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17 Sept 2013

Mujaffarnagar riot and vote bank politics


उत्तराखंड त्राशदी के समय भी बीजेपी के नेताओं को तब तक नहीं जाने दिया गया जब तक की पप्पू नहीं पहुँच गया वहाँ अपनी नौटंकी दिखाने, कश्मीर दंगे के समय भी ऐसा ही देखने को मिला की बीजेपी के नेताओं को नहीं जाने दिया गया वहाँ जब तक की कोंग्रेसी नहीं पहुँच गए।

अब प्रदेश मे कॉंग्रेस से घोर दुश्मनी दिखाने वाले लेकिन केंद्र मे कोंग्रेसी टुकड़े पर पलने वाले मुल्ला-यम ने दिखाया अपना दोहरा चरित्र।

मुजफ्फर जाने वाले हर बीजेपी नेता को गिरफ्तार किया लेकिन मन्नू, पप्पू और उसकी इटालियन अम्मी को जाने की ना सिर्फ इजाजत दी बल्कि कई सारी और सहूलियतें भी।

अब यही मुल्लायम प्रदेश के बीजेपी नेताओं को वहाँ आने नहीं दे रहा है लेकिन जिसका उत्तर प्रदेश तक से कोई नाता नहीं है और खुद एक आतंकवादी है पर कॉंग्रेस के चलते बचा हुआ है बकरुद्दीन मवेशी को आने के लिए पलक-पावड़े बिछाये बैठी है ये सपा सरकार।

लेकिन इन सबके बीच एक ही बात कॉमन है की सभी के सभी ये तथाकथित धर्मनिरपेक्षी अवैध असलहा रखने वाले एवं दंगे भड़काने वाले शांतिप्रिय कौम के दहलीज पर ही अपना मत्था टेक वोट की भीख मांग वापस चले आ रहे हैं। करें भी क्यूँ ना ये दोहरे चरित्र वाले....आखिर इनको असलियत पता है की मुस्लिम कहीं भी वोट देगा एक मुश्त वोट देगा। लेकिन हिन्दू तो बिखरे हुए हैं। उनके भाई-बहन मार दिये जाएँ, बहनों की इज्जत उनकी आँखों के सामने लूट ली जाए तब भी दोगले बन उन्ही को वोट देंगे जिंहोने ऐसा जघन्य कार्य किया। ये हिन्दू उन्ही को वोट देंगे जो घूम-फिर का कॉंग्रेस के पाले मे गिरे।

जाट खुद को बहुत आगे मानते हैं और मुस्लिम विरोधी कहते हैं लेकिन वोट किसको देंगे रालोद को जो की अजित सिंह की पार्टी है और अजित सिंह खुद कॉंग्रेस के फेंके बोटी पर पलने वाला नरपिशाच है। वैसे भी इस दंगे मे मुजफ्फर नगर खुद अजित सिंह नहीं गया लेकिन अपने लड़के को भेजा। अब जाटों ने भी देखा ही होगा की अजित सिंह का लड़का जाटों के द्वार पर थूकने भी नहीं गया और केवल अपने वोट बैंक अवैध असलाहाधारी मुस्लिमों से मिल कर लौट आया।

साथ ही जब ये सभी अपनी वोट बैंक की राजनीति कर लौट आए मुस्लिमों के चौखट पर मत्था टेक कर, तब सेक्स सीडी के महानजनक अभिसेक्स मनु भिंगवी को अपने यहाँ बुला कर बुरखा धत्त अब ये प्रचार करने मे लग गई है की नेताओं को दंगाग्रस्त स्थलों से दूर रहना चाहिए ताकि जब बीजेपी के नेता या कोई हिन्दूवादी वहाँ जाए तो उसको सांप्रदायिक या दंगा भड़काऊ कह कर उसका दुष्प्रचार चालू कर सके ये कॉंग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाली गंदी महिला जो पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को दलाली का अड्डा बना रखी है। ऐसी ये अकेली नहीं है बल्कि आज हालत ये है की इस पत्रकारिता के पेशे मे एक दलाल ढूंढो तो हजार मिलते हैं। पूरा पत्रकार जगत ही जैसे दलालों का अड्डा नजर आने लगा है। किसी विशेष पार्टी या उक्त विशेष पार्टी को लाभ पहुँचने हेतु विशेष कौम को अच्छा एवं दूसरे कौम को हर छोटी बात मे भी गंदे तरीके से घसीटना ये इस पत्रकार जगत का पेशा हो गया है।

अब समय आ गया है की हिन्दू चाहे वो किसी भी जाति का हो, अपने वोट की अहमियत को समझे और ये देखने की कोशिस करे की उसका वोट अंत मे किस पार्टी के काम मे आ रहा है। वो अमुक पार्टी उस हिन्दू या देश के किसी भी हिन्दू के साथ कितनी खड़ी है। हिंदुओं के हित की कितनी रक्षा करती है एवं मानमर्दन करती है हिंदुओं के हितों का। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो दिन दूर नहीं जब भारत भी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की श्रेणी मे आ कर अपने अतीत को कोस रहा होगा एवं हमारी आने वाली पुश्तें हमें फूल माला नहीं चढ़ा रही होंगी बल्कि  गालियों से नवाज रही होंगी।


16 Aug 2013

Why I hate Muslims


कई लोग पूछते हैं की मैं मुसलमानों से इतनी नफरत क्यूँ करता हूँ? मैं खुल कर जवाब नहीं देता था। लोग आ कर मुझे समझते थे की ये हमारे देश के ही हैं, इनसे इतनी नफरत नहीं करनी चाहिए। हमे मिलजुल कर रहना चाहिए इत्यादि। वैसे मैंने उनको हमेसा एक जवाब दिया कि मुझे मुसलमानों से नफरत नहीं है बल्कि मुझे मुल्लों से नफरत है। मुसलमान वो होता है जो ईमान का पक्का होता है। और मुल्ला जो अपने बाप का भी नहीं होता है।

मेरे मुल्लों के प्रति नफरत की शुरुवात उन दिनों से हुई जब मैं कुछ समझने लायक हुआ। शुरू से मैं अपने दादा-दादी के काफी करीब रहा, उनका लाड़ला हूँ। लेकिन दादा जी अपने लाड़-प्यार मे भी थोड़े व्यावहारिक थे। उन्होने बताई इन मुल्लों कारस्तानी।

बात उन दिनों कि है जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था। और मेरे दादा जी कि उम्र उस समय शायद 20+ थी। बँटवारे से पहले दादा जी कि बड़ी बहन कि शादी ढाका, बांग्लादेश मे उस समय के एक बड़े जमींदार से हुई थी। जिनका वहाँ अपना बिजनेस था एवं वो खुद स्वतन्त्रता सेनानी थे। अब बँटवारे के समय के समय सभी उनको भारत बुला रहे थे क्यूंकी बँटवारे से पहले ही मुल्ले खून-खराबे पर उतर आए थे। लेकिन दादा जी के बहनोई ने कहा कि ढाका उनकी कर्मस्थली ही नहीं वरन जन्मस्थाली भी है। अतः वो ढाका किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे और ना ही मुसलमान बनेंगे। 

दादा जी के बहनोई के यहाँ कई मुल्ले कार्य करते थे और दादा जी के बहनोई के वजह से ही उन मुल्लों के घर का चूल्हा जलता था। जब मुल्लों के अत्याचार से वहाँ कि हिन्दू जनता इनको जवाब देने पर आई तब ये सभी भाग कर दादा जी के बहनोई कि कोठी मे पहुंचे। दादा जी के बहनोई का उस समय रसूख बहुत ही अच्छा था। अतः उनके मिन्नत करने पर उन मुल्लों को छोड़ हिंदुओं कि गुस्साये भीड़ ने बख्स दिया और वहाँ से चले गए। लेकिन मुल्ले मारे डर के वहीं रहे करीब 3-4 दिन तक। बुआ और उनकी देवरानियाँ सभी के लिए खाना बनाती थीं उन 4 दिनों मे। लेकिन जब हिन्दू वहाँ से पलायित हो गए और भारत आ गए तब मुल्लों कि भीड़ आगे बढ़नी चालू हुई और बचे हुए अल्प हिंदुओं को काटना चालू किया।

इसी क्रम मे जब उन्मादी मुल्लों कि भीड़ दादा जी के बहनोई के घर के सामने आई तो उनके लठैतों एवं हिन्दू कामगारों ने हवेली का गेट बंद कर दिया। तभी जो मुल्ले दादा जी के बहनोई के यहाँ शरण लिए हुए थे उन्होने हवेली का गेट खोल दिया और उन्मादी भीड़ हवेली के अंदर घुस आई। इतने मे दादा जी के बहनोई ने अपने एक विस्वसपात्र सेवक से कह घर कि औरतों को घर से बाहर सुरक्षित भेज दिया ताकि आबरू बची रहे। घर के अंदर दादा जी के बहनोई कि माँ और मर्द बचे रहे। घर के लोगों और अपने अन्नदाता मेरे दादा जी के बहनोई पर घातक प्रहार करने वाला और कोई नहीं बल्कि शरण लिया हुआ मुल्ला ही था। घर के सभी व्यक्तियों को काट डाला गया। घर को घर मे घायल पड़े लोगों के साथ आग के हवाले कर दिया गया। पूरे घर मे या परिवार मे कोई भी व्यक्ति जिंदा नहीं बचा था।

इसी बीच दादा जी जो उस समय कलकत्ता मे रहते थे अपनी बहन को लाने ढाका के लिए निकल चुके थे वो भी पैदल। दादा जी नालों एवं सभी कठिनाइयों को पार करते हुए ढाका पहुंचे। मुल्लों से बचा कर अपनी बहन को लाने के लिए दादा जी ने अपनी दाढ़ी मुल्लों के मानिंद रख ली थी।

इसी बीच ढाका मे दादा जी कि बहन ही किसी तरह जिंदा बच पाईं जो एक हिन्दू घर मे आश्रय लिए हुए थी अपने पति के इंतजार और बाकी उनकी देवरानियाँ सेवक के साथ निकल गईं लेकिन ना तो सेवक का कुछ पता चला और ना ही देवरानियों का। दादा जी कैसे भी ढूंढते हुए उस घर मे पहुंचे जो दादा जी के बहनोई के घर से करीब 1 किलोमीटर कि दूरी पर हिन्दू बाहुल इलाके मे था।


दादा जी वहाँ से अपनी बहन को लेकर भारत कि तरफ चल पड़े बिना अपनी बहन को उनके पति एवं सभी घरवालों कि मौत के बारे मे बताए हुए। रास्ते मे हिन्दू की भीड़ देखते ही मुल्ले हमला कर देते थे। लड़कियों एवं औरतों को उठा ले जाते थे एवं मर्दों को काट डालते थे। दादा जी एवं उनकी बहन नालों के अंदर, पुलों के नीचे या लाशों के बीच लेट कर किसी तरह बचते-बचाते कलकत्ता पहुंचे। वहाँ से दादा जी के दोस्त या सही मायनों मे बड़े भाई समान श्री विजय सिंह नाहर जी ने दोनों लोगों को हमारे गाँव भेजने कि व्यवस्था कि। दादा जी की बहन जीवन पर्यंत हमारे साथ ही हमारे गाँव पर रहीं। 

दादा जी बताते हैं कि कपड़े पूरी तरह खून से सन गए थे। रात मे सोने पर आँख बंद नहीं होती थी एवं लाशों का मंजर आँखों के सामने नाचता था। कैसे वहशी मुल्ले लोगों को काट-काट कर फेंकते थे। बलात्कार करना एवं उसके घर सहित जला देना ये उन मुल्लों के लिए आम बात थी।

अब ऐसे मे आप बताएं क्या मेरी इन मुल्लों के प्रति नफरत गलत है। ये जो अपने बाप के नहीं होते हैं, ये जो अपने अन्नदाता के नहीं होते हैं....क्या कभी ये मुल्ले इस देश या हमारे-आपके होंगे। 


11 Dec 2012

Kosikalan Riots: Ignorance and Partiality is new Weapon of UP Governemnt

कृष्ण नगरी में मुस्लिम दंगे का दंश झेलते हिन्दू !


दंगे का दिन :- 1 जून, 2012 दिन शुक्रवार, तिथि निर्जला एकादशी समय 2 बजे अपराह्न 


स्थान :- कोसी कलां जिला मथुरा (उत्तर प्रदेश)




नगर कोसीकलां में विगत दिनों में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगा काण्ड की अग्नि अभी तक ज्वाला उगल रही है ! अब वो दंगा पूरी तरह से साम्प्रदायिक रूप ले चुका है ! प्रदेश की समाजवादी सरकार की मुस्लिम-प्रेम वाली राजनीति पूरी तरह से हिन्दुओं के दमन के लिए अपने चरम सीमा पर पहुँच चुकी है ! उस दंगे में हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर जान-माल का नुक्सान हुआ था ! हिन्दुओं की कुल संपत्ति के हानि का यदि आकलन किया जाए तो दंगा वाले दिन तीन घंटे चले आतंकी मुस्लिम उत्पात में हिन्दुओं का 10 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ था! उनको मानसिक और शारीरिक हानि हुई सो अलग ! 

वर्तमान समय में सपा शासन और जिला प्रशासन हिन्दुओं को ही उस दंगे का आरोपी बनाकर निशाना बना रहे हैं ! सपा के मुख्य मुस्लिम नेता आज़म खां ने पूरे दंगे की न्यायिक जांच न कराके राजनैतिक जांच कराने के लिए आदेश दिया था! क्योंकि वो जानता था कि मुस्लिम ही पूरे दंगे के लिए दोषी हैं ! उस राजनैतिक जांच में आज़म खाँ ने मुस्लिमों के खिलाफ अधिकांशतः सबूत मिटा दिए और अंततः ये निष्कर्ष निकाला की उस दंगे में 1500 अज्ञात दंगाइयों और लगभग 500 प्रत्यक्ष दंगाई दोषी हैं ! जिनमे सबसे अधिक संख्या हिन्दुओं की है ! नगर के हिन्दुओं में बनिया जाति के सभी व्यवसायियों को अज्ञात दंगाइयों में दिखाया गया है ! हिन्दुओं का पूरा का पूरा बाजार उस दंगे में लिप्त बताया गया है ! और लगभग 55 हिन्दुओं पर 302 और 307 की धारा लगाई गई हैं ! अनेक हिन्दुओं को उनके घरों से उठवाकर जेल भेज दिया गया है ! हिन्दू जनता को शांत रखने के लिए कुछ मुस्लिमों को भी दंगाइयों के रूप में दिखाया गया है ! जिनमे से दो-तीन पुलिस हिरासत में हैं ! 

वास्तव में, ये मुस्लिम समुदाय की राजनैतिक चाल है जिसके द्वारा वो हिन्दुओं को व्यापारिक रूप से तोड़ देना चाहते हैं ! पुलिस हिन्दुओं के लिए धरपकड़ अभियान चलाए हुए है !

इन हिन्दू दंगाइयों में जो अभियुक बनाये गये हैं उनमे से कुछ ऐसे हैं:-

1. जो दो-तीन साल पहले कोसी कलां से अपना सभी कुछ बेचकर दूसरे शहर जीवन यापन करने चले गये हैं, वो दंगाई दिखाए गये हैं !

2. जो व्यवसायी लोग अपंग हैं वो भी दंगाई दिखाए गये हैं !

3. एक मुस्लिम जिसकी मृत्यु 3 वर्ष पूर्व हो चुकी है वो भी दंगे में शामिल दिखाया गया है !

4. प्रतिवर्ष छपने वाले रामलीला के कैलेण्डर में विज्ञापनदाता और पूरी रामलीला कमेटी भी दंगाई दिखाई गयी है !

5. जो बनिया व्यवसायी जिनको अपने व्यापार-धंधे-पेशे से ही मतलब है, जो केवल घर से दुकान और दुकान से घर ही आते-जाते हैं, वो भी दंगाई दिखाए गये हैं !

6. आसपास के ग्रामों के अनेक हिन्दू प्रधानों और जमींदारों को भी दंगा करने वाला दिखाया गया है !

7. जो व्यक्ति दंगा के समय नगर के बाहर थे, वो भी दंगाई दिखाए गये हैं !

8. नगर के अनेक प्रतिष्ठित हिन्दू व्यवसायियों को दंगे के मुख्य आरोपी बनाकर पूरे प्रकरण को राजनैतिक रूप दे दिया गया है !

9. नगर में ऐसा भी हो रहा है की मुसलमान के कुछ दबंग राजनैतिक लोग हिन्दुओं व्यवसायियों को डरा-धमकाकर उनसे मनचाही धनराशि बसूल कर रहे हैं ! हिन्दुओं के द्वारा ऐसा न करने पर वो मुस्लिम प्रशासन पर राजनैतिक दबाव डालकर उन हिन्दुओं को दंगाई दिखा रहे हैं ! 

कुल मिलकर मुस्लिम वर्ग की और प्रदेश सरकार समाजवादी पार्टी की यह एक सोची-समझी राजनैतिक चाल है जिसके आधार पर हिन्दुओं की एकता वाली रीड़ की हड्डी तोड़कर उनको अपाहिज बना दिया जाए और मुस्लिम समुदाय अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल हो जाए !


नगर के हिन्दुओं में रोष व्याप्त है और वो अब आर या पार की जंग के मूड में आ गये हैं ! लेकिन शासन और प्रशासन हिन्दुओं पर डंडा किये हुए है ! जो हिन्दू प्रशासन के इस एकपक्षीय कार्यप्रणाली के विरुद्ध आवाज़ उठा रहा है वो अज्ञात दंगाई में दिखाकर जेल में ठूसा जा रहा है ! हिन्दुओं को मोहरा बनाकर उन पर हो रहे इस प्रशासनिक अत्याचार के विरोध में 12 दिसंबर 2012 को कोसी नगर बंद का एलान किया गया है ! जिनमे अनेक हिन्दू व्यवसायी जिनको दंगे के झूठे आरोप में अभियुक्त बनाया गया है वो अपनी गिरफ्तारी देंगे !

पूर्वार्ध में हुए कोसीकलां दंगे की जानकारी हेतु आप निम्न लिंक को देख सकते हैं जिनपर सिलसिलेवार घटनाक्रम दिया हुआ है।


http://ekaambhartiya.blogspot.in/2012/06/blog-post_16.html (कोसीकलां दंगा कैसे हुआ शुरू)
http://ekaambhartiya.blogspot.in/2012/06/blog-post_18.html (पूरा दंगा घटनाक्रम)
http://ekaambhartiya.blogspot.in/2012/06/blog-post_19.html (ताजा जानकारी दंगे की)
http://ekaambhartiya.blogspot.in/2012/06/blog-post_6300.html (दंगे की कहानी बयान करते चित्र)



!! नमो भारतं !!




14 Nov 2012

Golden Temple, Indira Gandhi, Operation Blue-Star and Jarnail Singh Bhinderwale



पंजाब के स्वर्ण मंदिर की तबाही और उसके पहले का सच जो हमसे छुपाया गया 

अमृतसर, 25 साल पहले हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के जख्म अब दिखने के लिए भरने लगे हैं और पंजाब अपने इतिहास को पीछे छोड़ प्रगति की राह पर आगे निकल चुका है। लेकिन 5 जून 1984 की उस रात की टीस अब भी महसूस की जा सकती है जब देश में पहली बार आस्था के सबसे बड़े मंदिर को आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए सेना हथियारबंद होकर पहुंची और इतिहास ने हमेशा हमेशा के लिए करवट बदल ली। मंदिर तो आतंकियों से आजाद हो गया लेकिन साथ ही गहरे जख्म भी दे गया।

क्या था उस रात और उस रात के पहले का असली सच?

5 जून 1984, समय शाम 7 बजे

ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हो चुका था। सेना का मिशन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों के चंगुल से छुड़ाना था। मंदिर परिसर के बाहर दोनों ओर से रुक-रुक कर गोलियां चल रही थीं। सेना को जानकारी थी कि स्वर्ण मंदिर के पास की 17 बिल्डिंगों में आतंकवादियों का कब्जा है। इसलिए सबसे पहले सेना ने स्वर्ण मंदिर के पास होटल टैंपल व्यूह और ब्रह्म बूटा अखाड़ा में धावा बोला जहां छिपे आतंकवादियों ने बिना ज्यादा विरोध किए समर्पण कर दिया।

रात साढ़े दस बजे

शुरुआती सफलता के बाद सेना ऑपरेशन ब्लू स्टार के अंतिम चरण के लिए तैयार थी। कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल के एस बरार ने अपने कमांडोज़ को उत्तरी दिशा से मंदिर के भीतर घुसने के आदेश दिए। लेकिन यहां जो कुछ हुआ उसका अंदाजा बरार को नहीं था। चारों तरफ से कमांडोज़ पर फायरिंग शुरू हो गई। मिनटों में 20 से ज्यादा जवान शहीद हो गए। जवानों पर अत्याधुनिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड से हमला किया जा रहा था। अब तक साफ हो चुका था कि बरार को मिली इंटेलिजेंस सूचना गलत थी।

सेना की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। हरमिंदर साहिब की दूसरी ओर से भी गोलियों की बारिश हो रही थी। लेकिन बरार को साफ निर्देश थे कि हरमिंदर साहिब की तरफ गोली नहीं चलानी है। नतीजा ये हुआ कि सेना की मंदिर के भीतर घुसने की तमाम कोशिशें बेकार गईं और कैज्युल्टी बढ़ने लगीं।

देर रात 12.30 बजे

आधी रात तक सेना मंदिर के अंदर ग्राउंड फ्लोर भी साफ नहीं कर पाई थी। बराड़ ने अपने दो कमांडिंग अफसरों को आदेश दिया कि वो किसी भी तरह पहली मंजिल पर पहुंचने की कोशिश करें। सेना की कोशिश थी किसी भी सूरत में अकाल तख्त पर कब्जा जमाने की, जो हरमिंदर साहिब के ठीक सामने है। यही भिंडरावाले का ठिकाना था। लेकिन सेना की एक टुकड़ी को छोड़ कर कोई भी मंदिर के भीतर घुसने में कामयाब नहीं हो पाया था। अकाल तख्त पर कब्जा जमाने की कोशिश में सेना को एक बार फिर कई जवानों की जान से हाथ धोना पड़ा। सेना की स्ट्रैटजी बिखरने लगी थी।

रात 2 बजे

तमाम कोशिशों के बाद अब साफ होने लगा था कि आतंकवादियों की तैयारी जबर्दस्त है और वो किसी भी हालत में आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। सेना अपने कई जवान खो चुकी थी। इस बीच मेजर जनरल के एस बरार के एक कमांडिंग अफसर ने बरार से टैंक की मांग की। बरार ये समझ चुके थे कि इसके बिना कोई चारा भी नहीं है। सुबह होने से पहले ऑपरेशन खत्म करना था क्योंकि सुबह होने का मतलब था और जानें गंवाना।

सुबह 5 बजकर 10 मिनट

बरार को सरकार से टैंक इस्तेमाल करने की इजाज़त मिली। लेकिन टैंक इस्तेमाल करने का मतलब था मंदिर की सीढ़ियां तोड़ना। सिखों के सबसे पवित्र मंदिर की कई इमारतों को नुकसान पहुंचाना। 5 बजकर 21 मिनट पर सेना ने टैंक से पहला वार किया। आतंकवादियों ने अंदर से एंटी टैंक मोर्टार दागे। अब सेना ने कवर फायरिंग के साथ टैंकों से हमला शुरू किया। चारों तरफ लाशें बिछ गईं।

सुबह के 7.30 बजे

सूरज की रोशनी ने उजाला फैला दिया था। अब तक अकाल तख्त सेना के कब्जे से दूर था और सेना को जानमाल का नुकसान बढ़ता जा रहा था। इसी बीच अकाल तख्त में जोरदार धमाका हुआ। सेना को लगा कि ये धमाका जानबूझकर किया गया है, ताकि धुएं में छिपकर भिंडरावाले और उसका मिलिट्री मास्टरमाइंड शाहबेग सिंह भाग सकें। सिखों की आस्था का केंद्र अकाल तख्त को जबर्दस्त नुकसान हुआ।

सुबह 11 बजे

अचानक बड़ी संख्या में आतंकवादी अकाल तख्त से बाहर निकले और गेट की तरफ भागने लगे लेकिन सेना ने उन्हें मार गिराया। उसी वक्त करीब 200 लोगों ने सेना के सामने आत्मसमर्पण किया। लेकिन अब तक भिंडरावाले और उसके मुख्य सहयोगी शाहबेग सिंह के बारे में कुछ पता नहीं लग पा रहा था। भिंडरावाले के कुछ समर्थक सेना को अकाल तख्त के भीतर ले गए जहां 40 समर्थकों की लाश के बीच भिंडरावाले, उसके मुख्य सहयोगी मेजर जनरल शाहबेग सिंह और अमरीक सिंह की लाश पड़ी थी। अमरीक भिंडरावाले का करीबी और उसके गुरु का बेटा था।

6 तारीख की शाम तक स्वर्ण मंदिर के भीतर छिपे आतंकवादियों को मार गिराया गया था लेकिन इसके लिए सेना को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। सिखों की आस्था का केन्द्र अकाल तख्त नेस्तनाबूद हो चुका था। इस वक्त तक किसी को अंदाज़ा नहीं था कि ये घटना पंजाब के इतिहास को हमेशा के लिए बदलने वाली है।

स्वर्ण मंदिर के बाद मंदिर परिसर के बाहर की बिल्डिंगें खाली करवाने में सेना को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। सेना के मुताबिक मंदिर के बाहर के ऑपरेशन में अकाली नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल और गुरचरण सिंह तोहड़ा ने भी आत्मसमर्पण कर दिया।

 हालांकि अकाली नेता सेना के इस बयान को झूठा करार देते हैं। इस ऑपरेशन में कई आम लोगों की भी जान गई। खुद सेना ने बाद में माना कि 35 औरतें और 5 बच्चे इस ऑपरेशन में मारे गए। हालांकि गैर सरकारी आंकड़े इससे कहीं ज्यादा है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार में कुल 492 जानें गईं। इस ऑपरेशन में सेना के 4 अफसरों समेत 83 जवान शहीद हुए। वहीं जवानों सहित 334 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। पूर्व सेना अधिकारियों ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की जमकर आलोचना की। उनके मुताबिक ये ऑपरेशन गलत योजना का नमूना था।

क्या वाकई जरूरी था ऑपरेशन ब्लू स्टार ?

बंटवारे की आग ने पंजाब को तोड़ कर रख दिया। यही वो वक्त था जब पंजाब में कट्टरपंथी विचारधारा जन्म लेने लगी। सिखों के सबसे बड़े तीर्थ स्वर्ण मंदिर समेत सभी गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अधीन आ चुका था और एसजीपीसी की पॉलिटिकल विंग शिरोमणि अकाली दल सिख अस्मिता की राजनीति शुरू कर चुका था। आनंदपुर साहिब में अलग सिख राज्य समेत पंजाब के लिए कई मांगें रखी गईं जो अकाली राजनीति का आधार बन गईं।

इसी बीच अमृतसर से कुछ दूर चौक मेहता के दमदमी टकसाल में सात साल के एक लड़के ने सिख धर्म की पढ़ाई शुरू की। उसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले। कुछ ही सालों में भिंडरावाले की धर्म के प्रति कट्टर आस्था ने उसे टकसाल के गुरुओं का प्रिय बना दिया। जब टकसाल के गुरु की मौत हुई तो उन्होंने अपने बेटे की जगह भिंडरावाले को टकसाल का प्रमुख बना दिया। आज भी टकसाल में भिंडरावाले को शहीद का दर्जा दिया जाता है।

1966 में केन्द्र सरकार ने हिमाचल और हरियाणा को निकाल कर सिख बाहुल्य अलग पंजाब की मांग मान ली। लेकिन सिख राजनीति पर पकड़ बनाए रखने के लिए अकालियों ने चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने और पंजाब की नदियों पर हरियाणा और राजस्थान के अधिकार खत्म करने की मांग शुरू कर दी। कई जानकार मानते हैं कि ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी को जरूरत थी ऐसे नेता की जो अकालियों की राजनीति खत्म कर सके। अब ये एक खुला सच है कि कांग्रेस ने इसी काम के लिए भिंडरावाले को प्रमोट किया। जानकार मानते हैं कि भिंडरावाले की अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। भिंडरावाले ने निरंकारियों की खिलाफत के साथ कट्टरपंथी राजनीति की शुरुआत की।

1978 में अमृतसर में निरंकारियों के सम्मेलन के दौरान भिंडरावाले समर्थकों और निरंकारियों के बीच जानलेवा झगड़ा हुआ जिसमें भिंडरावाले के 13 समर्थक मारे गए। इस एक घटना ने भिंडरावाले को हिंसा का लाइसेंस दे दिया। भिंडरावाले पर तीन हाई प्रोफाइल हत्याओं के आरोप लगे लेकिन कांग्रेस के राज में ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए।

पंजाब अब राजनीतिक हत्याओं का अखाड़ा बन चुका था। सरेआम लोगों को बस से निकाल कर कत्ल कर दिए जाने की खबरें आने लगीं। ग्रामीण सिख भिंडरावाले से जुड़ने लगे। भिंडरावाले को भी अहसास होने लगा कि वो सिख हितों का अकेला रखवाला बन चुका है। देश-विदेश में भिंडरावाले की लोकप्रियता आसमान छूने लगी।

इस वक्त तक भी केन्द्र की इंदिरा गांधी सरकार ने भिंडरावाले को रोकने की कोशिश नहीं की। ना ही पंजाब में शांति के लिए अकालियों से समझौता किया। जबकि एसजीपीसी अध्यक्ष तोहड़ा और अकाली नेता लोंगोवाल का अब भी प्रभाव था और वो समझौते के लिए बार-बार दिल्ली आने को राजी थे।

साल 1982 में भिंडरावाले ने अचानक अपना हेडक्वार्टर स्वर्ण मंदिर के अंदर अकाल तख्त में बनाने की कवायद शुरू कर दी। उसे लगने लगा था कि अब सरकार उसपर एक्शन ले सकती है। लेकिन भिंडरावाले को भरोसा था कि सेना मंदिर के भीतर घुसने की हिम्मत नहीं करेगी। अकाल तख्त में अपना हेडक्वार्टर बनाने के लिए भिंडरावाले ने तोहड़ा को राजी कर लिया। मुख्यमंत्री बनने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल रहे तोहड़ा को भी आखिर भिंडरावाले की जरूरत थी।

सरकार को ये खबर मिल चुकी थी कि भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को किले में तब्दील करना शुरू कर दिया है और मंदिर के अंदर हथियारों का बड़ा ज़खीरा आ चुका है। अब ये तय हो गया था कि सिखों के सबसे पवित्र तीर्थ पर आर्मी एक्शन होगा। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार का स्वरूप इतना भयानक होगा। सेना के मुताबिक आखिरी वक्त तक भिंडरावाले को आत्मसमर्पण का मौका दिया गया लेकिन भिंडरावाले ने अपना रास्ता तय कर लिया था। वो अपने लोगों के बीच शहादत का दर्जा हासिल करना चाहता था।

तो अब सवाल उठता है की स्वर्ण-मंदिर की तबाही और हिन्दू-सिख दंगों के पीछे असल में किसका हाथ था?


साभार: IBN7 Website


26 Jul 2012

आसाम मतलब दूसरा कश्मीर



ऐसा कहा जा रहा है की आसाम में करीब ५०० गाँव जला दिए गए हैं और पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं|


५०० गाँव जले और केवल ३२ मौतें ये आंकड़ा कुछ गले से नहीं उतरता है जबकि सेना का कहना है की कई जगहों से उन लोगो ने १०-१५ लाशें एक साथ निकाली हैं| जहाँ प्रत्यक्षदर्शी २०० के आस-पास की मौतों की पुष्टि कर रहे हैं वही सरकार तो छोडिये सरकार की वक्ता मीडिया केवल ३२ मौतें दिखा अपने कार्य की इतिश्री कर लिए| 

अब इस पर अंधी-गूंगी-भांड मीडिया का कहना है की बोडो डोमिनेटेड गाँव थे ये| और गैर बोड़ोज ने जलाया| ऐसा हर जगह के दंगे में होता है की हिन्दू शब्द का तो धड़ल्ले से उपयोग होता है लेकिन मुसलमान कहने में इन हरामखोर मीडिया वालों की नानी या अम्मी मरने लगती है| क्या इन कुत्तों को ये नहीं पता है की ये नंगानाच करने वाले और कोई नहीं बल्कि कांग्रेस नाम की खजुहट के द्वारा बसाये गए महान बंगलादेशी कुत्ते हैं जो इन मीडिया वालों की अम्मी कांग्रेस को वोट देते हैं|

अब मीडिया के सम्राट कहे जाने वाले राजदीप सरदेसाई को ही लीजिये उन्होंने ने तो बड़ी बेबाकी से अपने जीजाओं का पक्ष लेते हुए ट्विटर पर साफ़-साफ़ लहजे में कह दिया था की जब तक आसाम में १००० हिन्दू नहीं मर जाते हैं तब तक इनका चैनल इस न्यूज़ को नहीं दिखायेगा क्यूंकि गुजरात में १००० लोग मरे थे लेकिन यहाँ भी इस चाटुकार दलाल ने गोधरा नहीं भौंका और नाही दिल्ली का कत्लेआम क्यूंकि इसकी अम्मा इसकी पगार बंद कर देगी जो इस दल्ले के घर पर इसको मिठाई के कार्टून में भेजी जाती है|

अब तरुण गगोई तो इससे भी आगे निकल कर कह रहे हैं की ये दंगे थोड़े समय के लिए हैं अस्थाई हैं....अब जरा कोई इस हरामखोर से पूछे की स्थाई और अस्थाई दंगे में भेद क्या है और ये दंगा हुआ क्यूँ? इस खजुहट ने तो यहाँ तक कहा की केवल ३०००० हिन्दू ही तो विस्थापित हुए हैं जबकि एक क्षेत्रीय अख़बार की माने तो १,३०,००० और क्षेत्रीय लोगों की मानें तो करीब २,००,००० से भी ज्यादा हिन्दू शरणार्थी शिविरों में रहने को बाध्य हैं| मतलब दूसरा कश्मीर|

अब जहाँ तक सुनने में आ रहा है की जब बोड़ोज पुराने अलगाववादी बोड़ोज के साथ मिल कर इन बंगलादेशी और कांग्रेस पोषित कुत्तों को मारने लगे तो खजुहट कांग्रेस ने तुरंत अपने दामादों की रक्षा के लिए अतिरिक्त १५०० सेना के जवानों को भेज दिया आसाम| जब बोड़ोज मारे जा रहे थे तब क्या १० जनपथ में मिठाई बंट रही थी| और अब बोड़ोज की द्वारा अपने दामादों और जीजाओं की कटाई से दुखित पुरे "युपिए" के मुस्लिम नेता सांसद रहमानी के नेतृत्व में अघोषित प्रधानमंत्री और बंगलादेशी कुत्तों की सास सोनिया और ससुर अहमद पटेल से मिलने आ रहे हैं|

24 Jul 2012

असाम के कई इलाकों में फहरा पाकिस्तानी झंडा



कांग्रेसियों और सेक्युलरों के गाल पर के झन्नाटेदार तमाचा===========================


अरे भाई हुआ क्या?

अरे भाई बंगलादेशी पुरे भारत और सबसे ज्यादा असाम में भरते जा रहे हैं!

अरे तो क्या हो गया ये बेचारे बंगलादेश में बिना घर के हो गए हैं इन्हें आसरा देना हमारा कर्त्तव्य बनता है आखिर ये अखंड भारत के ही तो अंग थे|

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अरे ज्यादा कुछ नहीं असाम में दंगा हो गया है और हिन्दू पलायित हो रहे हैं जैसे कश्मीर से हुए!

अरे ये तो कुछ भटके हुए हैं जो ऐसा काम कर रहे हैं उनको बुरा-भला मत बोलो हमें प्यार से रहना चाहिए इनके साथ|

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अरे असाम के भुक्तभोगियों का कहना है की वहां ये जो आपके भटके हुए मुल्ले हैं वो बंगलादेशी मुसलमानों के साथ मिल कर अत्याधुनिक हथियारों के साथ इन निहत्थे हिन्दुओं पर हमला कर दिया और इन लोगो का शक है की ये हुजी आतंकी संगठन का काम है और पुलिस ने भी इन हिन्दुओं की कोई मदद नहीं की!

अरे मत ध्यान दो इस पर सब बकवास है ऐसा कुछ नहीं है छोटा-मोटा झगडा है सुलझा लिया जायेगा तुम चिंता बहुत करते हो| हम हिंदुस्तान में रहते हैं सभी भाई बंधू हैं और हिन्दू धर्म को सहिष्णुता के साथ रहना चाहिए इन लोगों के साथ ये अल्प संख्यक हैं|

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अरे गजब हो गया गुरु आपके ये भटके हुए, बेघर और बेचारे मुसलमानों ने असाम में कई जगह बोले तो सोनारिपारा, मोहनपुर गाँव, कलाए गाँव में पाकिस्तानी झंडा फहरा दिया है....ये क्या कर रहे हैं आपके मेहमान महाशय!

अरे मैंने तो अभी ये न्यूज़ देखि ही नहीं है....ऐसा नहीं हुआ होगा जरुर ये कोई हमारे अन्दर के लोगों की चाल होगी! हमारे हिन्दू भाइयों ने हमारा ध्यान खींचने के लिए किया होगा....मैं पता करके आता हूँ|

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वो तो सो गए....अब क्या होगा....कोई है क्या भाई इसके बारे में बताने वाला.....कोई मुझ लाचार पर दया दिखा दो और बता दो की ये हो क्या रहा है और कौन कर रहा है और क्यूँ कर रहा है उसको क्या मिलने वाला है !!!



23 Jul 2012

बरेली दंगा: भटके हुए मुसलमानों को मिला मुहतोड़ जवाब



रमजान के पवित्र कहे जाने वाले महीने में बरेली जनपद में रमजान रखे कुछ भटके हुओं ने शुरू किया दंगा|

ये सर्व विदित है की शिव भक्त कांवड़ीये जब भी चलते हैं वो जयकारा लगते हुए और शिव के गाने की धुन को सुनते हुए चलते हैं| यही होता आ रहा था उत्तर प्रदेश में लेकिन जैसे ही इन शिव भक्तों की टोली शाहबाद मस्जिद के पास पहुंची वैसे ही वहां के कुछ भटके हुए मुसलमानों को परेशानी हो गई और शिव नारा लगाने और शिव धुन वाले गाने बंद करने को कहने लगे जैसे इनको हमेसा से हिन्दुओं के त्योहारों से परेशानी चली आती रही है|  शिव भक्तों ने भी मना कर दिया और कुछ भटके हुए मुसलमानों ने जो कुछ समय पहले रोजा तोड़ शाम का खाना खा कर तरोताजा हुए थे ने वहां पर हंगामा मचा दिया | लेकिन कुछ बुद्धजीवियों के द्वारा बिच-बचाव करने से वहां झगडा टल गया|

लेकिन जैसे ही वो शिव भक्त वहां से आगे बढे और "मठ की चौकी" पहुंचे वैसे ही फिर से कुछ भटके हुए मुसलमानों ने पुनः उन्हें घेर कर पथराव शुरू कर दिया| इस पथराव में तक़रीबन २५ शिव भक्त हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए और जैसा की वहां के प्रत्यक्षदर्शी बता रहे हैं लेकिन किसी भी मीडिया में इसकी पुष्टि नहीं हुई है की "एक शिव भक्त हिन्दू का हाथ भी काट दिया है भटके हुए मुसलमानों ने|" जो भी गंगा का पवित्र जल लाया था शिव भक्त हिन्दुओं ने वो सभी उस समय हुडदंग मचा कर इन भटके हुए मुसलमानों ने बिखेर दिया ताकि वो जल ये शिव भक्त शंकर भगवन पर न चढ़ा सकें|

अब मठ की चौकी पर बवाल काटने के बाद इन भटके हुए मुसलमानों का मनोबल बढ़ गया और इन्होने "सहामत गंज" के हिन्दुओं पर धावा बोल दिया| वहां पर पुलिस चौकी मौजूद थी अतः वहां की पुलिस इनको रोकने लिए आगे आई लेकिन मुसलमानों की संख्या इतनी ज्यादा थी की उन्होंने ने पुलिस को दौड़ा लिया और साथ ही गोलियां भी चला रहे थे ये पुलिस पर जिसमे एसपि समेत कई पुलिस वाले बुरी तरह जख्मी हो गए| इतना होने के बाद भी की पुलिस वालों की जान खतरे में है वहां के एसडीएम् साहब खड़े हो कर देख रहे थे और पिएसी को उसका काम करने से रोक रहे थे| लेकिन हालात इतने बदल गए की लाठी चार्ज से कुछ नहीं होने वाला था तब पिएसी के जवान बार-बार एसडीएम् से गोली चलने का आदेश मांग रहे थे लेकिन आदेश नहीं मिल रहा था और वहां मुसलमान सारी चीजें फूंकते हुए अब पुलिस चौकी तक को फूंकने आ पहुंचे तथा बराबर गोलियां चलाये जा रहे थे तब जा कर पिएसी के जवानों ने एसडीएम् से कहा की हम वापस जा रहे हैं और आगे की स्थिति की जिम्मेदार आप होंगे| तब जाकर अपनी गर्दन फंसते देख एसडीएम् ने गोली चलाने का आदेश दिया| पुलिस और पिएसी की गोली चलाने से इन भटके हुए मुसलमानों में मीडिया और सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से एक मारा गया पर प्रत्यक्षदर्शियों के हिसाब से कम से कम ५ भटके हुए दंगा-रत भटके हुए मुसलमान मरे| लेकिन मरने से पहले इन भटके हुए मुसलमानों ने अपना बहादुरी वाला कार्य कर दिया था की सो रहे कुछ हिन्दुओं के घरों और दुकानों को आग लगा दिया था तथा कुछ कमजोर घरों में घुस कर वहां की महिलाओं के साथ वही अपना चिर-परिचित घिनौना आचरण किया यानि उन महिलाओं के साथ अशिष्ट और न कह सकने वाली शर्मनाक हरकत करी इन भटके हुए मुसलमानों ने।

लेकिन ५ लोगों के मरने और गोली चलने के बाद भी इन भटके हुए मुसलमानों की तादाद इतनी ज्यादा थी की पुलिस को वहां कालीबाड़ी के हिन्दुओं से सहायता मांगनी पड़ी| तब कालीबाड़ी का हर हिन्दू पुलिस और प्रशासन तथा राष्ट्रीय सम्पदा (पुलिस चौकी) को कोई हानी न हो इसके लिए आगे आ गया और उन भटके हुए मुसलमानों को उनके दडबे में खदेड़ आया| हिन्दुओं के इस सहिष्णु कार्य के लिए वहां उपस्थित पुलिस और पिएसी ने उनका धन्यवाद दिया|

रात भर उसके बाद छिटपुट घटनाएँ होती रहीं पुरे उस दंगा प्रभावित क्षेत्र में|  और साथ ही वहां कर्फ्यू भी लगा था| लेकिन आज तडके स्थिति बिगड़ गई जब उस क्षेत्र के शिव भक्त लौटे और उनको बीती रात की घटना की जानकारी हुई| अब चूँकि ऐसी ही घटना २ साल पहले भी हुई थी जिसमे इन भटके हुए मुसलमानों ने कई हिन्दुओं के घर जला दिए थे और उसमे करोडो की क्षति उठानी पड़ी थी हिन्दू भाइयों को| और जैसा सामने आया की सारे बरेली के लोग हाल ही के कोसीकलां और प्रतापगढ़ की घटनाओं को अच्छे से देख और समझ चुके थे| इन क्षेत्रों में भटके हुए मुसलमानों के द्वारा की गई नंगी नाच से ये अच्छे से वाकिफ थे| तथा प्रशासन के तरफ से हाल के उत्तर प्रदेश के कोसीकलां और प्रतापगढ़ के दंगे में किये गए सराहनीय (निंदनीय) प्रदर्शन को भी देख चुके थे|

अब इन थके हारे आये शिव भक्तो में गुस्सा बढ़ा जो की लाजमी था और इन्होने  स्टेडियम मोड़ पर स्थित मस्जिद और साथ ही एक और मस्जिद को आग के हवाले कर दिया| साथ ही जो पिछले दंगे के नायक रहे थे और उस समय के दंगे के भटके हुए, एक भटके हुए मुसलमान नेता सादिक जी, उनका और उनके रिश्तेदारों का दुकान फूंक दिया गया क्यूंकि इस दंगे में भी ये थोडा भटका रहे थे भटके हुवों को|

अब चूँकि बीती रात को भटके हुए मुसलमानों की भीड़ ने सहामत गंज में लूट-पाट मचा रखी थी तो आज दिन में जोगिनवारा में इन भटके हुए मुसलमानों की दुकाने लूट ली गईं| क्यूंकि प्रकृति का नियम है की संतुलन बना रहना चाहिए|

अब एक सवाल उठता है की जो कुछ शिव भक्त पहले त्रिशूल लेकर चलते थे जल भरने उन्हें इस बार त्रिशूल ले जाने पर  लगा दिया था इस मौलाना मुलायम सिंह यादव की सरकार ने। तो क्या यहाँ एक शक की सुई ये नहीं उठती है की क्या ये दंगा पूर्व प्रायोजित था?

ये खबर हमारे एक बरेली के फेसबुक हिन्दू मित्र द्वारा दी हुई है| चूँकि इस समय सारे शांतिप्रिय लोग नजरबन्द हो गए हैं अपने घरों में और हमारे मित्र का इन्टरनेट काम नहीं कर रहा था तो उन्होंने सारी घटना मुझे बताई और मैं आप लोगो तक पहुंचा रहा हूँ|


१९८४ में दिल्ली में कुछ हुआ था क्या?

जब मैं ६ महीने का हुआ था तभी हुआ एक दंगा वो भी देश की राजधानी में और अब २८ साल होने को आये लेकिन किसी भी दंगा पीड़ित को न्याय नहीं मिला बल्कि इसके उलट दंगा भड़काने वाले को भारत रत्न से सम्मानित किया गया| श श श श श श ........ इस दंगे के बारे में बात करना मना है क्युकी इस दंगे के कसूरवार, भारत, माफ़ करियेगा इंडिया के अघोषित राज परिवार वाले हैं| महामहिम स्वर्गीय राजीव गाँधी जी (नाम तो याद ही होगा)|



गुजरात दंगे पर १० सालों तक अनवरत अपना फटा ढोल पीटने वाले सेक्युलर भांडों और मीडिया के दलालों को शायद देश के अन्य दंगो के बारे में बात करना पसंद नहीं है| क्युकी अगर ये दलाल बाकि के दंगों पर बात करेंगे तो उनकी दलाली का पैसा मिलना बंद हो जायेगा|

क्या अपने किसी को देखा है की वो कभी भी १९८४ के दिल्ली के दंगे के बारे में बात करता मिला हो? दिल्ली सिख-हिन्दू का दंगा जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भड़काया वो एक भीड़ का उन्माद हो गया और गोधरा में राम भक्तों को जलाना एक भटके हुए मुसलमानों की गलती पर वही गोधरा कांड के बाद भड़का गुजरात दंगा मोदी जी द्वारा भड़काया हुआ एक सामूहिक हत्याकांड|

भारत में १९५० से लेकर १९९५ तक में छोटे बड़े मिला कर ११९४ दंगे हुए पर जो दिल्ली में ३१ अक्तूबर १९८४ को इंदिरा गाँधी के मरने के बाद दंगा चला वो अब तक का सबसे वीभत्स सामूहिक हत्याकांड था| ये वीभत्स हत्याकांड उस जनसमूह के साथ हुआ था जिसने कुछ समय पहले देश के बंटवारे का दंश झेला था लेकिन किसी ने उस जन समूह की सुध नहीं ली थी तथा यही जन समूह जिसे हम सिख कहते हैं भारतीय सेना में सबसे ज्यादा बढ़ चढ़ कर आते हैं और इनके नाम से सिख रेजिमेंट तक है जिसने एक समय भारत की सीमा को लाहौर तक खिंच दिया था|

जब ३१ अक्तूबर १९८४ को इंदिरा गाँधी मरी तब सिखों की छिटपुट हत्याएं हुई पर यहाँ भारतीय मीडिया ने ऐसा फर्ज अदा किया अपना जिसने करीब ३००० सिख भाइयों की बलि ले ली और कितने ही सिख भाई दंगे के बाद मिले नहीं| इंदिरा गाँधी के मरने के बाद दूरदर्शन ने राजीव गाँधी का साक्क्षातकार लिया उस समय हो रही छिटपुट सिखों की हत्यायों पर जिसमे राजीव गाँधी ने कहा की "जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल जाती है और छोटे पौधे कुचल जाते हैं|" एक प्रधानमंत्री के द्वारा दिया गया ये अब तक का सबसे शर्मनाक बयान था और इस बयान ने इस छिटपुट हो रही हत्यायों को एक वीभत्स सामूहिक हत्याकांड में तब्दील कर दिया क्यूंकि देश का तत्कालीन प्रधानमंत्री यही चाहता था|

राजीव गाँधी के इस बयान से कुछ २ टेक की औकात वाले नेताओं को कमाने का और राजीव गाँधी के सानिध्य में आने का मौका दिख गया| इसमें थे सांसद "सज्जन कुमार", तत्कालीन कैबिनेट मंत्री "जगदीश टाइटलर", तत्कालीन कैबिनेट मंत्री "हरकिशन लाल भगत" में तो आतंरिक होड़ मच गई की कौन ज्यादा हत्याएं करवाता है (जैसे उनको हत्याएं करवाने का इनाम मिलने वाला था)| इन तीनो नेताओं ने अपने गुर्गों को यहाँ तक कह दिया था की "एक पगड़ी लाने पर १००० रूपया और एक सरदार का घर जलने पर १०००० रूपया"| इन तीनो नेताओं को इन हत्यायों का इनाम भी मिला की ये लोग सालों तक केंद्रीय मंत्री रहे और दंगे के गवाहों को मौत के घाट उतरवाते रहे|

जो भी अगर ये कहता हुआ मिलता है की दिल्ली का ये सामूहिक नरसंहार सरकार के द्वारा प्रायोजित नहीं था तो एक घटना उन लोगो के लिए है की एक सिख जिसका नाम "अमर सिंह" था वो इस नरसंहार से बच गया| वो सिख बचा कैसे तो उसके हिन्दू पडोसी ने उसे अपने घर में शरण दिया और जब कत्लेआम मचाती हुई भीड़ अमर सिंह नाम के सिख को ढुंढते हुए पहुंची तो उस हिन्दू ने ये बोल दिया की अमर सिंह मर चूका है| 

पर उस कातिल भीड़ को इससे संतोष नहीं हुआ और वो अमर सिंह का मृत शरीर देखने की बात करने लगे तब उस हिन्दू ने कहा की उसके शरीर को और लोग उठा कर ले गए हैं| ये सुन कर उस समय तो भीड़ चली गई पर थोड़े समय में फिर पहुंची और उस हिन्दू को एक लिस्ट दिखाते हुए कहा की इस लिस्ट के मुताबिक अमर सिंह का मरा हुआ शरीर अभी तक किसी ने भी नहीं उठाया है| अब ऐसी लिस्ट बन कहाँ रही थी जिसमे चुन-चुन कर सिखों को मारा जा रहा था और उनके मरे हुए शरीर को किसको दिखाया जा रहा था और कौन बना रहा था वो लिस्ट| ये बात सोचने वाली है! लेकिन इस घटना से पता चल जाता है की ये सामूहिक नरसंहार कितने व्यवस्थित ढंग से चलाया जा रहा था|

जब इस महा नरसंहार की जांच की कमान CBI के आर० एस० चीमा को दिया गया तब चीमा जी ने जो बताया वो देख कर ये पूर्ण रूप से कहा जा सकता है की कांग्रेस नाम की सरकार उस समय एक आतंकवादी जैसा व्यव्हार कर रही थी और दिल्ली की पुलिस को अपने इशारे पर नचा रही थी| चीमा ने उस समय के एडिसनल जज जे० आर० आर्यन को बताया की "दिल्ली की पुलिस एक पूर्व-नियोजित तरीके से व्यव्हार कर रही थी दंगे के समय और दंगे पर अपनी ऑंखें बंद किये बैठी थी| उस नरसंहार के दौरान १५० दंगे की वारदातों के बारे में पुलिस को कम्प्लेन किया गया लेकिन पहली ५ वारदातें जो छोटी थीं और शुरुवात की थीं उन्हें ही एफ़० आ० आर० में लिखा गया और इसका किसी भी मीडिया में कोई उल्लेख नहीं है|"

पर हद तो तब हो गई जब इतने के बाद भी जो दाग नेताओं के ऊपर लगे थे और उनके खिलाफ कोर्ट में सुनवाई हो रही थी उसमे कोर्ट ने ऐसा साक्ष्य माँगा की सुन कर यही कहा जा सकता है की भारत की अदालतें वही फैसला सुनती हैं जो सरकार में बैठे लोग चाहते हैं| कोर्ट ने CBI से माँगा की जिन नेताओं पर आरोप लगे हैं उनके खिलाफ आपके पास क्या सुबूत हैं गवाहों के अलावा, कोई न्यूज़ पेपर की कटिंग, कोई भी मीडिया की खबर कुछ और लाइए| जब न्यूज़ पेपर में ही खबर में नाम आने से आरोप सिद्ध होता है तो छोटे लोगों को तो न्याय मिलने से रहा क्यूंकि उनके पास तो सिर्फ चंद गवाह होते हैं लेकिन पेपर की कटिंग नहीं होती है|


अब इस सामूहिक हत्याकांड के बारे में जितना लिखे उतना कम ही लगेगा क्युकी ये इतना जतन से जो करवाया गया था और आज भी इसमें बर्बाद लोग जब भारत की अदालत से त्रस्त हो और भारत छोड़ अमेरिका में शरण लिए उन लोगों ने अमेरिका में कांग्रेस के खिलाफ और इस नरसंहार के खिलाफ केस किया जिसकी सुनवाई आने वाली २७ जून २०१२ को हुआ| पर कांग्रेस का भांडपन तो देखिये कांग्रेस ने अमेरिका की सरकार से ये कहा की जो केस अमेरिका की अदालत में कांग्रेस के खिलाफ चल रहा है वो चुकी २५ साल पुराना है अतः इस केस को ख़ारिज कर दिया जाये|

इस केस को ख़ारिज करने के लिए देखिये कैसे कांग्रेस के सांसद मोतीलाल वोरा ने भांडों वाली दलील दी की, "कोई भी समन या कम्प्लेन इंडियन नेशनल कांग्रेस को नहीं मिला है अतः इस केस को ख़ारिज करें|"








इससे २ कदम आगे बढ़ कर इस वोरा ने ये कहा अपने एफिडेविड में कहा की इंडियन नेशनल कांग्रेस और इंडियन नेशनल ओवरसीज कांग्रेस दोनों अलग-अलग एंटिटी हैं और दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं है क्यूंकि ये छोटा बच्चा वोरा का नहीं था।

नेशनल कांग्रेस के लीगल ऐडवाईजर गुरापत्वंत सिंह पन्नुन ने तो इस केस को ही बेकार और निराधार बता दिया|

इसमें हमारे गृह मंत्री पि० चिदंबरम २५ जून २०११ को १९८४ में हुए सिख नरसंहार के ऊपर बोलते हुए कहा की, "ये समय है की हम १९८४ की उस घटना को भूल एक नए भारत का निर्माण करें|" अब जरा कोई इस पर बोलेगा की ये क्या था क्यूंकि खुद तो ये लुंगी उठा-उठा कर गुजरात के २००२ के दंगे पर भौकते हुए दिख जाता है|

तो ये है इस खुनी कांग्रेस का दोहरा चरित्र की, "खुद करे तो रासलीला और कहीं किसी घटना का जवाब मिले तो वो वह्सीपना|"

वाह रे कांग्रेस तेरी महिमा अपरम्पार.....करती रह ऐसे ही नरसंहार||


वाह रे मीडिया इस फोटो को तो बहुत उछाला ताकि गुजरात का नाम ख़राब और मोदी को फंसाया जाये


लेकिन इस फोटो को दिखने की हिम्मत क्यूँ नहीं कर पाते हो तुम या खुद तुम्हारी छाती फटने लगती है।