24 Sep 2012

हिंदी है हिन्दू की पहचान



भारत विभिन्नता में एकता रखने वाला देश है. इसका प्रमाण एक बहुत ही प्रचलित कहावत से साफ़-साफ़ पता चलता है "कोस-कोस पर पानी बदले, ढाई कोस पर वाणी". भारत में बहुत तरह की भाषाएँ बोलीं जाती हैं. हर भाषा का अपना ही एक महत्व होता है. भाषाएँ एक-दुसरे को जोड़ने का काम करती हैं. देश में ४ भाषाओँ को देव भाषा का नाम दिया गया है जो की लिपि बद्ध हैं इनमे पहला है संस्कृत, तमिल, तेलगु और कन्नड़. लेकिन इन सभी भाषाओँ के साथ-साथ हमारी बाकि की क्षेत्रीय भाषाओँ का भी अपना ही एक महत्व होता है. हर क्षेत्र की अपनी एक अलग भाषा है. कोई बंगाली बोलता है तो कोई मराठी, कोई असमी बोलता है तो कोई भोजपुरी लेकिन इन सभी भाषाओँ का एक ही उद्देश्य होता है अपने विचारों की अभिव्यक्ति और एक जुडाव अपनों से अपनों की तरह. पर क्या होगा अगर एक कश्मीरी अपनी भाषा में किसी तमिल से बात करे या कोई असमी में किसी मराठी से बात करे. अगर ऐसा होता है तो अभिव्यक्ति तो हम कर सकते हैं लेकिन इस अभियक्ति का कोई महत्व नहीं होगा क्यूंकि हमारी बातें सामने वाले के समझ में नहीं आएँगी और हमारा संचार तंत्र वहीँ खत्म हो जायेगा. 

क्षेत्रीय होना एक स्तर तक सही है लेकिन क्या भारतीय होना गलत है? इन्सान होना सही है लेकिन क्या अपने धर्म और अपने मूल को भूल जाना सही है? हिन्दू धर्म का सब कुछ अपने में समाहित करता है फिर एकता को क्यूँ नहीं समाहित करता है?

अब इसका दो ही उपाय है. हम जहाँ भी जाएँ वहां की भाषा सीखें जैसे की अगर कोई भोजपुरी बोलने वाला असम में जाये तो असमी सीखे जोकि जरुरी भी है लेकिन ये एक लम्बी प्रक्रिया है. तो यहाँ एक दूसरा पहलु है की अगर हम अपने देश की राष्ट्रीय भाषा हिंदी में बात करें. चूँकि हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे अधिकांश लोग समझ सकते हैं और टूटी-फूटी बोल भी सकते हैं. इस प्रकार अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाने में बहुत आसानी होती है. क्यूंकि भाषा अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए होती है न की अपनों को अपनों से दूर करने के लिए. दूर करने के लिए तो नेता हैं न जो की हमें लड़ाते रहते हैं कभी जाती के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर. पर इस भाषा के नाम पर लड़ने में हम अपने देश को ही बदनाम करते हैं जिसमे हम रहते हैं और अपनी मातृभूमि कहते हैं. क्या हम अपनी मातृभूमि का फर्ज पूरी तरह समझ पाए हैं?  

हम इस सच्चाई को पूरी तरह ह्रदय से सर झुका कर मानते हैं की भारत देश जो कभी बिखरा हुआ था उसे सरदार बल्लभ भाई पटेल जी ने एक सूत्र में जोड़ा और इस जोड़ने में उनका उद्देश्य एक ही था की पूरा देश एक होकर रहे. इसी एक सूत्री भारत के उद्देश्य के लिए तत्कालीन आजाद भारत की सरकार ने हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाया. लेकिन तत्कालीन भारत सरकार ने भी हिंदी को थोपा नहीं. सरकार ने यही कहा की जो जिस भाषा में भारत में बोलने में आसानी महसूस करता है वो उस अमुक भाषा में बात करे लेकिन अगर २ अलग भाषा को बोलने वाले एक दुसरे से बात करना हो तो हिंदी का प्रयोग करें.

मैं आज भी वही बात करना चाहता हूँ की जैसे कोई भी बात जबरदस्ती किसी पर थोप कर नहीं की जा सकती है वैसे ही कोई भी भाषा किसी पर थोप कर एक-दुसरे को नहीं जोड़ा जा सकता है. एक दुसरे को अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए किसी भी भाषा से पहले आत्मीयता की जरुरत होती है. अगर हमारे अन्दर आत्मीयता है तो हर भाषा हमारे लिए एक हो सकती है फिर चाहे वो हिंदी हो या असमी या फिर तमिल. भाषा तो हमें एक ऐसा पुल प्रदान करती है जो नदी के दो किनारों को आपस में जोडती है और नदी के दोनों किनारों पर खड़े इंसानों को आपस में जोडती है. 

अतः हम एक होकर एक भाषा को अपनी सामूहिक और कई क्षेत्रों के मध्य की भाषा बनायें और इस कार्य में एक ही भाषा है जो इस कार्य को कर सकती है और वो है हिंदी. हिंदी कोई एक अमुक समूह की भाषा नहीं है वरन हिंदी पुरे हिन्दू समूह और भारत की भाषा है. हर हिन्दू को हिंदी भाषा को अपने ऊपर थोपा हुआ नहीं समझना चाहिए वरन हिंदुत्व के लिए उसे सहर्ष अपनाना चाहिए साथ ही अपने दुसरे हिन्दू भाइयों को हिंदी भाषा को ह्रदय से अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए न की किसी हिन्दू को हिंदी भाषा बोलने से हतोत्साहित करना चाहिए.

हिंदी या कोई भी भाषा किसी पर थोपिए मत वरन हिंदी को हिन्दू सहर्ष अपनाएं ! ! !



2 comments:

  1. I agree fully. You cannot force a language on anyone and yet the mughals forced islam and urdu on you and today hindi is a mixture of hindi, urdu and english; the British forced english language and culture on you, christianity and buddhism came well before that, but you must understand one very important fact about Hindusthan. The outsider was able to plunder because the country was not united.....No outsider can walk into your home and destroy everything in sight if you are united and stand as one.

    The Arabs depended on Hindusthan for 1000 years before oil was discovered. The British took enough to establish America, Canada, Australia and New Zealand and today the foreign investors make tons of money out of India... In fact what I have noticed that the world makes plenty from you yet you do not have enough money to build a proper sanitation system, roads and public structures, no building is painted even in Delhi, everywhere there is a smell of urine and spit marks on every corner of every public building and the education institutions offer beef in their meals.

    Engish - a mutt language with no rules - would not have succeeded to this limit in India - yet Sanskrut, the language of our scriptures was destroyed completely. In fact there is an American university advertising itself on net for courses in hinduism and sanskrut charging huge sums of money yet do not know how to pronounce the basic words in sanskrut.

    English destroyed India in uniting under one language and islam and christianity and buddhism destroyed basic traditional values of hindu society. This is evident in all of their structures in Hindusthan....their universities and their places of worship.....huge compared to hindu temples and schools....what does it say? Is that not destructive behavior?

    Children were the property of the mother, not the father yet they changed everything and forgot all about the culture of Bhaarat Mata.
    Islam is the biggest culprit here.

    Language is the soul of the religion or its culture...today America is on a warpath with hindu culture and is destroying it from within by giving you free american channels and introducing american way of life to Hindusthan. McDonalds is an eye sore in India. Pizza places and noodles have taken over daal chawal or roti sabzi.

    I have not seen anyone trying to preserve the age old culture, religion and traditions of Hinduism and India. So language is uppermost in preserving what you have and what they lack. At this point, I remember the controversy that took root in India when Deepa Mehta was trying to shoot her movie WATER. She was wrong in producing that movie.

    Make it mandatory that every school will teach both Sanskrut and Hindi as part of their curriculum, remove urdu completely as it is a mutt language from Arabic, Farsi and Hindi, and English to be taught only where someone wants to tpursue a profession outside of India.

    ReplyDelete
  2. कदापि नहीं , हिंदी "हिंदू " होने की पहिचान नहीं , वेद के प्रति श्रद्धा ही हिंदुत्व की पहिचान कही जा सकती है |
    हिंदी तो उलटे हिंदुओं के बुरे दिनों में जन्मी भाषा है , संस्कृत से इसका मुकाबला नहीं | हिंदुत्व चाहते हैं प्रखर तो संस्कृत लाइए सत्वर

    ReplyDelete