• India

    Every particle, even sand says I AM AN INDIAN

  • Indian Tea

    India is a leading producer of TEA, do you wanna have Indian Tea

  • India Heart Of the World

    Take the Aroma of Indian Soil and it's promise that you would not forget it

  • Soil to Sea, it's India

    You may be tired but Scenories will not end, those will come with some new surprises

  • Forts still holds

    An eye catching but surprise everyone, how big and beutiful they are

6 Jan 2013

I am Hindu ...

"मैं हिन्दू हूँ"




हिन्दुत्व ही क्यूँ ?


पिछले साठ वर्षों से स्कूलों मे जाने वाले हर बालक-बालिका के मुख से तथा जनता के मुख से यही गवाया जाता रहा है - "मजहब नहीं सिखाता, आपस मे बैर रखना", जबकि तथ्य यह है कि पिछले पंद्रह सौ वर्षों मे विश्व मे जितना खून मझाब के नाम पर बहा है, उसकी कोई तुलना ही नहीं है। कत्लेआम, बलात्कार, अत्याचार का तो कोई हिसाब ही नहीं है।

हिन्दू ने प्रत्येक मजहब का स्वागत किया है और इसे भारत मे फलने-फूलने का अवसर दिया है।

अब एक अन्य खतरनाक मझाब 'नास्तिक' एक चुनौती बन कर उभर रहा है। दुनिया मे नास्तिक मत (कम्यूनिज़्म) ने भी हंगरी इत्यादि देशों मे कम रक्त नहीं बहाया। नास्तिक्य और कम्यूनिज़्म भी मजहब के अंतर्गत आते हैं।

अभी बीसवीं शताब्दी पर ही दृष्टि डालें तो देखेंगे कि भारत, जैसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हिमांचल से पूरी तक एक सूत्र मे बंधे देश को तीन टुकड़ों मे मझाबी आधार पर विभाजित कर दिया गया। यह उस मजहबी जुनून का कमाल है जो "नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना।"

एक मात्र हिन्दू धर्म ही ऐसा है जिसने विश्व को मानवता का प्रचार करने के लिए शांति दूत भेजे और बिना युद्ध किए विश्व भर को मानवता का पाठ पढ़ाया और प्रचार किया। 

इस पर भी हिन्दू धर्म को सांप्रदायिक कहना या तो मूर्खता ही काही जाएगी अथवा धूर्तता। हिन्दू कोई मजहब नहीं है। यह कुछ मान्यताओं का नाम है। वे मान्यताएं ऐसी हैं जो मानवता का पाठ पढ़ाती हैं।

हिंदुओं कि धर्म पुस्तकों मे मनुस्मृति का नाम सर्वोपरि है और मनुस्मृति धर्म का लक्षण करती है - धुर्ति क्षमा दमोस्तेय शौचम इंद्रिय-निग्रह, धीर्विधा सत्यमक्रोधी दशकम धर्म लक्षणम। कोई बताए इसमे कौन सा लक्षण है जो मानवता के विपरीत है। 

स्मृति मे धर्म का सार स्पष्ट शब्दों मे कहा है - श्रूयतां धर्म सर्वस्व, श्रूत्व चैवाव धार्यताम, आत्मनः, प्रतिकूलानि परेणाम न समाचरेत ।। (धर्म का सार सुनो और सुनकर धारण करो, अपने प्रतिकूल व्यवहार किसी से न करो।)

ऐसे लक्षण वाले धर्म को साम्प्रदायिक कहता तो मूर्खता की पराकाष्ठा कही जाएगी।

वास्तव मे हिन्दू धर्म को न समझने के कारण दुनिया मे अशांति मची हुई है। सम्पूर्ण भारत देशवासी हिन्दू ही हैं क्यूंकी वे हिंदुस्तान के नागरिक हैं। इस्लाम, ईसाई, पारसी, बौद्ध इत्यादि जो हिंदुस्तान का नागरिक है वह हिन्दू ही है।

हमारे राजनैतिक नेता तथा आज के कुशिक्षित लोग अंधाधुंध, बिना सोचे समझे लट्ठ लिए हुए हिन्दू के पीछे पड़ जाते हैं। 

समस्या का हल तो है परंतु राजनीति में आए स्वार्थी नेता अपना उल्लू कैसे सीधा करेंगे?

बच्चों की पाठ्य पुस्तक मे एक पाठ इस विषय मे हो, कि हिन्दू क्या है, इसके मान्यताएं क्या हैं, और भारत का प्रत्येक नागरिक जो भी भारतवासी है, वह हिन्दू ही है।

हिंदुओं कि मान्यताएं शास्त्रोक्त हैं, बुद्धियुक्त हैं, किसी भी मझाब के विरोध मे नहीं। किसी भी मजहब को मानने वाले यदि वे हिन्दू कि मान्यताओं को जो मानवता ही है, मान लें तो द्वेष का कोई कारण नहीं रहेगा।

संक्षेप मे हिन्दू कि मान्यताएं हैं - जोकि शास्त्रोक्त हैं, युक्तियुक्त हैं, इस परकर हैं -

1॰ जगत के रचयिता परमात्मा पर जो सर्वशक्तिमान है, अजर अमर है, विश्वास;
२. जीवात्मा के अस्तित्व पर विश्वास;
३. कर्म-फल पर विश्वास। इसका स्वाभाविक अभिप्राय है पुनर्जन्म पर विश्वास;
४. धर्म पर विश्वास। धर्म जैसा कि मनुस्मृति मे लिखा है, जिसका सार है - 

आत्मनः प्रतिकूलानी परेषाम न समाचरेत । । 

हिन्दू जनसंख्या विश्वपटल पर 

हिन्दू के इतिहास पर, हिन्दू राष्ट्र कि विवेचना पर तथा हिन्दू कि मान्यताओं पर श्री गुरुदत्त जी ने तीन पुस्तकें लिखीं हैं - हिन्दुत्व कि यात्रा, वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान-हिन्दू राष्ट्र तथा मैं हिन्दू हूँ (हिन्दू धर्म कि मान्यताएं), जो प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को पढनी चाहिए। 

साभार : श्री गुरुदत्त जी 
पुस्तक : मैं हिन्दू हूँ (हिन्दू धर्म कि मान्यताएं)