास खो कर सिर्फ मौत को गले लगाना ही आसान समझ रहा है। क्योंकि कार्यस्थल की परेशानियां और वहां से घर आने पर घर के अंदर मानसिक परेशानियां कहीं न कहीं पतियों को अंदर से खोखला कर दे रही हैं।


पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास के साथ साथ आपसी समझ का ज्यादा होता है। अगर आपसी समझ खत्म तो सब खत्म।


पति खत्म, पत्नी.........

30 Sept 2014

एक कटी पतंग (Ek Kati Patang)




मेरा जीवन एक कटी पतंग,
बल्खाता हूँ, मचल जाता हूँ, 
बिन डोर के यूंही चला जाता हूँ,
कभी इस ओर तो कभी उस ओर,
कभी इस डगर तो कभी उस डगर,
बिन मंजिल के मैं बस उड़ा जाता हूँ,
कोई डोर होती जो थाम लेती मुझको,
कंधे पर यूं हाथ रख रोक लेती मुझको,
बवंडर मे नीले अंबर मे हिचकोले खाता हूँ,
हिचकोले खाते मंद-मंद मुस्काता हूँ,
शीतल मंद पवन मे नीचे गिर जाता हूँ,
कभी बिजली के खंभे मे अड़ता हूँ,
कभी नंगे तारों पर झूल सा जाता हूँ,
सूखे दरख्तों मे भी लिपट मैं जाता हूँ,
कभी चिथड़े मे बदल जाता हूँ,
तो कभी कचरे मे मिल भी मैं जाता हूँ,
क्या करूँ क्या ना करूँ सोच घबरा जाता हूँ,
चाहता हूँ थाम लूँ खुद को, रुक जाऊँ,
ठहर जाऊँ, थम जाऊँ, सो जाऊँ, रम जाऊँ,
लेकिन जिंदगी इतनी बेरहम हो गई है,
इसको ही सोच सिहर जाता हूँ, ठिठक जाता हूँ,
सोच के इक बात को यूंही अकड़ जाता हूँ,
अकेला नहीं हूँ मैं इस अंबर की ओट मे
जो होगा देख लूँगा, सह लूँगा, जी लूँगा,
गमों को मय मे मिला कर पी लूँगा,
वीरान इस जिंदगी को अपने तरीके से जी लूँगा॥

29 Sept 2014

रेत पर कभी कोई तकदीर लिखी नहीं जाती (Ret Par Kabhi Koi Takdir Likhi Nahi Jati)




दिल की बात को दिल मे दबाए बैठा हूँ,
होंठ बेजान से पर आँखों से भी कुछ कह नहीं पाता हूँ॥
 
मन की बात को लबों पर दबाए बैठा हूँ,
दिल मे उठती हूक को आँखों मे छुपा नहीं पाता हूँ॥

आज बन गया मेरा दिल भी इक पत्थर,
अब तो जुगनुओं की चमक भी झेल नहीं पाता हूँ॥

भँवर मे कर रहा कोशिश तैरने की,
भूल गया था लहरों से लड़ाई जीत नहीं पाता हूँ॥

दुखी हो गया मेरा मन भी अब तो गालिब,
खुद की चुप्पी ही अब तो मुझसे सही नहीं जाती है॥

मन मे जाने कितने बवंडर दबाए बैठा हूँ,
पर इन आँखों की नमी मुझसे झेली नहीं जाती है॥

कभी मेरी अश्को ने बनाया था समंदर भी,
पर भूल गया की रेत पर कभी कोई तकदीर लिखी नहीं जाती है॥

मेरे जीने की दुआ कौन करे (Mere Jine Ki Dua Kaun Kare)


उदास इस रात मे वीरान दिल की सजी है महफ़ील,
ना कोई हमसफर है, ना है ठिकाना किसी मजिल का॥

ये नामुराद अलसाई जिंदगी कहाँ ले कर आई मुझे,
जिंदगी तो कर गई बेवफाई, शायद मौत दे वफा मुझे॥

अब ना तो कोई तरंग है ना ही है कोई उमंग,
जिंदगी तो बनी मेरी बस एक कटी पतंग॥

खुशी की चाह मे उठाता रहा मैं रंज बड़े,
बदनसीबी मिलती रही, जहां पड़े कदम मेरे॥

दुखते मेरे जख्मों की दवा कौन करे,
सबको अपनी पड़ी है, मेरी परवाह कौन करे॥

इस हाल मे मेरे जीने की दुआ कौन करे,
मुझ मरीज की दवा करे तो कौन करे॥

धुंधली पड़ी आज हर तस्वीर


धुंधली पड़ी आज हर तस्वीर है,
हर तस्वीर की अपनी तकदीर है,
तकदीर को क्या कोसें हम,
आँखों के आँसू कैसे पोछे हम॥

आँसू का स्वाद चखा हमने,
डबडबाई आँखों का राज समझा हमने,
रखा जिनको आँखों मे हमने,
बह गए आज वो आँसू मे मिलकर॥

दिल का हर राज दिया
दर्द का मैंने साज लिया
गीत-गजल सब हैं बहाने
मिले दर्द के ही फसाने॥ 

लोगों ने पूछा क्यूँ सुर्ख हुईं आंखे तुम्हारी,
मैंने हँस के कहा रात को सो ना सका,
बहुत चाहा कह दूँ ये बात मगर कह ना सका,
दिल के दर्द को जुबां पर कभी ला ना सका॥

जख्मों का अपने हिसाब मैं करता किससे,
बाजार मे प्रचलित थे जाने कितने किस्से,
दर्द ही दर्द आते रहे क्यूँ मेरे ही हिस्से,
क्या जीऊँ या मर जाऊँ मैं फिर से!!
 
रोता रहा दिल पर आँखों मे हसरत थी,
आँखों के आँसू को देख सकता है हर कोई,
दिल के आंसुओं की कोई लकीर कहाँ,
दर्द मे मैं पड़ा रहा अब तक, किसी को मेरी परवाह कहाँ॥

19 Jun 2014

मैं दरख्त से टूटा एक सूखा पत्ता हूँ




मैं दरख्त से टूटा एक सूखा पत्ता हूँ
ना जिंदा हूँ ना मरता हूँ
आग से मैं दोस्ती करता हूँ
तिनके सा जल उठता हूँ
राख़ बन उड़ जाता हूँ

मैं एक तिरस्कृत झंझावात हूँ
सहता हरदम कुठारघाट हूँ
दुनिया को करता मदमस्त हूँ
मैं तो मैली चादर मे पैबस्त हूँ
अपनी ही हालत मे पस्त हूँ

मैं समंदर मे फेंका एक तिनका हूँ
लहरों पे डूबता उतराता हूँ
किनारे आने को जूझता हूँ
किनारे आ कर भी किनारे से दूर हूँ
समंदर की लहरों के आगे मजबूर हूँ

मैं अपने दुखों मे खुद पिसता हूँ
ढूँढता अंजान रिश्ता हूँ
दुनिया के आगे झूठ सही जीता हूँ
अपने गमों को खुद ही पीता हूँ
अंजान से राहों पर चलता हूँ

मैं तो बस एक नादान परिंदा हूँ
चुनता खुद का फंदा हूँ
आँखों से आधा अंधा हूँ
दिमाग से मैं गंजा हूँ
मैं तो बस मनहूस एक बंदा हूँ

वो मांगती है मुझसे खुशियाँ ज्यादा




वो मांगती है मुझसे खुशियाँ ज्यादा ,
उसको क्या पता मैं तो ,
तन्हाइयों का इकलौता वारिश हूँ ,
गमों की चोट मैं खाता हूँ ,
पतझड़ को खुद मे संभाले बैठा हूँ ,
आंसुओं के समंदर मे गोते लगता हूँ ,
हिचकियों मे सारी रात बिताता हूँ ,
मुरझाये फूलों का गुलदस्ता हूँ ,
मिट्टी का बेजान पुतला हूँ ,
रेत सा खुद से फिसल जाता हूँ ,
संभलता कम गिरता ज्यादा हूँ ,
आकांक्षाओं के बोझ तले दबा जाता हूँ ,
बेवफाई के धागे मे लिपटा हूँ ,
बिना मंजिल का बेजान मुसाफिर हूँ ,
दोस्तों के लिए हमेसा हाजिर हूँ ,
फिर भी उनके बीच बस एक मुहाजिर हूँ ,
अपनों के बीच भी अकेला पाया जाता हूँ ,
हर दर्द को सिने मे दबाये जीता हूँ ,
बस दिल ही दिल मे हरपल रोता हूँ ॥

18 Jun 2014

ऐ शाम तू तो ठहर जा




ऐ हवा कभी तो तू मेरी दहलीज से गुजर ,
बना कभी तो मुझको तू अपना रहगुज़र ,
लौटा दे मेरे वो महकते पल चुराये जो तूने ,
कुछ महक मैं भी तो सँजो लूँ अपनी ॥

ऐ बहार कभी मेरे घर का तू रुख तो कर ,
क्यूँ छोड़ दिया तूने मुझको यूं मुरझाने को ,
जर्रा-जर्रा हो जाने को, तड़प जाने को ,
टूट के यूं हरदम बिखर जाने को ॥

ऐ चाँद थोड़ी तो चाँदनी उधार दे मुझे ,
शायद तेरी चाँदनी ही सुधार दे मुझे ,
लोग कहते हैं बिगड़ा हूँ मैं बहुत ,
बेदर्द इस जमाने से झगड़ा हूँ बहुत ॥

ऐ चिराग थोड़ी तो रोशनी कर ,
अँधियारे मेरे इस टूटे घरौंदे मे ,
कई बार मैंने खुद को जलाया है ,
थोड़े से उजाले की तलाश मे ॥

ऐ शाम तू तो ठहर जा और थोड़ी देर ,
आ बैठ, मुझसे थोड़ी बात तो तू कर ,
देखती है तू रोज यूं अकेला मुझे ,
बस तू ही तो है, मेरी दोस्त कहलाने को ॥

10 Mar 2014

Wakt Gujar Jayega


ये वक्त गुजर जाएगा, फिर लौट के ना आएगा
लेकिन ये जो जाएगा, फिर बड़ा मजा आएगा
सुन ले ओ प्यारे
सुन ले ओ बंधु
ना तो घबराना कभी, ना तो इतराना कभी
वक्त जैसा है जो भी है बदल जाएगा,
बदल जाएगा, वक्त बदल जाएगा।
जितनी भी परेशानी है अभी तू सह ले
अभी तू सह ले, क्यूंकी

ये वक्त गुजर जाएगा, फिर लौट के ना आएगा
लेकिन ये जो जाएगा, फिर बड़ा मजा आएगा
दर्द भी देता है, दवाई भी मलता है,
रुलाता भी है और यही हँसाता भी है,
वक्त बेरहम है लेकिन है रहमदिल भी,
इस वक्त के आगे ना किसी की भी चलती।

ये वक्त गुजर जाएगा, फिर लौट के ना आएगा
लेकिन ये जो जाएगा, फिर बड़ा मजा आएगा
वक्त सब करता है, वक्त ही सब कराता है,
वक्त बेवक्त है, वक्त पे है ज़ोर किसका,
वक्त के पाबंद बनो, वक्त बेरहम है,
वक्त ने जो दिया है उसको तो संभाल लो,
ज्यादे को भागोगे थोड़ा भी न पाओगे

ये वक्त गुजर जाएगा, फिर लौट के ना आएगा
लेकिन ये जो जाएगा, फिर बड़ा मजा आएगा
वक्त की तुम सुनो, वक्त सुनेगा तुमको
वक्त के वास्ते चल पड़ो वक्त के ही रास्ते
वक्त वक्त वक्त है वक्त ही सशक्त है,
वक्त की करवटें देती हैं सिलवटें
अपनी ढाल तुम बना लो वक्त की चाल को

ये वक्त गुजर जाएगा, फिर लौट के ना आएगा
लेकिन ये जो जाएगा, फिर बड़ा मजा आएगा

Tired at work


रात-दिन खटते हैं, तारों को तकते हैं,
फिर हम बेचारे उफ तक नहीं करते हैं,
चुप रह कर सब कुछ हम सहते हैं,
घर आ करके भी हम ना तो रुकते हैं,
खाना बनाते हैं और फेसबुक करते हैं।

रात-दिन खटते हैं, तारों को तकते हैं,
सूरज की गर्मी मे दिन को जलते हैं,
चंदा की रोशनी मे भी हम झुलसते हैं,
मशीनों पे अपना सर रख सो जाते हैं,
सपने मे काम-काम ही बड़बड़ाते हैं।

रात-दिन खटते हैं, तारों को तकते हैं,
हम भी इन्सान हैं ना की हैवान हैं,
थकते हैं, तेल मालिश हम खुद करते हैं,
मालिश भी करते हैं पोलिश भी करते हैं
भगवान से हम गुजारिश भी करते हैं।

रात-दिन खटते हैं, तारों को तकते हैं,
फिर भी हमसे, देखो लोग यूं जलते हैं,
क्यूँ भगवान हम बेचारों को ठोकते हैं,
ऐसी भी क्या है जल्दी, ले आओ जरा हल्दी,
ले आओ जरा हल्दी, ले आओ जरा हल्दी।

20 Feb 2014

Narendra Modi ji ki kavita


सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।

मेरी धरती मुझसे पूछ रही कब मेरा कर्ज चुकाओगे।
मेरा अंबर पूछ रहा कब अपना फर्ज निभाओगे।।

मेरा वचन है भारत मां को तेरा शीश नहीं झुकने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे लूट रहे हैं सपनों को मैं चैन से कैसे सो जाऊं।
वे बेच रहे हैं भारत को खामोश मैं कैसे हो जाऊं।।

हां मैंने कसम उठाई है मैं देश नहीं बिकने नहीं दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वो जितने अंधेरे लाएंगे मैं उतने उजाले लाऊंगा।
वो जितनी रात बढ़ाएंगे मैं उतने सूरज उगाऊंगा।।

इस छल-फरेब की आंधी में मैं दीप नहीं बुझने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे चाहते हैं जागे न कोई बस रात का कारोबार चले।
वे नशा बांटते जाएं और देश यूं ही बीमार चले।।

पर जाग रहा है देश मेरा हर भारतवासी जीतेगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

मांओं बहनों की अस्मत पर गिद्ध नजर लगाए बैठे हैं।
मैं अपने देश की धरती पर अब दर्दी नहीं उगने दूंगा।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
अब घड़ी फैसले की आई हमने है कसम अब खाई।।

हमें फिर से दोहराना है और खुद को याद दिलाना है।
न भटकेंगे न अटकेंगे कुछ भी हो हम देश नहीं मिटने देंगे।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।


नरेंद्र मोदी जी की कविता

9 Oct 2013

Raahi

राही मैं तो अकेला ही चला,
राह मे साथी बनाता चला,
कुछ साथी पूरे राह चले,
कुछ बीच राह छोड़ चले,
कौन देगा दगा पता न चला,
दगा देना मैंने नहीं था सीखा,
इसलिए दगा खाता चला,
कुछ थीं जरूर कमियाँ मुझमे,
गिरा कई बार पर संभल न सका,
दुश्मन को दोस्त और,
दोस्त को दुश्मन बनाता चला।
राही मैं फिर अकेला ही चला,
होके तेरे दर से निराश चला,
पतझड़ मे तलाशने उम्मीद चला,
रेगिस्तान मे समंदर की खोज पर चला,
इक आस की डोर बांध कर चला,
अर्थी अपनी सजा कर चला,
सारे गम अपने भुला कर चला,
बची खुशियाँ समेट कर चल,
इक उम्मीद की डोर ले कर चला,
मैं 'विनीत' खुद का वजूद ढूँढने चला.........

9 Sept 2013

Mullayam Red Cap: Colored in Hindu Blood



कुर्ता इनका है हरा, चादर भी इनकी है हरी-हरी,
हरा है रंग बिछावन का, दीवाल भी इनकी है हरी,
लेकिन बंधु तुम ये जान लो, बात मेरी खरी-खरी,
नेता जी उठा चुके हैं, अपनी धोती और चादर हरी।

सोचते सब नेता जी को, शोभे रंग हरा शूरमेदानी है,
सोचे जो ऐसा, क्या कहें उसको, ये उसकी नादानी है,
नेता जी तो जीते हैं, बस खातिर अपने ही लाल के,
चहुओर पाले हैं गुंडे, जो मचाते खातिर इनके बवाल हैं।

बादामी है रंग इनके खद्दर का, टोपी पहनते हैं ये लाल,
टोपी लाल रंगने खातिर, मत पुछो किए कितने बवाल,
सेक्युलर के हरे खून से, रंगते हैं नेता जी अपना रुमाल,
हिन्दू के खून से, रंगवाते हैं अपनी खानदानी टोपी लाल।

टोपी-टोपी करते हैं ये, टोपी अपनी ये लाल रंगवाते हैं,
इस लाल रंग की खातिर, हमेसा हिन्दू का खून बहाते हैं,
कटवा कर हिन्दू को, ये उसका खून अपने पास मँगवाते हैं,
हिन्दू के खून से ये अपनी खानदानी टोपी लाल रंगवाते हैं।

टेढ़ी नाक, तोतली जुबान, दिल है इनका तो बेईमान,
ना है इनका कोई धर्म, ना कभी रखते हैं ये कोई ईमान,
हाड़-मांस का देखो, कलयुग मे आया है ये ऐसा शैतान,
मुल्लों से करता गलबहियाँ, हिन्दू की काटे ये जबान।

ना देखा इस जैसा, मैंने अब तक कोई ठरकी इन्सान,
बातें करता समाजवाद की, पर चलाता ये परिवारवाद,
लेकर लोहिया की कमान, बन बैठा ये तोतला पहलवान,
नाम से हिन्दू, लेकिन फैलाता है केवल ये मुल्लावाद।


24 Jul 2013

modi's storm will end fake gandhis




ना चलेगा काम अब तेरे कोरे इन वादों से, 
तुझको देखा हमने तेरे देशद्रोही आंखो से,
मुफ़लिसी मे जीते थे कल तुम सब, 
ऊँचे परकोटे बैठ मलाई काट रहे अब,
किया क्या तुमने ऐसा जादू-टोना,
पा गए जो इतना चाँदी और सोना,
तन पर न था वस्त्र एक भी तब,
दाभी भी बनाते वो विदेश मे अब,
जनता की इनको कोई फिकर नहीं,
गरीबों का इनके मुंह से कोई जिकर नहीं,
बेसहारा गरीबों का चूसते हैं खून ये,
उन्ही गरीबों के नाम पर लूटते हैं ये,
तन पर ये पहनें सिर्फ उजली खाकी,
मन काला है तेरा ऐ आज के गांधी,
आई है देश मे अब मोदी नाम की आँधी,
हो जाएगा खतम इसमे अब नकली गांधी,
अब तक देश ने तुम सबकी है मानी,
पर देशप्रेम की अब हम सबने है ठानी,
देख बंधु अपने दाँए-बाँए, आगे और पीछे,
गला किसी का अब न नकली गांधी मिंचे,
यज्ञ बड़ा आन पड़ा, देश मे नया अब जान पड़ा,
देशभक्ति की डोर छूटे ना, कोई साथी पीछे छूटे ना।

22 Jul 2013

Corrupt - Communal - Congress



खान-वार मे जुटी भारत की मीडिया, चाइना-हुंकार को भूल गई,

आईएम के प्रवक्ता बने कोंग्रेसी, मीडिया त्रिशूल से झूल गई॥

हरा रंग केवल शोभे सबको, केसरिया ना भावे कोई को अब,

कालिख पुती जो चेहरे पर देखो, सफेदी मे चूर हुए चोर सब।

धरती होती भगवा खून से लाल, बैठा है देखो ये जमाई काल,
चालाक ये सुस्त पड़े हैं, मदमस्त पड़े हैं, देखो ये कोंग्रेसी लाल।

सुघड़ है, चंचल है, चपल कुटिल सलोनी है इनकी काया,
ठग-चोर-लुटेरे ये, बलात्कारी आतंकी संग है इनकी माया।

अब इनपे इतना है दोष, फिर बताते हैं खुद को निर्दोष,
निर्दोषों को ठुँसते जेल, अजब-निराला है इनका खेल।

जनता जाये खड्डे मे, इनकी निगाह तो धन के बस्ते मे,
है लूट खसोट की रेलम-पेल, हैं बड़े झमेले इस रस्ते मे।

कमर तोड़ है भारत की महंगाई, फिर भी देखो इनकी बेहयाई,
अस्त-व्यस्त पड़ी अर्थव्यवस्था, फिर भी की लूटने की व्यवस्था।

देखो जरा इस देश की अवस्था, आजादी के समय से शून्य बाबस्ता,
राज किया गांधी ने साल साठ, गर पुछो कुछ तो मार जाता है काठ।

21 Jul 2013

Rahul Gandhi's Pol Khol against Modi

पप्पू के मोदी के खिलाफ पोल खोल पर प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ....कृपया हंसना मना है

=========

पप्पू चला खोलने पोल,
फट गया देखो उसका ढ़ोल,
पप्पू मे ही निकला झोल,
पप्पू लगा करने तोलमोल,
पप्पू का डॉगी भौंका,
सोनी ने लगाया छौंका,
पप्पू का ढ़ोल किसने फाड़ा,
पप्पू को किसने लताड़ा,
दौड़ा-दौड़ा देखो पप्पू दौड़ा,
ना जाने है किसका छौंडा॥

पप्पू चला खोलने पोल,
फट गया देखो उसका ढ़ोल,
मच गया हल्ला चारो ओर,
पप्पू की मम्मी निकली चोर,
चोर की दाढ़ी मे झाड़ू,
मम्मी निकली बड़ी जुगाडु,
झट बदला अपना पाला,
पर सामने ही था नाला,
मम्मी गई नाले मे गिर,
फटा उसका काला सिर॥

पप्पू चला खोलने पोल,
फट गया देखो उसका ढ़ोल,
मम्मी ने पप्पू को ठोंका,
डॉगी नाले मे जाके लोटा,
सोनी भी हुआ खफा,
तिवारी निकला बेवफा,
सिंघवी बोला अबकी दफा,
याद ना हमको कोई वफा,
पप्पू दूम दबा के भागा,
इटली मे भी पड़ गया डाका॥

14 Jul 2013

Portrayal of Secularism of Congress


नेल्ली मे कराह रहे मुसलमान
दिल्ली मे दम तोड़े सिख पहलवान
भागलपुर का भाग्य है फूटा
मोरादाबाद हुआ अब ठूँठा
रांची की क्या कहें हम 
मुंबई मे देखा आपका दम
जल रहा महाराष्ट्र है
उबाल रहा उत्तर प्रदेश है
मध्य प्रदेश को ये खा गए
उड़ीसा को बिलकुल पचा गए
अंडमान की खबर नहीं
असम मे बची कोई जगह नहीं
मिजोरम झेले संत्रास
अरुणाञ्चल हो गया बकवास
पंजाब को भी जला गए
कश्मीर को देख ललचा गए
राजस्थान मे स्थान नहीं
हरयाणा बिन बवाल नहीं
झारखण्ड को किया खंड-खंड
बंगाल भी हुआ भंग
केरल की फिकर किसे है
आंध्रा मे पेट्रोल फेंके है
1983 और 84 की तुम बात ना करना 
2002 केवल याद हमे है करना 
बातें करते वो केवल हित की
दी बली मुसलमानों की अपने जीत की
बाते हैं उनकी केवल सतरंगी
हैं ना ये किसी के साथी-संगी 
खूंटा अब इनका तुम उखाड़ दो
इस चुनाव मे इनको अब पछाड़ दो


16 Jun 2013

My village, my pride


गाँव के त बा रंग बहुतेरा
जे ना छोड़े कभी भी संग
चाहे वो पुवाल हो, हो चाहे वो अमवा के बौर
इमली की खटास हो चाहे तोतवा की मिठास
खेतवन के सैर चल, चाहे खेल बगिया मे गिल्ली-डंडा
ताल तलैया हो चाहे हो पोखर-पाकड़
उ ताऊ के मूंछ त देख बावे केतना धाकड़
मूंछ बा ताऊ के धाकड़ लेकिन जब रिसियाए ताई
कर देवे है ऊ सबकी एक तरफ से पिटाई
करत है ताई पिटाई लेकिन गोलु खा जावे है मिठाई
गेंहू की मड़ाई हो चाहे हो धान की पिटाई
गन्ने के खेत मे घुस हो गन्ना चुसाई
गन्ना पेराइ समय राब ना छोड़ल जाई
जाड़ा मे दद्दू कउड़ा रहे जलाई
गर्मी सब चले हैं बइठे बगईचा
बरसात जब आई तो सोंधी महक से कोई खुद को ना रोक पाई
लेकिन अब एही गाँव मे इका होखत बा ए भाई
दद्दू गुड्गुडावे हुक्का आ उ देखो पतुरिया लगावे ढूका
सास से जलन है, जेठानी ना सुहाए, देवरानी से झगड़े है
केकरा से अब ई दुखड़ा कहल जाय
एकता कपूर के भूत गंउवों मे पहुंचा ए भाई

लेकिन हम हमार गंउवा कैसे भूल जाईं

11 May 2013

Just Think For Once

वो आए मेरे आशियाने में
गूंजी शहनाइयाँ घराने में
बजी घण्टियाँ मेरे दिल में
वो आ गए मेरे दहलीज में
बांध पायल नाजुक पैरों में
रचा मेहँदी अपने हाथों में
सिंदूर की साज रही मांग में
बिंदिया भी चमक रही माथे में
खनक रहीं चुड़ियाँ कलाई में
चमकती होंठलाली होंठों में
काजल भी सजाया आँखों में
हया भरी है नीची नजरों में
अंगूठे कुरेदते मिट्टी जमीन में
वो आ भी गए अब तो मेरे पहलू में
तभी टूटा सपना मच्छर भिनभिनाने में
पड़े थे हम अपनी उसी टूटी चारपाई में
हँसते थे दोस्त मेरे भी इस जमाने में
बावला है ये भेजो इसको पागलखाने में
कहा मैंने अपने उन हसोड़ दोस्तों में
रखा है क्या इस रंगीन जमाने में
सोचते हो तुम गलत बैठ इस मयखाने में
देखा मैंने शहादत अपने हसीन इस सपने में
क्यूँ रहते हो सिर्फ लड़कियों को आजमाने में
थोड़ा तो सोचो देश को इस बेदर्द जमाने में



2 May 2013

Some Moments Hurts

रात से मेरी आँखों मे नमी सी है,
लगता जीवन मे कुछ कमी सी है,
घर मे उकड़ू बैठे हम उदास से हैं,
दर्द क्या है, इससे अंजान से हैं,
हो गए चहरदीवारी मे बंद से हैं,
दिमाग ठंडा पड़ा जमा बर्फ सा है,
ना कोई खुशी ना ही उमंग सी है,
जिंदा हैं क्यूँ परे ये समझ से है।

रात से मेरी आँखों मे नमी सी है,
लगता जीवन मे कुछ कमी सी है,
गले मे आवाज भी ये बंधी सी है,
सिने मे भी मेरे तो कुछ दर्द सा है,
मन भी मेरा बावला विचलित सा है,
ढूँढता आज केवल ये अपनों सा है,
दिखती नहीं आने की आस सी है,
फिर भी मेरी आँखों मे तलाश सी है।

रात से मेरी आँखों मे नमी सी है,
लगता जीवन मे कुछ कमी सी है,
चारो ओर लगता झंझावात सा है,
आँखों से आंसुओं का बरसात सा है,
सामने औरों के पत्थर रख हँसते से हैं,
अंदर ही अंदर उस पत्थर से दबते से हैं,
होंठ भी पपड़ी पड़ सीले हुए से हैं,
दर्द ही दर्द मुझे आज मिले से हैं।

रात से मेरी आँखों मे नमी सी है,
लगता जीवन मे कुछ कमी सी है,
भरी भीड़ मे भी आज तन्हा से हैं,
तन्हाइ के सागर मे डूबते से हैं,
हर घड़ी हम केवल बेचैन से हैं,
क्या करें थोड़ा कम पढे-लिखे से हैं,
अब तो हम बंधुवा मजदूर से हैं,
क्या कहें अब "विनीत" मौन सा है।